Smart Cities vs Rural Life: क्या बदलती लाइफस्टाइल छीन रही है हमारा दिमागी सुकून?
भारतीय समाज की असली पहचान प्राचीन काल से आपसी जुड़ाव और साझा जीवनशैली रही है। लेकिन 21वीं सदी के बदलते आर्थिक दौर में अब यह माहौल बदलने लगा है। लोग बेहतर पढ़ाई, अच्छे इलाज और रोज़गार की तलाश में हैं। इसलिए वे गाँवों से शहरों की ओर भाग रहे हैं। जहां शहरीकरण की इस चमक-दमक से लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है। लेकिन दूसरी तरफ़ हमारे पुराने सामाजिक रिश्तों की डोर धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती जा रही है। शहरों की ऊँची इमारतों के पीछे लोग खुद को अकेला समेट रहे हैं। गाँव के अपनेपन की जगह अब शहरों में पर्सनल सोच हावी हो रही है। यह स्थिति भारतीय समाज के लिए चिंता का कारण बन रही है।
गाँव का खुला आँगन बनाम शहर के बंद दरवाज़े
क्यों बढ़ रही है ये दूरी? गाँव के सामाजिक जीवन की बुनियाद एक-दूसरे पर निर्भरता है। वहाँ किसी का सुख-दुःख सिर्फ एक परिवार की बात नहीं होती। पूरा मोहल्ला उस भावना से जुड़ जाता है। बिना किसी तैयारी के पड़ोसी के घर चले जाना यहाँ बहुत आम है। लोग त्योहार साथ मिलकर मनाते हैं। किसी मुसीबत में सबसे पहले पड़ोसी ही सामने आता है। इस व्यवस्था में एक मज़बूत सोशल सपोर्ट मिलता है। यहाँ कोई भी व्यक्ति खुद को अकेला महसूस नहीं करता।
लेकिन आधुनिक शहरों के फ्लैट कल्चर में हालात एकदम अलग हैं। लोग सुरक्षा और पर्सनल प्राइवेसी चाहते हैं। इसलिए बंद दरवाज़ों के पीछे एक दूरी बन गई है। बगल के फ्लैट में कौन रहता है, यह सालों-साल पता नहीं चलता। किसी की तबीयत खराब हो, तो भी खबर नहीं होती। इसकी वजह सिर्फ बदलती सोच ही नहीं है। शहरों की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल भी इसका बड़ा कारण है। सुबह से शाम तक लंबे वर्किंग आवर्स रहते हैं। ट्रैफिक का तनाव अलग से परेशान करता है। बचा हुआ समय लोग डिजिटल स्क्रीन पर बिताते हैं। यह सब इंसान को थका देता है।
एक व्यक्ति गाँव के खुले माहौल में पलता-बढ़ता है। जब वह रोज़गार के लिए शहर आता है, तो उसे नई चुनौती मिलती है। यहाँ की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी और प्रतियोगिता उसे अकेला रहने पर मजबूर कर देती है। नतीजा यह होता है कि गाँव का मिलनसार इंसान भी शहर आकर बदल जाता है। वह भी यहाँ अकेले रहने के इस तौर-तरीके को अपना लेता है।
माइग्रेशन और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएँ
शहर में भागदौड़ और अकेलापन है। यह जानते हुए भी हज़ारों लोग अपने गाँव क्यों छोड़ रहे हैं? इसकी असली वजह माइग्रेशन यानी पलायन की मजबूरी है। कोई भी व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से अपनी जड़ों को नहीं छोड़ना चाहता। गाँव में बुनियादी सुविधाओं की कमी ही उन्हें शहर जाने पर मजबूर करती है। आज गाँव-गाँव तक अच्छी शिक्षा, बिजली और बेहतर अस्पताल पहुँचाने की ज़रूरत है। इससे बड़ा बदलाव आ सकता है। स्थानीय स्तर पर रोज़गार मिलने से शहर में भागती भीड़ रुक सकती है। इससे पलायन पर काफी हद तक लगाम लगेगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान का उदाहरण देखा जा सकता है। वहाँ दुर्गम पहाड़ियों पर अगर एक परिवार भी रहता है, तो सरकार बुनियादी सुविधा देती है। वहाँ पक्की सड़क, बिजली और एलपीजी गैस कनेक्शन जैसे सुविधाएं पहुँचाया जाता है। स्विट्जरलैंड और यूरोप के दूसरे देशों में भी आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर गाँव तक पहुँचाया गया है। इससे लोग अपने गाँव में रहकर ही बेहतर काम और अच्छी लाइफ जी रहे हैं।
लेकिन भारत की स्थिति थोड़ी अलग है। यहाँ विशाल जनसंख्या और मुश्किल भूगोल बड़ी चुनौती हैं। यहाँ स्थानीय स्तर पर कमाई के साधन कम हैं। इसलिए ये सुविधाएँ तुरंत पूरा करना मुश्किल काम है। नतीजा यह है कि लोग मजबूरी में शहरों की तरफ आ रहे हैं। इससे शहरों में भीड़ और अकेलापन दोनों लगातार बढ़ रहा है।
