भारत में Manufacturing सेक्टर क्यों रहा कमजोर? जानिए सर्विस सेक्टर और कृषि के बीच का फासला और टिकाऊ समाधान का रास्ता
विकास का उल्टा रास्ता और भारतीय अर्थव्यवस्था
अगर हम दुनिया के बड़े देशों के विकास के सफर को देखें, तो एक सीधा-सा पैटर्न दिखाई देता है। आमतौर पर कोई भी देश सबसे पहले खेती-किसानी से अपनी शुरुआत करता है। धीरे-धीरे बे खेतों से निकलकर लोग और पैसा मैन्युफैक्चरिंग यानी कारखानों की ओर बढ़ते हैं। नए कारखाने बनने और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरने से खेती के अतिरिक्त मजदूरों को काम मिलने लगता है। फिर जब यह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत हो जाता है, तब देश हाई-टेक सर्विस सेक्टर की तरफ बढ़ता है। चीन, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों ने बिल्कुल इसी रास्ते को अपनाया।
लेकिन भारत का सफर कुछ अलग ही रहा। भारत ने खेती से सीधे छलांग लगाई और हाई-टेक सर्विस सेक्टर में पहुंच गया। इस चक्कर में बीच का सबसे जरूरी पड़ाव यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बहुत पीछे छूट गया। अर्थशास्त्री भारत की इस अनोखी स्थिति को स्ट्रक्चरल विरोधाभास कहते हैं।
जीडीपी में सर्विस सेक्टर का दबदबा और खेती में फंसी आधी आबादी
NSO यानि नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस के 2024-25 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत की कुल कमाई यानी जीडीपी में सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा यानि लगभग 54 से 55 फीसदी है। आईटी, बैंकिंग, फाइनेंस, टेलीकॉम और ई-कॉमर्स की तरक्की ने भारत को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते देशों में शामिल कर दिया है। मगर PLFS यानि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के लेबर सर्वे 2023-24 और 2024-25 की रिपोर्ट एक अलग ही तस्वीर दिखाती है।
इतनी बड़ी जीडीपी देने वाला यह सर्विस सेक्टर देश के कुल लेबर फोर्स के सिर्फ 29 से 30 फीसदी लोगों को ही काम दे पाया है। इसकी वजह पूरी तरहा साफ है–आईटी या फाइनेंस में काम करने के लिए खास पढ़ाई और स्पेशल स्किल्स चाहिए, जो हर आम इंसान के पास नहीं होतीं। इसी वजह से देश में 'जॉबलेस ग्रोथ' यानी बिना रोजगार वाली तरक्की देखने को मिल रही है।
दूसरी तरफ, जीडीपी में खेती का हिस्सा लगातार घटते-घटते 2024-25 में सिर्फ 15 से 16 फीसदी रह गया है। इसके बावजूद PLFS 2023-24 की रिपोर्ट बताती है कि देश के करीब 43 से 45 फीसदी लोग आज भी अपनी रोजी-रोटी के लिए सीधे खेती पर ही निर्भर हैं।
कम कमाई, मौसम की मार और भारी शारीरिक मेहनत की वजह से नए दौर के युवा खेती से दूर भाग रहे हैं। ऊपर से पर्याप्त कोल्ड-स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग और सही बाजार न मिलने के कारण किसानों को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता। नतीजा यह है कि किसानों की आमदनी घट रही है और गांव-शहर के बीच का फर्क लगातार बढ़ता जा रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर: विकास की टूटती कड़ी
