समुद्र जिसका, ताकत उसकी: जानिए कैसे ये संकरे समुद्री रास्ते संभालते हैं दुनिया का 80% व्यापार
फ़ारस की खाड़ी के शांत और नीले पानी को दूर से देखिए...पहली नज़र में यह बेहद ख़ामोश नज़र आता है। लेकिन जियोपॉलिटिक्स और इकॉनमी के जानकारों के लिए यह ख़ामोशी असल में एक छलावा है। यह जगह ग्लोबल इकॉनमी की सबसे संवेदनशील धड़कन है।
हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर मिलिट्री टेंशन गंभीर स्थिति में पहुँच गया। ईरान ने इस रणनीतिक समुद्री रूट को बंद कर दिया, जिसके चलते पूरे ग्लोबल मार्केट पर गहरा असर पड़ा है।
इस रूट के बंद होते ही अंतरराष्ट्रीय मार्केट में क्रूड ऑयल की क़ीमतें अचानक 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गईं। इसके साथ ही ट्रेडिंग शिपमेंट के लिए वॉर रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम सामान्य से 300-400 प्रतिशत तक चढ़ गया।
फ़ारस की खाड़ी की इस संकरी समुद्री पट्टी से हर दिन लगभग 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल और एलएनजी गुज़रता था। यह पूरी दुनिया की डेली तेल खपत का लगभग 17-20 प्रतिशत हिस्सा है। होर्मुज को बंद करने का असर केवल फ्यूल क्राइसिस तक सीमित नहीं है। इसका सीधा मतलब आप बखूबी समझ रहे है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात केवल इस मिलिट्री टेंशन की हेडलाइंस तक सीमित नहीं है। यह क्राइसिस दुनिया की राजनीति की उस सच्चाई को सामने लाता है, जिसकी वजह से सैकड़ों सालों से समुद्र के ये संकरे रास्ते पूरे ग्लोबल ट्रेड की मुख्य चाबी बने हुए हैं।
सभी मैरीटाइम चोक पॉइंट्स: अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आंकड़ों में वैश्विक व्यापार की धमनियां
इस संदर्भ में जब हम अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के साथ दुनिया के ट्रेड को देखते हैं, तो एक ही बात साफ़ उभरकर आती है–समुद्र जिसका, ताक़त उसकी। आधुनिक ग्लोबलाइजेशन का ज़्यादातर ट्रेड इसी समंदर के रास्तों से होकर गुज़रता है।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNCTAD की ताज़ा रिव्यू ऑफ मैरीटाइम ट्रैफिक रिपोर्ट के डेटा के अनुसार, वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया के कुल ट्रेड गुड्स का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा समुद्री रास्तों से तय होता है। वैल्यू के हिसाब से यह 70 प्रतिशत से अधिक है। यह विशाल ट्रेड कुछ ही संकरे समुद्री रास्तों यानी मैरीटाइम चोक पॉइंट्स पर टिका है। ये रास्ते पूरी ग्लोबल इकॉनमी के लिए ऑन-ऑफ स्विच का काम करते हैं।
चलिए जानते है अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़े इस स्थिति को स्पष्ट रूप देने के लिए क्या दर्शाते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान और ओमान के बीच फैला हुआ इस जलमार्ग में यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन और लॉयड्स लिस्ट के डेटा के अनुसार, इस 21 मील चौड़े रूट से रोज़ाना 20.5 से 21 मिलियन बैरल तेल गुज़रता था। यह समुद्री रास्ते से ले जाए जाने वाले कुल तेल का 30% और ग्लोबल खपत का 20% से अधिक है।
