UPI के बाद अब e-Rupee: भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आपकी ज़िंदगी पर क्या इफ़ेक्ट डालेगा?
सुबह सड़क के कोने वाली चाय की दुकान पर ₹10 की चाय पीकर जब आप पॉकेट से मोबाइल निकालते हैं और क्यूआर कोड स्कैन करते हैं, तो यह बहुत नॉर्मल लगता है। लेकिन कुछ ही साल पहले हालात बिल्कुल अलग थे। तब लोग ₹5 के सिक्के के लिए पॉकेट में भारी सिक्के लेकर घूमते थे, या बैंक में अपना ही जमा पैसा निकालने के लिए लंबी लाइनों में घंटों खड़े रहते थे। वही भारत आज डिजिटल पेमेंट में पूरी दुनिया को रास्ता दिखा रहा है।
डेली लाइफ की सब्ज़ी-किराने के सामान से लेकर होटल का बड़ा बिल चुकाना–सब कुछ अब स्मार्टफ़ोन पर एक टच में ही हो रहा है। यह बड़ा चेंज रातों-रात नहीं हुआ है। इसके पीछे भारत का एक वेल-प्लान्ड सिस्टम काम कर रहा है। इसे 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' या शॉर्ट में DPI कहा जाता है। और इस पूरे सिस्टम का मेन सेंटर है हमारा जाना-पहचाना यूपीआई सिस्टम। इसी की लेटेस्ट कड़ी के रूप में रिज़र्व बैंक का 'ई-रुपया' (e-Rupee) सामने आया है।
डिजिटल सिस्टम का लीगल बेस और UPI का सफर
आज की इस आसान और सेफ़ पेमेंट व्यवस्था के पीछे कई ठोस लीगल फ़ैसले रहे हैं। भारत सरकार ने 2007 में 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट' पास किया। इससे देश में इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन की मजबूत और लीगल नींव रखी गई। इसी के बेस पर 2008 में रिज़र्व बैंक और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने मिलकर 'नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया' (NPCI) का गठन किया।
इसके बाद अप्रैल 2016 में ऑफिशियल तौर पर 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' यानी UPI की शुरुआत हुई। बहुत कम समय में यह देश के फाइनेंशियल सिस्टम का मेन हिस्सा बन गया। UPI की भारी सक्सेस के बाद RBI ने 1 नवंबर 2022 को होलसेल सेक्टर के लिए और 1 दिसंबर 2022 को रिटेल सेक्टर के लिए अपनी डिजिटल करेंसी यानि 'ई-रुपया' लॉन्च करने का ऐलान किया। यह पूरा सिस्टम मुख्य रूप से आधार, UPI और डिजीलॉकर–इन तीन मजबूत पिलर्स वाले 'इंडिया स्टैक' (India Stack) पर टिका है।
UPI क्यों है मेन सेंटर और e-Rupee से इसका डिफरेंस
आज के दिनों में हमारे डिजिटल लेन-देन का सबसे बड़ा बेस UPI है। बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल से लेकर लोकल दुकानों पर लटकते QR कोड इसी बात का प्रूफ़ हैं। हालांकि, UPI और e-Rupee दोनों के काम करने का तरीक़ा बिल्कुल अलग है।
एक तरफ UPI एक ब्रिज की तरह काम करता है। यह पैसे को आपके बैंक अकाउंट से सीधे सामने वाले के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करता है। यानी हर बार लेन-देन में बैंक का सर्वर बीच में जुड़ा होता है। दूसरी ओर, e-Rupee असल में पेपर कैश का ही एक डिजिटल वर्ज़न है। जैसे आपके वॉलेट में नोट रखे होते हैं, ठीक वैसे ही यह आपके मोबाइल के 'डिजिटल वॉलेट' में जमा डिजिटल नोट हैं। इसमें लेन-देन के दौरान सीधे बैंक के इंवॉल्वमेंट की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसलिए अगर किसी वजह से बैंक का सर्वर डाउन भी हो, तब भी वॉलेट-टू-वॉलेट सीधे पैसों का ट्रांसफर नहीं रुकता।
आम आदमी की ज़िंदगी में इसके प्रैक्टिकल फायदे
UPI ने आम लोगों की डेली शॉपिंग को पहले से काफी टेंशन-फ्री बना तो दिया है। लेकिन फेस्टिवल्स या बिज़ी दिनों में अक्सर बैंक सर्वर डाउन हो जाता है। इससे पेमेंट अटकने की प्रॉब्लम होती थी। पर e-Rupee में ऐसा कोई इश्यू नहीं है।
दूर-दराज़ या पहाड़ी इलाकों में अक्सर मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर होता है। वहाँ स्पेशल ऑफ़लाइन टेक्नोलॉजी के ज़रिए e-Rupee से आसानी से शॉपिंग की जा सकती है। इसके अलावा अक्सर ₹1 या ₹2 के चेन्ज की जगह दुकानदार हमे टॉफ़ी थमा देते थे। e-Rupee से इस पुरानी प्रॉब्लम से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिलता है। इसमें पाई-पाई का यानि छोटे से छोटे अमाउंट सटीक हिसाब से डिजिटली पे किया जा सकता है। और पेपर नोटों की तरह भीगने, फटने या खो जाने का रिस्क तो इसमें बिल्कुल नहीं है।
