​India's Real Economy: 88% आबादी को नजरअंदाज कर कैसे बनेगा विकसित भारत?

आज दुनियाभर में भारतीय इकोनॉमी की खूब बात हो रही है। बड़ी कंपनियों का मुनाफा, आगे बढ़ता जीडीपी और शेयर बाजार के रिकॉर्ड देखकर ऐसा लगता है कि देश तरक्की की राह पर बहुत आगे निकल आया है, भारत विकसित हो चुका है। पर इस चमक-दमक के पीछे एक काली सच्चाई भी है। यह सच्चाई देश के उन करोड़ों छोटे दुकानदारों और अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर के कामगारों की है, जो रोज अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते हैं।

चलिए देख लेते है आखिर असंगठित क्षेत्र में कौन लोग आते हैं? गली-मोहल्ले की छोटी किराना दुकानें, चाय के स्टॉल, ठेले पर सामान बेचने वाले फेरीवाले, ऑटो-रिक्शा ड्राइवर, कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करने वाले लोग, छोटे गैराज के मैकेनिक, दर्जी, हाथ से चीजें बनाने वाले कारीगर, घरों में काम करने वाले लोग और गांवों में खेतों पर काम करने वाले मजदूर । इन सबको मिलाकर ही हमारी यह अनऑर्गेनाइज्ड इकोनॉमी चलती है।

केंद्रीय श्रम मंत्रालय के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे यानि PLFS के आंकड़े बताते हैं कि देश का लगभग 88% से 90% श्रमिक वर्ग इसी सेक्टर का हिस्सा है। रिजर्व बैंक  और एमएसएमई यानी सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्योग मंत्रालय की साझा रिपोर्ट के अनुसार, देश के जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान करीब 30% है। वहीं, देश में बनने वाले कुल माल यानि मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40% बैठती है। यह सेक्टर करीब 11 से 12 करोड़ लोगों को काम देता है, जिससे करीब 50 करोड़ लोगों का पेट चलता है, यानि देश की आधी आबादी। इतना बड़ा योगदान देने के बाद भी, क्या इन्हें सरकार की नीतियों में सही जगह मिल पा रही है? या फिर इन्हें बस टैक्स वसूलने का एक आसान जरिया मान लिया गया है?

आर्थिक झटके और अनदेखी की जमीनी हकीकत

पिछले कुछ सालों में सरकार के कुछ ऐसे फैसले आए, जिनका इन छोटे उद्योगों और सेक्टर पर बहुत बुरा असर पड़ा। साल 2016 की नोटबंदी और 2017 में लागू हुए जीएसटी ने पूरी तरह कैश पर चलने वाले इस छोटे कारोबार को हिलाकर रख दिया। उस वक्त छोटे कारोबारियों का जो वर्किंग कैपिटल यानि रोजमर्रा का कारोबार चलाने के लिए जरूरी नकद पैसा डूबा था, वे आज तक उससे उबर नहीं पाए हैं। ऊपर से हाल के सालों में महंगाई और कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों ने इस चोट को और गहरा कर दिया है।

वर्ल्ड बैंक और IFC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हमारे देश के MSME सेक्टर को करीब 500 बिलियन डॉलर के लोन की कमी झेलनी पड़ रही है। इसे आसान भाषा में क्रेडिट गैप यानि जरूरत के हिसाब से बैंक लोन न मिलना कहा जाता है। नियम-कायदे होने के बावजूद बैंक कागजी शर्तों का हवाला देकर इन छोटे कारोबारियों को आसानी से कर्ज नहीं देते। मजबूरी में इन लोगों को लोकल सूद देने वालों से भारी-भरकम ब्याज पर पैसे लेने पड़ते हैं, जिससे ये हमेशा कर्ज के दलदल में फंसे रहते हैं। इसके अलावा, बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों और ब्रांड्स की भारी कॉम्पीटीशन के आगे ये छोटे दुकानदार टिक नहीं पा रहे हैं।