मलक्का जलडमरूमध्य: मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के बीच फैला हुआ इस प्रणाली में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के मुताबिक, हर साल 85,000 से अधिक मर्चेंट शिप्स गुज़रते हैं। यह ग्लोबल ट्रेड का 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा और एशिया के 60% कच्चे तेल की आपूर्ति को संभालता है।
बाब-अल-मंदेब: यमन और जिबूती के बीच स्थित है, जो लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है। UNCTAD के डेटा के अनुसार, वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 10% से 12% हिस्सा इसी रास्ते से गुज़रता है।
स्वेज नहर: ये नहर उत्तर-पूर्वी मिस्र में स्थित है, जो भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNCTAD और स्वेज नहर प्राधिकरण के डेटा के अनुसार, वैश्विक व्यापार का लगभग 12% से 15% हिस्सा और समुद्री कंटेनर ट्रैफ़िक का लगभग 30% इसी क्षेत्र से होकर गुज़रता है।
पनामा नहर: पनामा नहर मध्य अमेरिका के पनामा देश में स्थित है, जो अटलांटिक महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ती है। अंतरराष्ट्रीय संस्था UNCTAD और पनामा नहर प्राधिकरण के डेटा के अनुसार, वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 3% से 5% हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुज़रता है।
इतिहास की सीख: चोक पॉइंट ब्लॉक होने पर आम लोगों की जिंदगी पर असर
ये आंकड़े दिखाते हैं कि पूरी दुनिया इन संकरे समुद्री कॉरिडोर पर किस हद तक निर्भर है। इतिहास में जब भी इस निर्भरता में रुकावट आई है, उसका सबसे गहरा इम्पैक्ट सीधे आम जनता पर पड़ा है। ख़ासकर एशिया और अफ़्रीका के डेवलपिंग कंट्रीज को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक मिसाल 1967 से 1975 तक स्वेज नहर का बंद रहना है। छह दिवसीय युद्ध के बाद मिस्र ने स्वेज नहर को बंद कर दिया था। इसके कारण शिप्स को अफ़्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर लगाना पड़ा, जिससे फ्रेट चार्ज 400 प्रतिशत तक बढ़ गया।
ब्रिटेन के द टाइम्स और अमेरिका के द न्यूयॉर्क टाइम्स के आर्काइव्स बताते हैं कि उस समय यूरोप में तेल की राशनिंग करनी पड़ी थी। लेकिन इसका सबसे गंभीर असर ग्लोबल साउथ पर हुआ। मिस्र ने स्वेज नहर की अपनी कमाई गंवा दी और उसकी इकॉनमी प्रभावित हुई। अफ़्रीका में खाद न पहुँचने से केन्या और तंजानिया का एग्रीकल्चर सेक्टर प्रभावित हुआ। वहीं अमेरिका से PL-480 गेहूँ देरी से पहुँचने के कारण भारत में फूड क्राइसिस और महँगाई बढ़ गई। इसके अलावा भारत और श्रीलंका से चाय, जूट और मसालों का निर्यात भी रुक गया था।
इसके बाद 1980 से 1988 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान टैंकर वॉर की स्थिति बनी। इसकी ख़बरें फाइनेंशियल टाइम्स और द वाशिंगटन पोस्ट की मुख्य हेडलाइंस बनीं। होर्मुज में शिप्स पर हमलों के कारण तेल के दाम दोगुने हो गए, जिससे भारत, फ़िलीपींस और थाईलैंड का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व तेज़ी से कम होने लगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यही ऑयल क्राइसिस आगे चलकर भारत के 1991 के फाइनेंशियल क्राइसिस की एक प्रमुख वजह बना।
