Bad Habits से आजादी: 6 Proven Scientific Strategies जो काम करती हैं
हर साल न्यू ईयर रिजोल्यूशन या रात को सोने से पहले हममें से कई लोग खुद से एक वादा करते हैं–आने वाले दिनों से या कल से देर तक नहीं सोऊंगा, काम के बीच में बार-बार सोशल मीडिया स्क्रोल नहीं करूंगा, या अब प्रोसेस्ड फ़ास्ट फ़ूड या मिठाई नहीं खाऊंगा। लेकिन अगली सुबह होते ही या कुछ दिन बीतते वह वादा टूट जाता है। हम फिर से उसी पुराने चक्र में लौट जाते हैं। जब ऐसा बार-बार होता है, तो हमें खुद पर गुस्सा आता है। मन में एक अपराधबोध पैदा होता है। हम मान लेते हैं कि हममें सेल्फ कंट्रोल या इच्छाशक्ति की कमी है।
लेकिन मॉडर्न न्यूरोसाइंस हमें एक अलग ही बात बताता है। साइंस के मुताबिक, बुरी आदतें न छोड़ पाना चरित्र की कमजोरी या आलस नहीं है। यह असल में हमारे दिमाग का एक स्वाभाविक बायोलजिकल डिज़ाइन यानि शारीरिक बनावट और काम करने का तरीका है। आखिर हमारा दिमाग इन आदतों को कैसे पकड़े रहता है? जब तक हम यह नहीं समझेंगे, तब तक सिर्फ इच्छाशक्ति के दम पर बदलाव लाना लगभग नामुमकिन है।
दिमाग का अपना 'हाईवे': न्यूरोप्लास्टिसिटी
मान लो जंगल के किसी कच्चे रास्ते पर अगर कोई रोज़ चलने लगे, तो वहाँ पक्की निशान बन जाती है। लंबे समय तक न चलने पर घास उगकर वह रास्ता फिर से बंद हो जाता है। हमारा दिमाग भी ठीक ऐसे ही काम करता है। हमारी हर सोच या आदत के पीछे न्यूरोप्लास्टिसिटी काम करती है। यह अनुभवों के आधार पर खुद को ढालने और नए रास्ते बनाने की दिमाग की एक ख़ास खूबी है।
जब हम कोई काम पहली बार करते हैं, तो दिमाग के न्यूरॉन्स यानि तंत्रिका कोशिकाओं के बीच एक नया रास्ता बनता है। इसे न्यूरल पाथवे यानि न्यूरॉन्स के संपर्क का रास्ता कहते हैं। न्यूरोवैज्ञानिक डोनाल्ड हेब का एक प्रसिद्ध नियम है–हेब्स लॉ (Hebb's Law)। इसके अनुसार Neurons that fire together, wire together, यानी जो न्यूरॉन्स एक साथ सक्रिय होते हैं, वे आपस में मज़बूती से जुड़ जाते हैं, यानि रिश्ते बना लेते है।
जब आप रोज़ खाली समय मिलते ही फोन हाथ में लेते हैं, तो आपका दिमाग इस काम के लिए एक पक्का न्यूरल रास्ता बना लेता है। यह रास्ता इतना पक्का हो जाता है कि दिमाग बिना कोई अतिरिक्त ऊर्जा खर्च किए ऑटोपायलट मोड में उस पर चलने लगता है। इसी को हम बुरी आदत कहते हैं।
आदतों का चक्र और डोपामिन का खेल
अब सवाल यह है कि दिमाग कैसे तय करता है कि कौन-सी आदत बार-बार दोहरानी है? इसका जवाब छिपा है आदतों के चक्र यानी हैबिट लूप और डोपामिन नाम के केमिकल में। शोधकर्ता चार्ल्स डुहिग के अनुसार, हर आदत के मुख्य रूप से तीन स्टेप्स होते हैं । पहला, क्यू यानि माहौल से मिलने वाला कोई संकेत जैसे नोटिफिकेशन की आवाज़ या अकेलापन इत्यादि। दूसरा, रूटीन यानि आदत वाला काम अर्थात मुख्य बुरी आदत को पूरा करना–जैसे घंटों रील्स या शॉर्ट्स देखना। तीसरा, रिवॉर्ड यानि तुरंत मिलने वाली खुशी जैसे काम खत्म होने पर दिमाग को मिलने वाली थोड़ी देर की राहत या आराम।
यह पूरी प्रक्रिया डोपामिन नाम के एक न्यूरोट्रांसमीटर यानि दिमागी रसायन से चलती है। हम अक्सर सोचते हैं कि डोपामिन सिर्फ "खुशी" देता है। लेकिन साइंस कहता है कि डोपामिन का असली काम खुशी देना नहीं है। इसका काम खुशी की 'उम्मीद' या तीव्र लालसा (Craving) पैदा करना है। जैसे ही आपको कोई जाना-पहचाना संकेत दिखता है, दिमाग तुरंत डोपामिन रिलीज़ करता है। यह केमिकल आपको वह काम करने के लिए उकसाता है।
इच्छाशक्ति क्यों बार-बार हार जाती है?