अनिश्चित मजदूरी और सोशल सिक्योरिटी की कमी

तरक्की के इन बड़े दावों के बीच सबसे दर्दनाक तस्वीर असंगठित क्षेत्र के इन मजदूरों की है। इनके काम के न तो कोई निश्चित घंटे हैं और न ही काम करने की कोई सुरक्षित जगह। ऊपर से महंगाई के मुकाबले इन्हें जो मजदूरी मिलती है, वह बेहद कम होती है। अगर कोई मजदूर बीमारी या किसी हादसे की वजह से एक दिन भी काम पर न जा सके, तो उसके परिवार के सामने सीधे भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट साफ कहती है कि देश के इस सेक्टर के ज्यादातर मजदूरों के पास किसी भी तरह की सोशल सिक्योरिटी यानि सामाजिक सुरक्षा जैसे इलाज, पेंशन या बीमा का नामोनिशान नहीं है। न इनके पास मेडिकल हेल्प है, न लाइफ इंश्योरेंस और न ही बुढ़ापे के लिए कोई पेंशन। सरकार ने ई-श्रम पोर्टल और पीएम-स्वनिधि (PM-SVANidhi) जैसी योजनाएं कागजों पर तो शुरू कर दी हैं, लेकिन जानकारी की कमी और दफ्तरों के चक्कर काटने की मजबूरी के चलते असली जरूरतमंदों तक इनका कोई फायदा नहीं पहुंच रहा है।

पेंडिंग बिल का संकट: मांग में कमी और लालफीताशाही

सरकार भले ही मुद्रा योजना या इमरजेंसी क्रेडिट लाइन जैसी बड़ी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हो, पर जमीनी हकीकत यह है कि ये योजनाएं उम्मीद के मुताबिक असर नहीं दिखा पा रही हैं। पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि छोटे उद्योगों का हजारों करोड़ रुपया बड़ी कंपनियों और सरकारी संस्थानों के पास अटका पड़ा है। इसे डिलेड पेमेंट यानि समय पर पैसे न मिलना कहा जाता है। कानून के मुताबिक 45 दिन के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए, पर महीनों बीत जाने के बाद भी फूटी कौड़ी हाथ नहीं लगती। हाथ में वर्किंग कैपिटल यानि काम चलाने के लिए नकद न होने की वजह से कई छोटे कारखाने और उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

लेकिन इसके लिए सिर्फ बड़ी कंपनियों की नीयत को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक वजह और है। महंगाई और आम आदमी की घटती कमाई की वजह से आज बाजार में मांग ही नहीं बची है, जिसे डिमांड कंट्रैक्शन या खरीद की क्षमता घटना कहते हैं। देश में आज K-Shaped इकोनॉमी जैसी स्थिति पैदा हो गई है, जहाँ गरीब और मिडिल क्लास के हाथ में पैसा ही नहीं है कि वे खुलकर खर्च कर सकें। जब आम लोग बाजार से सामान खरीदेंगे ही नहीं, तो बड़ी कंपनियां छोटे कारखानों से माल कैसे उठाएंगी? जब माल गोदामों में ही सड़ता रहेगा, तो वे छोटे सप्लायर्स का पैसा कैसे चुकाएंगी?

इन सबके ऊपर सरकारी दफ्तरों का झंझट भी कम नहीं है। जीएसटी रिफंड मिलने में देरी, टैक्स ऑडिट के पचड़े और सिस्टम की ब्यूरोक्रेसी ने इन छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ रखी है। दूसरी तरफ, बैंक भी एनपीए यानी बैंक का डूबा हुआ कर्ज होने के डर से इन छोटे यूनिट्स को बिना गारंटी के लोन देने से कतराते हैं। वहीं, उद्यम पोर्टल। पर रजिस्ट्रेशन के कठिन नियमों और कम जानकारी के चलते गांवों के छोटे-छोटे पारिवारिक बिजनेस सरकारी फायदों से कोसों दूर हैं।