हाल के समय की बात करें, तो मार्च 2021 में एवर गिवन शिप ने 6 दिनों के लिए स्वेज नहर को जाम कर दिया था। लॉयड्स लिस्ट के मुताबिक, इससे हर दिन 9.6 बिलियन डॉलर का ट्रेड रुका। यूरोप और अमेरिका में सप्लाई चेन प्रभावित हुई, जबकि एशिया में कंटेनर क्राइसिस की स्थिति पैदा हो गई। इसके चलते भारत, बांग्लादेश और वियतनाम के कृषि उत्पाद बंदरगाहों पर अटके रहने से ख़राब हो गए और छोटे व्यापारियों को बड़ा नुकसान हुआ।
वर्तमान ध्रुवीकरण और व्यापारिक रास्तों की भू-राजनीति
इतिहास के इन अनुभवों के बावजूद स्थिति आज भी संवेदनशील बनी हुई है। ये समुद्री रूट्स अब केवल व्यापारिक मार्ग नहीं रहे, बल्कि दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच मिलिट्री और जियोपॉलिटिकल होड़ का केंद्र बन चुके हैं। विश्व आज स्पष्ट रूप से दो बड़े गुटों में बँटा दिखता है–एक तरफ़ अमेरिका की अगुवाई वाला पश्चिमी गुट है, तो दूसरी तरफ़ चीन, रूस और ईरान का गठबंधन है। जबकि ये स्थिति कभी बदल सकती है, जिसके संकेत मिलने शुरू हो गए है।
ईरान द्वारा होर्मुज की घेराबंदी हो या लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले, यह सब इसी जियोपॉलिटिकल प्रेशर का परिणाम है। इन ख़तरों से बचने के लिए शिप्स को अफ़्रीका का चक्कर लगाकर जाना पड़ रहा है, जिससे यात्रा में 12 से 14 दिन का एक्स्ट्रा टाइम लग रहा है। नतीजतन, एक 40-फ़ीट कंटेनर का भाड़ा 1,500 डॉलर से बढ़कर 4,000 से 5,000 डॉलर तक पहुँच गया है। फ्यूल का यह अतिरिक्त खर्च और सिक्योरिटी का भारी बोझ अंततः महँगाई बनकर आम जनता के बजट को प्रभावित कर रहा है।
भविष्य के खतरे: समुद्री व्यापार के नए संवेदनशील इलाके
महँगाई का यह प्रेशर आगे किस दिशा में जाएगा, इसका अनुमान वर्तमान जियोपॉलिटिक्स से लगाया जा सकता है। आने वाले समय में इन समुद्री रूट्स को लेकर कॉन्फ्लिक्ट और गहरा हो सकता है। रणनीतिकारों के अनुसार, भविष्य का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट दक्षिण चीन सागर और मलक्का दुविधा बनने की संभावना है।
यदि आने वाले समय में ताइवान जलडमरूमध्य को लेकर चीन और अमेरिका के बीच मिलिट्री कॉन्फ्लिक्ट होता है, तो मलक्का जलडमरूमध्य का मार्ग प्रभावित होना निश्चित माना जा रहा है। चीन अपनी ज़रूरत का 80% कच्चा तेल इसी रूट से मँगवाता है। इसलिए यह लाइफलाइन बाधित होते ही चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी इंडस्ट्रियल इकॉनमी की गतिविधियां कुछ ही हफ़्तों में ठप हो सकती हैं।
इसके अलावा, आधुनिक युद्धनीति में बिना किसी विशाल नौसेना के भी रूट्स को रोका जा सकता है। आज सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों के ज़रिये छोटे उग्रवादी संगठन भी इन संकरे समुद्री रास्तों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
विकल्प के तौर पर रूस के नॉर्दर्न सी रूट या IMEC जैसे ज़मीनी रास्तों और रेल नेटवर्क की चर्चा ज़रूर होती है, लेकिन आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में ग्लोबल ट्रेड का केवल 3 से 5 प्रतिशत हिस्सा ही ज़मीनी मार्गों से संभव है। बाकी 95 प्रतिशत ट्रेड के लिए समुद्री मार्ग ही मुख्य माध्यम है। इसी कारण से दुनिया का राजनीतिक ढांचा चाहे जैसा भी बदले, इन संकरे समुद्री द्वारों पर जिनका नियंत्रण होगा–21वीं सदी की ग्लोबल इकॉनमी का संचालन भी वही करेंगे।
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