अकेलेपन की सामाजिक और मानसिक कीमत और वैज्ञानिक पहलू
गाँव छोड़कर शहर आना और अकेला पड़ जाना सिर्फ़ भावनात्मक बात नहीं है। इसका इंसानी सेहत पर सीधा और गहरा असर पड़ता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने सामाजिक जुड़ाव पर एक अध्ययन किया है। वहीं भारत के निमहांस (NIMHANS) ने भी राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सर्वे किया है। इनके आँकड़े एक गंभीर बात सामने लाते हैं।
डेटा के मुताबिक, भारत के शहरों में डिप्रेशन, एंग्जायटी और अकेलेपन का खतरा ज़्यादा है। यह गाँवों के मुकाबले लगभग 30 से 35 प्रतिशत अधिक है। इसके अलावा लासी (LASI - Longitudinal Aging Study in India) की रिपोर्ट भी आई है। इसके मुताबिक शहरों के 21 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग अकेलेपन का सामना कर रहे हैं। इसके विपरीत गाँवों में आपसी जुड़ाव रहता है। इसलिए वहाँ बुजुर्गों में यह समस्या काफी कम है।
जब कोई व्यक्ति गाँव से शहर शिफ्ट होता है, तो पुराना माहौल छूट जाता है। उसका फैमिली सपोर्ट सिस्टम दूर हो जाता है। इससे उस पर एक मानसिक तनाव बनता है। शहरों की भीड़ में इंसानी रिश्तों का साथ नहीं मिलता। इस वजह से शरीर में स्ट्रेस हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इससे डिप्रेशन और ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ, संयुक्त परिवार लगातार टूट रहे हैं। इस वजह से बच्चे सामाजिक जुड़ाव नहीं सीख पाते। वे डिजिटल गैजेट्स पर ज्यादा निर्भर हो रहे या अपराधमूलक प्रवृत्ति की और झुक रहा है ।
ग्राउंड रियलिटी और समाधान का रास्ता
शहर के भीतर अपनापन आज के आर्थिक दौर में सभी को वापस गाँव भेजना संभव नहीं है। लेकिन शहरों को सिर्फ पैसों का जरिया बना देना भी सही नहीं है। इसलिए अब शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों की सोच में एक संतुलन (balance) लाने की ज़रूरत है।
भारत की ग्राउंड रियलिटी देखें तो बदलाव दिख रहा है। कई सोसाइटी कमेटियाँ दूरी कम करने की कोशिश कर रही हैं। फ्लैट कल्चर की दूरियाँ मिटाने के लिए कम्युनिटी स्पेस बनाए जा रहे हैं। पार्कों के बेहतर इस्तेमाल और सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पड़ोसी एक-दूसरे से आसानी से मिल सकते हैं। लेकिन ये अकड़ा अभी भी बहुत कम है ।
अंतरराष्ट्रीय मॉडल की बात करें तो सिंगापुर का एचडीबी (HDB - Housing & Development Board) मॉडल काफी अच्छा माना जाता है। वहाँ बहुमंजिला इमारतों के नीचे खुला वॉयड डेक (Void Deck) बनाना अनिवार्य है। साथ ही खेल के मैदान और बुजुर्गों के लिए कम्युनिटी सेंटर रखे गए हैं। इस तरह के डिजाइन से लोगों में आपसी बातचीत बढ़ी है। साथ ही सोशल सिक्योरिटी की भावना भी मज़बूत हुई है।
इसके अलावा यूरोप का 15-मिनट सिटी मॉडल यानि 15 मिनिट पैदल या साइकिल से चलने की दूरी के अंदर आम जरूरतें का सारा व्यवस्था मिलना और को-हाउसिंग कांसेप्ट भी सफल रहा है। ये मॉडल अकेलेपन को कम करने में मदद कर रहे हैं। भारत में भी स्मार्ट सिटी के साथ-साथ स्मार्ट विलेज मॉडल को मज़बूत किया जा सकता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधरेगी। फलस्वरूप शहरों पर पलायन का दबाव कम हो जाएगा।
आर्थिक तरक्की हमें बेहतर सुविधाएँ दे सकती है। लेकिन जीवन की असली खुशी और दिमागी सुकून अपनों के साथ ही मिलता है। रिश्तों की मिठास ही जीवन को अर्थ देती है। सुरक्षा के लिए फ्लैट का दरवाज़ा भले बंद रखें। लेकिन मुसीबत और खुशी के मौकों पर अपनों के लिए मन में थोड़ी जगह ज़रूर रखनी चाहिए। यही इस अकेलेपन से बचने का सबसे आसान रास्ता है। शहरीकरण की इस भागदौड़ में भी गाँव के आपसी रिश्ते ज़िंदा रखने होंगे। शहरों में यह संतुलन बनाना ही सुखी जीवन की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
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