जाने-माने अर्थशास्त्रियों की सलाह और समाधान

देश-विदेश के बड़े अर्थशास्त्रियों ने इस अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कई व्यावहारिक उपाय बताए हैं। नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी और एस्टर डुफलो ने अपनी किताब Good Economics for Hard Times में साफ लिखा है कि छोटे कारोबारियों पर टैक्स और कानूनी कागजों का बोझ मत लादिए, बल्कि उन्हें सीधे कैश सपोर्ट  यानि आर्थिक मदद दीजिए। साथ ही, मजदूरों की अनिश्चितता दूर करने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए एक पक्की सामाजिक सुरक्षा का घेरा तैयार कीजिए।

पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन और रोहित लंबा ने अपनी किताब Breaking the Mold: India's Economic Future में यह बात जोर देकर कही है कि फॉर्मलाइजेशन यानी हर छोटे धंधे को जबरन कागजी नियमों में उलझाने के नाम पर छोटे दुकानदारों का उत्पीड़न तुरंत बंद होना चाहिए। जीएसटी के स्लैब को छोटे कारोबारियों के लिए बेहद आसान बनाया जाए और सरकार के TReDS प्लेटफॉर्म को सख्त कानूनों के जरिए लागू करके पेंडिंग बिलों का भुगतान तुरंत सुनिश्चित किया जाए। इसके अलावा, अर्थशास्त्री कौशिक बसु और वर्ल्ड बैंक ने भी क्लस्टर डेवलपमेंट यानि एक ही इलाके के छोटे उद्योगों को आपस में जोड़कर मजबूत करना और आसान शर्तों पर डिजिटल लोन देने की सलाह दी है।

सरकारी कदम बनाम असली नतीजे: नतीजे उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं?

अर्थशास्त्रियों की इन सलाहों पर सरकार ने कुछ कदम उठाए तो जरूर है, पर जमीनी स्तर पर उनके नतीजे एकदम उलट निकले। जैसे, रघुराम राजन के कहने पर TReDS प्लेटफॉर्म और Section 43B(h) नियम लाया गया, ताकि 45 दिन के भीतर MSME का पैसा मिल सके। पर हुआ इसके उलट। जुर्माने के डर से बड़ी कंपनियों ने रजिस्टर्ड छोटे कारोबारियों को ऑर्डर देना ही बंद कर दिया और बिना रजिस्ट्रेशन वाले लोगों से काम कराना शुरू कर दिया। इसी तरह, अभिजीत बनर्जी के सुझाव पर e-Shram पोर्टल पर 30 करोड़ से ज्यादा मजदूर जुड़ तो गए, पर बजट की भारी कमी के कारण उन्हें कोई असल सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाई। इसी तरह, कौशिक बसु और वर्ल्ड बैंक की बात मानकर सरकार ने PM-SVANidhi और Account Aggregator यानि सारे बैंक खातों को आपस में जोड़ कर डिजिटल लोन देने की कोशिश की, पर आज भी 99% लघु उद्योगों के पास डिजिटल रिकॉर्ड न होने के कारण 500 बिलियन डॉलर का क्रेडिट गैप यानि लोन की कमी जस का तस बना हुआ है। यानी, नीतियां तो कागजों पर आईं, पर बाजार की असल मांग और सिस्टम की कमियों के चलते उनसे कोई ठोस फायदा नहीं मिल पाया।

नीति-नियमों की इस उलझन और बाजार में मांग की कमी, यह चीख-चीखकर कहती है कि देश की तरक्की कभी भी, सिर्फ जीएसटी कलेक्शन के नए रिकॉर्ड या चंद बड़ी कंपनियों के शेयरों के भाव से नहीं आंकी जा सकती। जिस देश की 88% वर्कफोर्स और 30% जीडीपी छोटे-छोटे अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर से आती हो, वहाँ उन्हें अनदेखा करके विकसित भारत का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता।

आज पॉलिसी बनाने वालों और हम सबको खुद से यह सवाल पूछना होगा–क्या हम सिर्फ कॉरपोरेट घरानों को ही सहूलियतें देते रहेंगे, या फिर उन असली लोगों की भी सुनेंगे जो देश को असल में चला रहे हैं? जब तक इस देश का छोटा व्यापारी, कारीगर और दिहाड़ी मजदूर खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं होता, तब तक हमारी यह आर्थिक तरक्की और आजादी अधूरी ही मानी जाएगी।