आर्थिक समझ के हिसाब से देखा जाए, तो खेती से निकलने वाले आम मजदूरों को काम देने का सबसे सही जरिया मैन्युफैक्चरिंग ही था। कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे ज्यादा लोगों को काम देने वाले उद्योग इन लाखों लोगों को आसानी से रोजगार दे सकते थे। मगर भारत के 2024-25 के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, हमारी जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा सालों से सिर्फ 15-16 फीसदी पर अटका है जबकि चीन में यह 27% और वियतनाम में 24% है।
भारत में सामान को एक जगह से दूसरी जगह भेजने यानी लॉजिस्टिक्स पर बहुत ज्यादा खर्चा होता है। यह हमारी जीडीपी का लगभग 8 से 12 फीसदी बैठता है, जबकि बाकी विकसित देशों में यह खर्च सिर्फ 7-8 फीसदी है। इसी ज्यादा खर्च की वजह से भारतीय सामान दुनिया के बाजार में महंगे हो जाते हैं और पिछड़ जाते हैं। इस खर्च को घटाने के लिए 2022 में 'नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी' लाई गई, लेकिन जमीन पर इसका पूरा असर दिखने में अभी वक्त लगेगा।
इसके अलावा कुछ और पुरानी रुकावटें भी हैं। मुश्किल श्रम कानून, ब्यूरोक्रेसी और कागजी अड़चनें और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी इस सेक्टर के पैरों में बेड़ी बनी हुई है। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) को आसानी से लोन न मिलना भी इसकी रफ्तार रोक रहा है।
सरकारी नीतियां और उनकी कड़वी सच्चाई
मैन्युफैक्चरिंग और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई नीतियां बनाई हैं। लेकिन अगर जमीन पर उतरकर सच्चाई देखें, तो कुछ कमियों की वजह से इन्हें आधी-अधूरी कामयाबी ही मिल पाई।
वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना 2018 में यूपी और 2021 में पूरे देश में लागू हुई। सोच यह थी कि हर जिले की अपनी खास कला या सामान को बढ़ावा देकर एक्सपोर्ट बढ़ाया जाए। कागज पर तो यह विचार बहुत शानदार था, पर सच यह है कि छोटे कारीगरों को न तो ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ा गया, न ही सामान की अंतरराष्ट्रीय क्वालिटी स्टैंडर्ड्स और आसान बैंक लोन की सुविधा मिल सकी।
रेल मंत्रालय की वन स्टेशन वन प्रोडक्ट (OSOP) योजना के तहत 2024-25 तक 1,100 से ज्यादा स्टेशनों पर 1,200 से अधिक स्टॉल खोले गए। मगर यहां यात्रियों की सोच आड़े आ गई। सफर कर रहे लोग खाने-पीने का सामान तो तुरंत खरीद लेते हैं, लेकिन साड़ी या हस्तशिल्प जैसी भारी चीजें ट्रेन में संभालना मुश्किल लगता है। दूसरी दिक्कत यह है कि हर कारीगर को सिर्फ 15 दिन के लिए स्टॉल मिलता है, जिससे वे पक्के ग्राहक नहीं बना पाते। गांव से शहर जा कर बहा रुकने का खर्चा अलग। साथ ही, सामान को सीधे होम डिलीवरी का कोई सिस्टम न होना भी इसकी बड़ी कमजोरी है।
2020-21 में सरकार ने 14 सेक्टरों के लिए 1.97 लाख करोड़ रुपये का बजट रखकर 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम शुरू की। लेकिन इसका बड़ा फायदा इलेक्ट्रॉनिक्स और गाड़ियों जैसे बड़े बजट और भारी पूंजी वाले उद्योगों को ही मिला। कपड़ा या जूता बनाने जैसे ज्यादा लोगों को काम देने वाले उद्योगों को उतनी तरजीह नहीं मिल सकी, जहां आम लोगों के लिए लाखों नौकरियां पैदा हो सकती थीं।
दक्षिण कोरिया और वियतनाम की सफलता से सबक
