स्मार्टफोन के दौर में बुजुर्गों का संघर्ष: जानिए कैसे करें उनकी मदद
सुबह बालकनी में बैठकर चाय पीना और अखबार पढ़ना हमारे बुजुर्गों को बहुत पसंद था। बैंक जाकर पासबुक में सील लगवाना भी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी की एक खास खुशी थी। लेकिन पिछले 10-15 सालों में दुनिया बहुत तेजी से बदल गई है। आज एक छोटा सा स्मार्टफोन हमारी पूरी दुनिया चला रहा है।
सुबह की सब्जी खरीदना हो या डॉक्टर से मिलना हो, सब काम मोबाइल से होते हैं। बिजली का बिल भरना हो या किसी रिश्तेदार को पैसे भेजना हो, सब काम ऐप पर कुछ ही सेकंड में हो जाते हैं। इस डिजिटल क्रांति ने युवाओं की जिंदगी बहुत आसान बना दी है। 13-14 साल के बच्चों से लेकर 20-40 साल के कामकाजी लोगों के लिए यह टेक्नोलॉजी बहुत काम की चीज है।
लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक बड़ी बास्तबिक परेशानी भी खड़ी हो रही है। इस तेज रफ्तार भरी डिजिटल दुनिया में हमारे घर के बुजुर्ग आज कहां हैं? जिन दादा-दादी ने कभी हमें प्यार से चलना सिखाया था, आज वे खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। इस दौर में वे अचानक असहाय महसूस कर रहे हैं। यह दूरी सिर्फ उम्र की नहीं है। यह हमारे परिवार के रिश्तों के बीच की एक खामोश दूरी बन गई है।
अतीत और वर्तमान: जिंदगी का वो पुराना जाना-पहचाना मोड़
हमारे समाज में बुजुर्ग हमेशा परिवार के मुखिया रहे हैं। वे पूरे परिवार और रिश्तों को जोड़कर रखते थे। बैंक, पोस्ट ऑफिस या बगल की दुकान के लोग उनके जाने-पहचाने होते थे। तब अपने किसी भी काम के लिए उन्हें दूसरों से मदद नहीं मांगनी पड़ती थी। उन्हें कागज-कलम, कैश पैसे और फाइलों पर पूरा भरोसा था।
लेकिन आज के दौर में वो पुरानी दुनिया उनके लिए पीछे छूट गई है। आज बैंक जाओ तो कहते हैं, "मोबाइल ऐप का इस्तेमाल कीजिए।" पोस्ट ऑफिस में कहते हैं, "ऑनलाइन चेक कीजिए।" यहाँ तक कि एक कैब बुक करने के लिए भी ऐप चाहिए। इस अचानक बदलाव ने बुजुर्गों के आत्मविश्वास को कमजोर कर दिया है। यह सिर्फ नई तकनीक सीखने की बात नहीं है। यह अपनी आजादी और आत्मसम्मान को बचाए रखने की भी लड़ाई है।
आज की हकीकत: स्क्रीन के उस पार का संघर्ष और हाल के आंकड़े
आज बुजुर्गों की रोजमर्रा की जिंदगी में एक खामोश संघर्ष दिखता है। चलिए देखते है हाल के आंकड़े क्या बात बताते हैं ।
बुजुर्गों के लिए काम करने वाली संस्था 'हेल्पएज इंडिया' (HelpAge India) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 54% बुजुर्ग अपने रोज के डिजिटल कामों के लिए अपने बच्चों या पोते-पोतियों पर निर्भर हैं। एक छोटा सा रीचार्ज करने या दवा मंगवाने के लिए बार-बार छोटों से कहना उन्हें बुरा लगता है। इससे उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचती है।
'हेल्पएज इंडिया' (2024) और 'प्यू रिसर्च सेंटर' (2024) की रिपोर्ट के मुताबिक, 51% बुजुर्ग डर के मारे स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं करते। उन्हें डर रहता है कि कोई गलती न हो जाए या कोई ऑनलाइन फ्रॉड उनके पैसे न उड़ा ले। भारत के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2023-2024 की रिपोर्ट भी बताती है कि ऑनलाइन ठग अक्सर बुजुर्गों को आसानी से निशाना बनाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था 'आईटीयू' (ITU) की 2024-2025 की रिपोर्ट बताती है कि हमारे समाज के 66% बुजुर्ग मोबाइल ऐप्स को बहुत कठिन और उलझन भरा मानते हैं।
युवाओं की अपनी मजबूरियां और 'कॉग्निटिव फटीग'
यहाँ सिर्फ बुजुर्गों की परेशानी की बात करना काफी नहीं है। आज के युवाओं और नौकरीपेशा लोगों की तकलीफ को समझना भी बहुत जरूरी है। आज के 25 से 45 साल के युवाओं को 'सैंडविच जनरेशन' (Sandwich Generation) कहा जाता है। वे एक तरफ अपने बुजुर्ग माता-पिता और दूसरी तरफ अपने बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारियों के बीच पिस रहे हैं।
