DNA Editing: क्या इंसान की जिंदगी का ब्लूप्रिंट बदलना मुमकिन है?

हमारा शरीर कैसे काम करेगा, उसकी सारी जानकारी हमारी कोशिकाओं के अंदर मौजूद डीएनए में होती है। आसान शब्दों में कहें तो डीएनए हमारे शरीर का मूल नक्शा या ब्लूप्रिंट है।

मेडिकल साइंस अब तक बीमारियों का इलाज मुख्य रूप से बाहर से दवाइयां देकर करता आया है। उदाहरण के तौर पर यह ठीक वैसा ही है जैसे छत के फटे हुए पाइप को ठीक करने के बजाय सिर्फ फर्श का पानी पोंछते रहना। लेकिन अगर असली गड़बड़ी उस अंदरूनी नक्शे या जेनेटिक कोड में ही हो, तो बार-बार दवा देने से बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकती।

जीन की इस अंदरूनी गड़बड़ी को वैज्ञानिक भाषा में म्यूटेशन कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में 10,000 से भी ज्यादा गंभीर बीमारियां सिर्फ एक जीन की खराबी के कारण होती हैं।

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज GBD और WHO के डेटा के अनुसार, दुनिया भर में हर साल सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया जैसी खून की बीमारियों के साथ 3 से 4 लाख बच्चे पैदा होते हैं। इसके अलावा, खानदानी दिल की बीमारियों और जीन म्यूटेशन से होने वाले कैंसर के कारण हर साल लगभग 1 करोड़ 80 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं।

भारत में इन जेनेटिक समस्याओं की स्थिति काफी गंभीर है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में बीटा थैलेसीमिया का सबसे ज्यादा असर भारत में ही है।

देश में हर साल लगभग 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं। वहीं 4 करोड़ से ज्यादा लोगों में इस बीमारी के लक्षण भले ही न दिखें, लेकिन वे इसे अगली पीढ़ी में फैला सकते हैं । दूसरी ओर, सिकल सेल बीमारी यानि खून में ऑक्सीजन के कमी के मरीजों की संख्या भारत में 14 लाख से भी ज्यादा है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा आदिवासी समुदाय का है।

इसी मोड़ पर पक्का इलाज लेकर आई है डीएनए रीराइटिंग  या जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी। कंप्यूटर के खराब कोड को जिस तरह सुधारा जाता है, ठीक वैसे ही शरीर के अंदर की गलत कोडिंग को काटकर नया सही कोड लगाया जाता है। इसी को जीन एडिटिंग कहते हैं।

इस काम का सबसे मुख्य जरिया CRISPR-Cas9  टेक्नोलॉजी है। यहाँ यह जानना जरूरी है कि CRISPR यानी Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats किसी व्यक्ति या कंपनी का नाम नहीं है। यह बैक्टीरिया के शरीर में पाए जाने वाले एक खास डीएनए पैटर्न का वैज्ञानिक नाम है। इसी को समझकर वैज्ञानिकों ने जीन काटने का यह तरीका तैयार किया है।

जीन एडिटिंग कैसे काम करती है?

मान लीजिए एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी की लाखों किताबों में से किसी एक किताब के किसी एक खास पन्ने को ढूंढना और उस पन्ने के एक गलत शब्द को काटकर हटा देना–जीन एडिटिंग का काम भी कुछ ऐसा ही है।

इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो चीजें मिलकर काम करती हैं। पहली है गाइड आरएनए (gRNA) और दूसरी है 'Cas9' नाम का एक खास प्रोटीन।

गाइड आरएनए को एक डिजिटल जीपीएस या लोकेशन ढूंढने वाले टूल की तरह समझा जा सकता है। इंसानी शरीर के अरबों जेनेटिक कोड्स में से गलत कोड कहाँ छिपा है, गाइड आरएनए उसे तुरंत ढूंढ लेता है।

इसके बाद Cas9 प्रोटीन एक मॉलेक्युलर कैंची यानि एक खास तरहा का प्रोटीन या एन्जाइम की तरह काम करता है। यह उस खराब डीएनए हिस्से को काट देता है। डीएनए का वह हिस्सा कट जाने के बाद कोशिका खुद-ब-खुद सही हिस्से को जोड़ लेती है। कभी-कभी वहां पहले से तैयार सही जेनेटिक कोड रख दिया जाता है।