भारत इस उलझन को कैसे सुलझाए, इसके लिए दक्षिण कोरिया और वियतनाम से काफी कुछ सीखा जा सकता है। 1950 के दौर में दक्षिण कोरिया एक गरीब कृषि-प्रधान देश था। उसने कड़े लैंड रिफॉर्म्स किए और 1960-70 के दशक में ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली मैन्युफैक्चरिंग पर पूरा जोर दिया। इसी रास्ते पर चलकर वह आज दुनिया की बड़ी औद्योगिक ताकत बना।
वहीं दूसरी तरफ, 1980 के दशक तक पिछड़ा रहा वियतनाम 1986 में 'दोई मोई' सुधार नीति लाया। उसने विदेशी निवेश (FDI) के लिए अपने दरवाजे खोले। वियतनाम ने कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों पर ध्यान लगाया और अपने युवाओं को तेजी से वोकेशनल ट्रेनिंग दी। 2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक, आज अकेले सैमसंग कंपनी वियतनाम के कुल एक्सपोर्ट का करीब 18-20 फीसदी हिस्सा संभालती है। वियतनाम ने खेती से बोझ घटाया और लाखों युवाओं को, कारखानों में पक्की नौकरियों से जोड़कर अपनी पूरी अर्थव्यवस्था की सूरत बदल दी।
सही रास्ता और नीतिगत सुझाव
इस आर्थिक उलझन को दूर करने के लिए महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन के राष्ट्रीय किसान आयोग 2006 की रिपोर्ट की सिफारिशों और आधुनिक सोच को मिलाना होगा।
स्वामीनाथन आयोग के सुझाव के मुताबिक गांवों के पास ही फूड प्रोसेसिंग की छोटी-छोटी इकाइयां लगनी चाहिए। साथ ही किसानों को उनकी फसल की लागत पर कम से कम 50 फीसदी का मुनाफा यानि C2+50% MSP मिलना तय होना चाहिए। इसके अलावा इजरायल, नीदरलैंड और जापान की तरह हमें 'एग्री-टेक' (Agri-tech) को अपनाना होगा। ड्रोन्स, सेंसर्स और ऑटोमेशन की मदद से खेती को एक आधुनिक और फायदे का बिजनेस बनाया जा सकता है। इससे नए जमाने के युवा फिर से खेती की तरफ लौटेंगे।
वन स्टेशन वन प्रोडक्ट और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसी योजनाओं का तरीका बदलना होगा। सिर्फ स्टेशन पर सामान बेचने के बजाय क्यूआर (QR) कोड स्कैन करके सीधे घर पर सामान डिलीवर करने का फीचर जोड़ना चाहिए। साथ ही स्टॉल का समय 15 दिन से बढ़ाकर कम से कम 2 महीना किया जाना चाहिए।
बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ-साथ कपड़ा, चमड़ा और जूते बनाने वाले उन उद्योगों (MSME) को सस्ता लोन और नई टेक्नोलॉजी अपनाने के लिए अलग से फंड मिलना चाहिए, जो ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं।
2022 की नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी का फायदा उठाकर माल ढुलाई का खर्च घटाना होगा। 2016 में शुरू हुए 'इ-नाम' (e-NAM) सिस्टम को बेहतर बनाकर किसानों को बिचौलियों से तुरंत बचाना होगा। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक गाड़ियों और सोलर जैसे नए क्षेत्रों में अपडेटेड वोकेशनल ट्रेनिंग देकर युवाओं को तैयार करना जरूरी है।
संतुलित विकास ही असली तरक्की
भारत के सर्विस सेक्टर की सफलता ने बेशक दुनिया में देश का नाम रोशन किया है। लेकिन 140 करोड़ की बड़ी आबादी का पेट भरने और सबको साथ लेकर चलने के लिए, सिर्फ एक सेक्टर पर भरोसा करना समझदारी नहीं है। अगर भारत को अपनी युवा आबादी की ताकत का सही इस्तेमाल करना है, तो एक मजबूत रणनीति अपनानी होगी। इसके लिए खेती का आधुनिकीकरण, कारखानों की कमियों को दूर करना और सर्विस सेक्टर की तकनीक का सही तालमेल बिठाना बेहद जरूरी है।
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