मार्केट में डिमांड और लेटेस्ट डेटा
भारत का यह पेमेंट्स इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया भर में चर्चा में है। NPCI के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, देश में फिलहाल हर महीने औसतन 1,700 से 1,800 करोड़ लेन-देन पूरे हो रहे हैं। इनकी कुल वैल्यू ₹23 लाख करोड़ से भी ज़्यादा है।
दुनिया भर में होने वाले कुल रियल-टाइम डिजिटल लेन-देन का 46% से अधिक हिस्सा अकेले भारत में होता है। इस समय देश के प्रमुख सरकारी और प्राइवेट बैंक e-Rupee वॉलेट का ऑप्शन दे रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि इसमें बिजनेसमैन को कोई एक्स्ट्रा सर्विस चार्ज या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नहीं देना पड़ता।
देश की वित्तीय बचत और 'प्रोग्रामेबल मनी'
सरकार को हर साल नए नोट प्रिंट करने पड़ते हैं। उन्हें सेफ़ली एटीएम तक पहुँचाने और पुराने ख़राब नोटों को नष्ट करने में औसतन ₹4,000 से ₹5,000 करोड़ खर्च होते हैं। e-Rupee का यूज़ बढ़ने से सरकार का यह भारी खर्च काफी हद तक कम हो जाएगा।
इसके अलावा e-Rupee का एक और एडवांस्ड फ़ीचर है–'प्रोग्रामेबल मनी'। एग्जांपल के लिए मान लीजिए, सरकार किसी किसान को खाद या बीज खरीदने के लिए फाइनेंशियल हेल्प देती है। इस पैसे को टेक्नोलॉजी के ज़रिए कोड किया जा सकता है। इससे इसका यूज़ सिर्फ़ खाद या बीज की दुकान पर ही हो सकेगा। इस तरह सरकारी मदद के गलत इस्तेमाल या करप्शन पर पूरी तरह रोक लगेगी।
e-Rupee की सिक्योरिटी और स्कैम से बचने के टिप्स
e-Rupee का मेन सिस्टम बेहद सेफ़ है। फिर भी अवेयरनेस की कमी का फायदा उठाकर फ्रॉड करने वाले कुछ तरीक़े अपना सकते हैं। इसके मुख्य कुछ रूप ये हैं ।
पहला, वॉलेट सेटअप की 12 शब्दों की सीक्रेट 'रिकवरी की' धोखे से हासिल करके अकाउंट क्लोन करना। दूसरा, e-Rupee को क्रिप्टोकरेंसी समझकर "प्राइस बढ़ेगा" जैसी फ़र्ज़ी स्कीमों में इन्वेस्ट करवाना। तीसरा, सरकारी डिस्काउंट के फ़र्ज़ी 'e-Rupee वाउचर' लिंक से वॉलेट खाली करवाना। चौथा, बिना इंटरनेट वाले एरिया में फ़र्ज़ी ऐप पर 'पेमेंट सक्सेसफ़ुल' दिखाकर दुकानदारों को ठगना।
इन रिस्क से बचने के लिए लोगों को कुछ सिंपल रूल्स ध्यान में रखना ज़रूरी है। बैंक स्टाफ़ बनकर कोई कॉल करे तब भी अपनी सीक्रेट 'रिकवरी की' किसी से शेयर न करें। इसे कागज पर लिखकर सेफ़ रखें। यह बात हमेशा याद रखें कि 1 e-Rupee की वैल्यू हमेशा ₹1 के बराबर ही रहती है। इसलिए पैसे डबल करने वाली फ़र्ज़ी स्कीमों के चक्कर में बिल्कुल न पड़ें। किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने के बजाय सीधे ऑफिशियल ऐप के अंदर ही वाउचर चेक करें के बो रियल है या नहीं। और दुकानदारों को चाहिए कि अपने वॉलेट में असली पैसे क्रेडिट होने की कन्फर्मेशन के बाद ही सामान कस्टमर को दें।
e-Rupee की करेंट ग्राउंड रियलिटी और RBI का रुख
टेक्नोलॉजी के तौर पर e-Rupee काफी सक्सेसफ़ुल है कदम है। लेकिन आम लोगों के बीच इसके डेली यूज़ की स्पीड फिलहाल थोड़ी स्लो है। इसका बड़ा कारण है यूपीआई । UPI लोगों की हैबिट में इस कदर बस चुका है कि, वे किसी नए वॉलेट को यूज़ करने की ज़रूरत महसूस नहीं कर रहे हैं।
हालाँकि, RBI या सरकार इससे पीछे नहीं हटी है। वे अब ज़बरदस्ती ट्रांजैक्शन का नंबर बढ़ाने के बजाय इसके टेक्निकल सिस्टम को और मजबूत करने पर फ़ोकस कर रहे हैं। RBI का मेन गोल UPI को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि पेपर कैश का एक भरोसेमंद डिजिटल बैकअप तैयार रखना है। हाल ही में UPI और e-Rupee के QR कोड को एक जैसा (Interoperable) बना दिया गया है। अब एक ही सिंपल QR कोड स्कैन करके दोनों तरीक़ों से पेमेंट करना आसान हो गया है।
आख़िरी बात
भारत का यह डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, UPI की सक्सेस और e-Rupee की शुरुआत केवल कोई टेक्निकल तरक्की नहीं है। यह देश की फ़ाइनेंशियल आज़ादी की ओर बढ़ता हुआ एक बड़ा कदम है। 2007 में कानून बनने से लेकर 2016 के UPI और 2022 के e-Rupee तक–यह लंबा सफ़र आज भारत को ग्लोबल लेवल पर टेक्नोलॉजी में सबसे आगे खड़ा करता है।
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