शुरुआती दौर में इस तरीके से डीएनए के दोनों धागों को एक साथ काटना पड़ता था। यह कभी-कभी कोशिका के लिए नुकसानदेह हो जाता था।

लेकिन तकनीक के विकास के साथ अब और भी बेहतर और सुरक्षित तरीके आ गए हैं। इनमें बेस एडिटिंग और प्राइम एडिटिंग शामिल हैं।

आसान भाषा में कहें तो डीएनए को बिना काटे ही बेस एडिटिंग के जरिए जीन के एक सिंगल कोड को सुधारा जा सकता है। वहीं प्राइम एडिटिंग कंप्यूटर के सर्च एंड रिप्लेस ऑप्शन की तरह काम करती है। यह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित तरीके से डीएनए कोड को सुधार सकती है।

दुनिया का इतिहास, भारत की स्थिति और मौजूदा दौर

जीन एडिटिंग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इस रिसर्च की रफ्तार काफी तेज रही है। 2012-2013 में पहली बार लैब में CRISPR तकनीक का सही इस्तेमाल दिखाया गया था। इसके लिए 2020 में जेनिफर डौडना और इमैनुएल शार्पेंतियर को केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार मिला।

2016 में चीन में कैंसर मरीज पर पहला ह्यूमन ट्रायल शुरू हुआ। 2018-2019 में सिकल सेल और थैलेसीमिया के मरीजों के लिए एक खास ट्रायल हुआ। इसमें रक्त कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकालकर लैब में एडिट किया गया और फिर वापस शरीर में डाला गया । यह तरीका काफी सफल रहा।

मेडिकल साइंस में सबसे बड़ी कामयाबी 2023 के अंत और 2024 की शुरुआत में मिली। ब्रिटेन की Medicines and Healthcare Products Regulatory Authority और अमेरिका की Food And Drug Administration ने खून की बीमारियों के पक्के इलाज के रूप में दुनिया की पहली अप्रूव्ड CRISPR थेरेपी Casgevy यानि एप्रूव्ड जिन थेरेपी दबा को मंजूरी दी।

2026 के मौजूदा दौर में ये ट्रायल एक कदम और आगे बढ़ चुके हैं। लैब के बाहर कोशिकाओं को एडिट करने के बजाय अब सीधे इंजेक्शन के जरिए दवा मरीज के शरीर में दी जा रही है । इसके फेज़-2 और फेज़-3 क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं।

लिवर की गंभीर बीमारी ATTR एमाइलॉइडोसिस जैसे दुर्लभ बीमारी, जेनेटिक हाई कोलेस्ट्रॉल और जन्मजात अंधेपन को दूर करने के लिए सीधे शरीर में दवा पहुंचाने का यह तरीका अब अंतिम चरण में है।

इस क्षेत्र में भारत भी पूरी गंभीरता से काम कर रहा है। भारत की प्रमुख रिसर्च लैब CSIR-IGIB यानि इंसटीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी और ICMR मिलकर इस पर काम कर रहे हैं। वे भारत के लोगों की जेनेटिक बनावट के हिसाब से अपनी स्वदेशी जीन एडिटिंग थेरेपी बना रहे हैं।

भारत सरकार ने 2022 में जीनोम एडिटिंग गाइडलाइंस जारी की थीं, जिससे इस रिसर्च का रास्ता साफ हुआ। इसके अलावा, सरकार के राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। थैलेसीमिया और सिकल सेल के मरीजों के लिए सस्ता इलाज तैयार करने के शुरुआती ह्यूमन ट्रायल फेस 1 और फेस 2 के ट्रायल तेजी से चल रहे हैं।

वैज्ञानिकों के राय: फायदे और खतरे

नेचर, साइंस और लैंसेट जैसे दुनिया के बड़े साइंस जर्नल्स में वैज्ञानिकों ने इस विषय पर कई रिसर्च छपी हैं। इनमें इसके फायदों के साथ-साथ कुछ खतरों के बारे में भी बताया गया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जीन एडिटिंग का सबसे बड़ा फायदा सिंगल-डोज़ क्योर है। यानी जिंदगी भर दवा या खून लेने के बजाय सिर्फ एक बार के सही इलाज से बीमारी हमेशा के लिए ठीक हो सकती है।

