Indian Education and Brain Drain: क्यों देश छोड़कर जा रहे हैं हमारे Top IITians?
हर साल भारत के IIT, IIM या शीर्ष विश्वविद्यालयों से डिग्री पूरी करने के बाद, देश के सबसे प्रतिभाशाली युवाओं का एक बड़ा हिस्सा स्थायी रूप से विदेश चला जाता है। यह ब्रेन ड्रेन केवल युवाओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं है। बल्कि यह भारत के एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशासनिक संस्कृति, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था के गहरे संकट को साफ दिखाता है। क्या उन्नत वैश्विक लाइफस्टाइल का आकर्षण इसका कारण है, या फिर हमारे देश की आंतरिक व्यवस्था की कमियां? इसीलिए इस मुद्दे को गहराई से समझना बहुत जरूरी है।
हालिया आंकड़े और ब्रेन ड्रेन की वास्तविक तस्वीर
भारत के विदेश मंत्रालय की हालिया संसदीय रिपोर्ट से इस पलायन का असली सच सामने आता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में 13 लाख से अधिक भारतीय स्टूडेंट्स उच्च शिक्षा के लिए विदेश में हैं। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय संस्था OECD की इंटरनेशनल माइग्रेशन आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देशों में रहने वाले उच्च शिक्षित और कुशल प्रवासियों की सूची में भारत सबसे आगे है।
दूसरी ओर, विभिन्न शिक्षा सर्वे और नीति आयोग के आकलनों से पता चलता है कि देश के शीर्ष IIT और IIM के लगभग 30 से 35 प्रतिशत ग्रेजुएट्स करियर के शुरुआती कुछ वर्षों में ही विदेश में बस जाते हैं। UNESCO के हालिया आंकड़े भी यह पुष्टि करते हैं कि भारत की प्रतिभाओं का यह पलायन अब एक गंभीर और दीर्घकालिक चुनौती बन चुका है।
वैश्विक मंच पर भारतीय प्रतिभा और रिसोर्सेज का नुकसान
आज ग्लोबल टेक कंपनियों में भारतीय प्रतिभा का योगदान सबसे अलग नजर आता है। टेक जायंट अल्फाबेट यानि गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला या एडोब के शांतनु नारायण जैसे बहुत सारे भारतीय नाम सिलिकॉन वैली की क्रांति और अंतरराष्ट्रीय बिजनेस को संभाल रहे हैं। यह सफलता हमें गर्व महसूस कराती है। लेकिन दूसरी ओर, यह देश के लिए एक बड़े ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट यानी अवसर के नुकसान को भी दर्शाती है।
यदि इस प्रतिभा और इनोवेशन क्षमता को भारत में सही इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्याप्त फंड और काम करने का स्वतंत्र माहौल मिलता, तो भारत खुद टेक्नोलॉजी का वैश्विक केंद्र बन सकता था। विदेशी कंपनियों को समृद्ध करने के बजाय, यह टैलेंट अगर देश में रहता, तो भारत में ही विश्वस्तरीय टेक-जायंट कंपनियां जन्म लेतीं। भारतीयों के टैक्स से तैयार टैलेंट जब विदेश में GDP बढ़ाता है, तो भारत की प्रगति धीमी हो जाती है।
देश छोड़ने के असली कारण और जमीनी हकीकत
ब्रेन ड्रेन के पीछे सिर्फ बड़े सैलरी पैकेज की चाहत नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई सामाजिक, प्रशासनिक और आर्थिक कारण छिपे हैं।
सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय सैलरी और भारत के शुरुआती सैलरी पैकेज में भारी अंतर है। इसके साथ ही विदेश की बेहतर लाइफस्टाइल और सामाजिक सुरक्षा युवाओं को आकर्षित करती है।
इसके अलावा, भारत में रिसर्च और डेवलपमेंट के आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। पर इससे भी गंभीर बात यह है कि संस्थानों में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और स्थानीय सिंडिकेट का दबाव रहता है। भारत में वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों को स्वतंत्र रूप से काम करने में काफी परेशानी होती है। लालफीताशाही, राजनीतिक दबाव और स्थानीय सिंडिकेट की अवैध मांगों के कारण काम का माहौल खराब होता है। इस असुरक्षित माहौल के कारण कई शीर्ष प्रतिभाएं विदेश के सुरक्षित और तनावमुक्त माहौल को चुनती हैं।
एक और बड़ी वजह, योग्यता के सही मूल्यांकन की कमी, नेपोटिज्म और संरक्षण व्यवस्था का दिशाहीन हाल है। इससे नया स्टार्टअप या इनोवेशन शुरू करने की इच्छा शुरुआती स्तर पर ही खत्म हो जाती है।
ब्रेन ड्रेन का अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव
प्रतिभाओं के लगातार पलायन के कारण भारत को बड़ा वैज्ञानिक और आर्थिक नुकसान हो रहा है।
एक तरफ, भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की गति प्रभावित हो रही है। भारतीय युवा नई टेक्नोलॉजी का आविष्कार तो करते हैं, लेकिन उसके पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का अधिकार विदेशी कंपनियों के पास चला जाता है। इसके कारण मिलने वाले राजस्व और रॉयल्टी से भारत वंचित रह जाता है।
दूसरी तरफ, यह राष्ट्रीय संसाधनों का सीधा नुकसान है। IIT या AIIMS जैसे संस्थानों पर हर साल टैक्सपेयर्स का भारी पैसा खर्च किया जाता है। जब यह तैयार टैलेंट हमेशा के लिए देश छोड़ देता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को उस निवेश का लाभ नहीं मिलता। विकसित देश बिना किसी खर्च के भारतीय टैलेंट का उपयोग करते हैं और अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत बनाते हैं।
शिक्षाविदों और थिंक टैंकों के सुझाव
ब्रेन ड्रेन की समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों और शिक्षाविदों ने कई प्रामाणिक मॉडल भारत सरकार को दिए हैं।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर जगदीश भगवती ने जर्नल ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स में Bhagwati Tax का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत, विदेश में काम करने वाले भारतीय टैलेंट के टैक्स का एक हिस्सा भारत की शिक्षा पर खर्च होना चाहिए।
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का Capability Approach मॉडल बताता है कि प्रतिभा के विकास के लिए केवल पैसा काफी नहीं है। इसके लिए व्यक्तिगत सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय साइंस जर्नल Nature और EPW में चर्चित Triple Helix Model यूनिवर्सिटी, इंडस्ट्री और सरकार के समन्वय पर जोर देता है। इससे रिसर्च का सीधा कमर्शियलाइजेशन हो सकता है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक सी.एन.आर. राव का C.N.R. Rao Proposal शैक्षणिक संस्थानों को नौकरशाही से मुक्त करके पूर्ण स्वायत्तता देने की सिफारिश करता है।
इसके अलावा, नीति आयोग की वज्र (VAJRA) और रामानुजन फेलोशिप जैसी योजनाएं एनआरआई विशेषज्ञों को भारत से जोड़ती हैं। इससे ब्रेन ड्रेन को ब्रेन सर्कुलेशन में बदला जा सकता है।
योजनाओं के वास्तविक रूप में बाधाएं और समाधान
विशेषज्ञों के इन सुझावों को लागू करने में कई व्यावहारिक बाधाएं आती हैं।
मुख्य समस्या प्रशासनिक लालफीताशाही है। इसके कारण मंजूर हुए रिसर्च फंड को लैब तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है। इसके अलावा, विकसित देशों की तरह भारत का प्राइवेट कॉर्पोरेट सेक्टर R&D में ज्यादा निवेश नहीं करता।
सबसे बड़ी बाधा विश्वविद्यालयों में स्थानीय सिंडिकेट का प्रभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर के निष्पक्ष वर्किंग माहौल को नष्ट कर देता है।
इन बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार को सिंगल-विंडो फास्ट-ट्रैक फंड सिस्टम तेजी से शुरू करना चाहिए। शैक्षणिक और रिसर्च संस्थानों को कानून बनाकर राजनीतिक और सिंडिकेट के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, यूनिवर्सिटी रिसर्च में फंड देने वाली प्राइवेट कंपनियों को टैक्स में छूट मिलनी चाहिए। साथ ही CSR फंड का एक हिस्सा प्राइमरी रिसर्च में खर्च करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
आज की बदलती दुनिया में सिर्फ नियमों या भावुक बातों से युवाओं को देश में रोककर रखना संभव नहीं है। यदि भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत आर्थिक और तकनीकी शक्ति बनना है, तो केवल टैलेंट एक्सपोर्टर बनकर संतुष्ट नहीं रहा जा सकता।
भारत को रिसर्च की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और सुरक्षित माहौल देना होगा। तभी भारत खुद को एक टैलेंट मैग्नेट में बदल पाएगा। तभी भारत की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा देश के विकास में योगदान देगी और दुनिया के लिए एक नए युग का निर्माण करेगी।
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