अक्सर लगता है कि सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति से कोई भी आदत रातों-रात बदली जा सकती है। लेकिन साइंस बताता है कि, इच्छाशक्ति एक सीमित और जल्दी खत्म होने वाली एनर्जी है। हमारे दिमाग के दो मुख्य हिस्से इस प्रोसेस में शामिल होते हैं । एक, हमारे माथे के ठीक पीछे प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स होता है। यह हिस्सा तर्क, फैसले लेने और आत्म-नियंत्रण का केंद्र है। जब हम कहते हैं मैं आज फ़ास्ट फ़ूड नहीं खाऊंगा, तो यही हिस्सा एक्टिव होता है। दूसरी ओर, दिमाग के अंदर गहराई में बेसल गैंग्लिया (Basal Ganglia) होता है। यह हमारी आदतों का गोदाम है। यह बिना किसी सोच-विचार के हमारी पुरानी आदतों को ऑटोमैटिक चलाता है।
प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स दिन भर तरह-तरह के फैसले लेते-लेते थक जाता है। इस मानसिक थकावट को इगो डिप्लीशन यानि इच्छाशक्ति की थकावट कहते हैं। दिन भर के काम के बाद शाम को जब प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स थक जाता है, तब बेसल गैंग्लिया फौरन दिमाग का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेता है। इसी वजह से शाम या रात होते ही हम फिर से अपनी पुरानी बुरी आदतों में फँस जाते हैं। तो इसका कोई इलाज है ? आइए जानते है विज्ञान क्या कहता है।
विज्ञान के अनुसार आदतें बदलने के 6 कारगर तरीके
अक्सर कहा जाता है कि किसी भी आदत को बनने में 21 दिन लगते हैं। लेकिन साइंस ने इस बात को पूरी तरह खारिज कर दिया है। 2010 में यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की न्यूरोवैज्ञानिक डॉ. फिलिपा लैली और उनकी टीम ने इस पर शोध किया। इसमें पाया गया कि दिमाग में नई आदत को ऑटोमैटिक बनने में औसतन 66 दिन यानि लगभग 2 महीने का समय लगता है।
अब हम जानते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है। इसलिए रिसर्च से साबित हुए इन 6 मूल तरीकों का इस्तेमाल करके हम अपने न्यूरल नेटवर्क को नए सिरे से तैयार कर सकते हैं ।
आदत बदलने का नियम: दिमाग से पुराना न्यूरल रास्ता रातों-रात मिटाया नहीं जा सकता। इसलिए बुरी आदत को जबरदस्ती बंद न करें। उसकी जगह कोई अच्छा काम शुरू करें। संकेत और इनाम वही रखें, बस बीच का रूटीन बदल दें । जैसे तनाव बढ़ने पर सिगरेट पीने के बजाय 2 मिनट गहरी सांस लें।
फ्रिक्शन या रुकावट बढ़ाना: बुरी आदत को पूरा करना दिमाग के लिए थोड़ा मुश्किल बना दें। रिसर्च से पता चलता है कि किसी काम में सिर्फ 20 सेकंड की रुकावट जोड़ने पर ही दिमाग आलस के कारण उस काम से बचने लगता है । जैसे रात में फोन इस्तेमाल से बचने के लिए उसे दूसरे कमरे में रखकर सोएं।
माइक्रो-हैबिट्स या 2 मिनट का नियम: नया न्यूरल रास्ता बनाने के लिए बड़ा लक्ष्य न चुनें। छोटे-छोटे स्टेप्स उठाएं। रोज़ 1 घंटा किताब पढ़ने के बजाय सिर्फ 2 पन्ने पढ़ने की आदत डालें। इससे प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स थकता नहीं है, लेकिन दिमाग में नए न्यूरल रास्ते की नींव पड़ जाती है।
साफ योजना बनाना: 2006 में डॉ. पीटर गोलविज़र और डॉ. पास्कल शीरन की रिसर्च में पाया गया कि धुंधली सोच के बजाय 'अगर-तो' (If-Then) की पक्की योजना बनाने से सफलता की दर 65% तक बढ़ जाती है । जैसे अगर शाम के 7 बजेंगे, तो मैं 30 मिनट टहलने जाऊंगा।
पसंद के साथ जोड़ना: डॉ. केटी मिल्कमैन के 2021 के शोध से साबित हुआ है कि कठिन काम के साथ अपनी किसी पसंदीदा चीज़ को जोड़ने से आदत बने रहने की संभावना 10% से 51% तक बढ़ जाती है । जैसे घर का काम करते समय या टहलते समय अपना पसंदीदा पॉडकास्ट या ऑडियोबुक सुनना।
सामाजिक जवाबदेही और पहले से समझौता: हमारा दिमाग हमेशा समाज में अपनी छवि बनाए रखने के प्रति संवेदनशील होता है। किसी दोस्त या करीबी को अपने लक्ष्य के बारे में बताएं या नाकाम होने पर पेनल्टी देने का समझौता करें। यह सामाजिक जवाबदेही आपके प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स को अलर्ट रखती है और ऑटोमैटिक गलतियों को रोकती है।
निष्कर्ष: दिमाग को फिर से नया आकार देने का समय
हमारा दिमाग कोई स्थिर चीज़ नहीं है। यह बेहद लचीला है। न्यूरोप्लास्टिसिटी से सबसे अच्छी बात यह पता चलती है कि किसी भी उम्र में दिमाग के न्यूरल कनेक्शनों को फिर से नया रूप देना या री-वायर करना बिल्कुल संभव है।
इसलिए बार-बार बुरी आदतों में लौटने के लिए खुद को दोषी न मानें। आदतों के पीछे छिपे साइंस के नियमों का इस्तेमाल करें। छोटे-छोटे कदमों से रोज़ रुकावटें बनाएं और पुराने रूटीन को अच्छे विकल्पों से बदलें। साइंस को अपना साथी बनाकर आगे बढ़ेंगे, तो बुरी आदतों का जाल तोड़ना न सिर्फ मुमकिन होगा, बल्कि बेहद आसान भी हो जाएगा।
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