कैंसर के इलाज में CAR-T सेल थेरेपी के साथ CRISPR को जोड़ा गया है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता  को मजबूत बनाकर कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद मिली है। इसके अलावा, लिवर में PCSK9 जीन को बंद करके खानदानी दिल की बीमारियों और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में भी सफलता मिली है।

हालांकि, साइंस जर्नल्स एक बड़े जोखिम की ओर भी इशारा करते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में ऑफ-टारगेट इफेक्ट कहा जाता है। इसका मतलब है कि अगर गाइड आरएनए गलती से किसी सही जीन वाली जगह पर जाकर कट लगा दे, तो मरीज के शरीर में म्यूटेशन या कैंसर का नया खतरा पैदा हो सकता है।

इसके अलावा, बाहर से डाले गए Cas9 प्रोटीन को शरीर का इम्यून सिस्टम कभी-कभी बाहरी हमलावर मानकर उस पर रिएक्ट कर सकता है। यह मरीज की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।

नियम-कायदे, सामाजिक बराबरी और खर्च

जब कोई तकनीक बहुत तेजी से आगे बढ़ती है, तो उसके इस्तेमाल से जुड़े नियम और नैतिकता के सवाल भी उठते हैं। जीन एडिटिंग मुख्य रूप से दो तरीकों से होती है–सोमैटिक एडिटिंग यानि जीन एडिटिंग का वह प्रकार है जिसमें किसी व्यक्ति की सामान्य शारीरिक कोशिकाओं जैसे त्वचा, रक्त, लिवर या फेफड़े की कोशिकाएं में बदलाव या सुधार किया जाता है। दूसरी तरफ जर्मलाइन एडिटिंग यानि जीन एडिटिंग का वह तरीका है, जिसमें मानव शरीर की उन कोशिकाओं में बदलाव किया जाता है, जो अगली पीढ़ी में ट्रांसफर हो सकती हैं। जैसे अंडाणु, शुक्राणु या भ्रूण ।


सोमैटिक एडिटिंग का मतलब है किसी व्यक्ति की सामान्य शारीरिक कोशिकाओं का इलाज करना। यह बदलाव सिर्फ उसी व्यक्ति के शरीर तक सीमित रहता है और उसकी आने वाली पीढ़ी में नहीं जाता। इसलिए इसे सही और मान्य माना गया है।

दूसरी ओर, जर्मलाइन एडिटिंग का मतलब है भ्रूण, स्पर्म या एग के जीन्स में बदलाव करना। इसका असर बच्चे के साथ-साथ उसकी आने वाली पीढ़ियों में भी चला जाएगा। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने जर्मलाइन एडिटिंग पर रोक लगाई है। इसका गलत इस्तेमाल मनपसंद खूबियों वाले डिजाइनर बेबी बनाने का रास्ता खोल सकता है, जो प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देगा।

इसके अलावा आम लोगों के लिए सबसे बड़ी रुकावट इस इलाज का भारी-भरकम खर्च है। फिलहाल अप्रूव्ड Casgevy थेरेपी से एक मरीज के इलाज का खर्च लगभग 22 से 30 लाख अमेरिकी डॉलर यानी भारतीय रुपये में लगभग 18 से 25 करोड़ रुपये बैठता है। इतने ज्यादा खर्च की वजह से यह इलाज आम इंसान की पहुंच से बाहर हो सकता है। इससे इलाज सिर्फ अमीर लोगों तक सीमित रहने और समाज में दूरी बढ़ने का खतरा है।

संक्षेप में कहें तो डीएनए रीराइटिंग या CRISPR तकनीक कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह एक ही बार में दुनिया की सभी बीमारियों को खत्म नहीं कर सकती। इंसान की ज्यादातर जटिल बीमारियां सिर्फ एक जीन पर निर्भर नहीं करतीं, उनमें खान-पान, माहौल और शरीर के कई दूसरे कारण भी शामिल होते हैं। लेकिन सिर्फ एक जीन की खराबी से होने वाली गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लाखों लोगों की जान बचाने के लिए यह तरीका बेहद कारगर है। जेनेटिक बीमारियों को जड़ से खत्म करने की दिशा में यह मेडिकल साइंस का एक बहुत बड़ा कदम है।

आने वाले समय में इस तकनीक की सुरक्षा बढ़ाकर इसके खतरों को कम करना होगा, साथ ही इलाज के खर्च को आम आदमी की पहुंच में लाना होगा। इन्हीं बातों पर इस तकनीक की असली सफलता टिकी है।