आज के दौर में परिवार चलाना आसान नहीं है। बढ़ती महंगाई, नौकरी की चिंता और काम की वजह से लोगों को दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। दिन भर ऑफिस के तनाव और ट्रैफिक में फंसने के बाद जब इंसान थका-हारा घर लौटता है, तो उसका दिमाग बहुत थक चुका होता है। साइकोलॉजी में इसे 'कॉग्निटिव फटीग' यानी दिमागी थकान कहते हैं।
इस दिमागी थकान के वक्त जब बुजुर्ग माता-पिता किसी ऐप के बारे में बार-बार पूछते हैं, तो युवा अक्सर चिढ़ जाते हैं। गुस्से में बो “आपसे नहीं होगा" या "आप टाइम खराब करते हैं” इत्यादि जैसे बातें करते है । लेकिन ऐसी बातें कहना गलत है। पर जरा ये भी तो सोचिए दिनभर की थकान के बाद सब्र टूट जाता है और यह चिढ़ बाहर आ जाती है।
व्यवस्था का संकट: बुजुर्ग, युवा और भागदौड़ भरी जिंदगी
इसलिए इस दूरी के लिए सिर्फ बुजुर्गों को दोष देना गलत है। वैसे ही थके हुए युवाओं को गैर-जिम्मेदार कहना भी सही नहीं है। पूरी गलती टेक्नोलॉजी पर डालना भी ठीक नहीं है। यह असल में एक सिस्टम की समस्या है।
आज टेक्नोलॉजी में अंग्रेजी भाषा बहुत जरूरी है। उसको अलग नहीं कर सकते । लेकिन अंग्रेजी के साथ-साथ अगर ऐप्स में हिंदी या बांग्ला जैसी दूसरी भाषाओं का विकल्प हो, तो बुजुर्गों के लिए काम आसान हो जाएगा। एक तरफ बुजुर्ग अपनी पुरानी दुनिया खोकर परेशान हैं। दूसरी तरफ युवा जिंदगी की भागदौड़ में थके हैं। इस वजह से रिश्तों का अपनापन कम हो रहा है।
युवाओं से खास अपील और 'पेशेंस प्रैक्टिस' का साइंस
इस स्थिति को बदलने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी। युवाओं से अपील है कि वे उस वक्त गुस्से के बजाय इसे एक 'पेशेंस प्रैक्टिस' (Patience Practice) यानी सब्र का अभ्यास मानकर अपनाएं।
साइकोलॉजी कहती है कि सब्र कोई जन्म से मिलने वाला गुण नहीं है। इसे अभ्यास से सीखा जा सकता है। अगर कोई इंसान कोशिश करे, तो वह 3 से 6 महीने के अभ्यास से अपने गुस्से पर काबू पाना सीख सकता है।
एक सेकंड के लिए अपने बचपन को याद कीजिए तो। जब आप छोटे थे, तब एक ही सवाल बार-बार पूछने पर क्या आपके माता-पिता गुस्सा होते थे? बिल्कुल नहीं । जैसे एक समझदार माता-पिता बच्चे को बिना मारे और बिना गुस्सा किए प्यार से समझाते हैं। वे एक ही बात का जवाब कई तरीकों से देते हैं ताकि बच्चा समझ सके। ठीक यही तरीका हमें बुजुर्गों के साथ भी अपनाना होगा।
ढलती उम्र में बुजुर्गों में सीखने की रफ्तार धीमी हो जाती है। लेकिन अगर युवा 3-4 महीने सब्र का अभ्यास करें, तो उसके बाद बुजुर्गों की मदद भी होगी और युवाओं का मन भी शांत रहेगा।
काम के टिप्स, टेक्नोलॉजी का हल और साइबर सुरक्षा
बुजुर्गों को टेक्नोलॉजी से जोड़ने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं ।
शांत समय निकालें: दिनभर के तनाव के बीच इस मामले में बात न करें। रात में या छुट्टी के दिन 30-40 मिनट का समय बुजुर्गों को दें और उन्हें उनकी जरूरत के डिजिटल माध्यमों का उपीयोग उनको सिखाइए।
फोन को आसान बनाना और 'सीनियर मोड': फोन में अक्षरों का साइज बड़ा कर दें। जरूरी नंबरों को 'स्पीड डायल' पर सेव रखें। ऐप कंपनियों को भी ऐप या वेबसाइट में 'सीनियर सिटीजन मोड' देना चाहिए। इसमें उनके लिए कम ऑप्शन और बड़े अक्षरों से काम आसान हो जाएगा।
डायरी में लिख कर दें: सिर्फ मुंह से न बताएं। ऐप चलाने के 2-3 आसान स्टेप्स डायरी में बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दें। अगर ऐप में अपनी भाषा का ऑप्शन होगा, तो वे आसानी से सीख सकेंगे।
सुरक्षा के 3 नियम: बुजुर्गों को 3 बातें जरूरी तौर पर सिखाएं–किसी को ओटीपी (OTP) न दें, अनजान लिंक पर क्लिक न करें, और पैसों के लेन-देन में घर के लोगों की मदद जरूर लें।
निष्कर्ष: सबको साथ लेकर चलने की उम्मीद
टेक्नोलॉजी का असली मकसद लोगों को जोड़ना है, कभी उन्हें अलग करना नहीं। आगे बढ़ते हुए हमें अपने बुजुर्गों को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। पैसे कमाने का दबाव और काम की मजबूरी सच है। लेकिन अगर युवा थोड़ा सब्र और अपनापन दिखाएं, तो कोई भी बुजुर्ग खुद को अकेला महसूस नहीं करेगा। आइए, मिलकर एक ऐसा समाज बनाएं जहां टेक्नोलॉजी भी हो और अपनों का प्यार भी। जहां हर पीढ़ी के लोग एक साथ आगे बढ़ सकें।
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