PM Modi's Digital Coaching: JEE-NEET छात्रों के लिए Masterstroke या सिर्फ Digital Supplement?
15 अगस्त 2026 को राजधानी नई दिल्ली के लाल किले में 80वें स्वतंत्रता दिवस का अवसर था। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के करोड़ों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने प्राइवेट कोचिंग सेंटरों के बढ़ते जाल और उनके भारी खर्चों पर चिंता जताई। इसके साथ ही सरकार द्वारा देश के सभी इलाकों के स्टूडेंट्स के लिए एक फ्री ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क शुरू करने की घोषणा की।
सरकार का दावा है कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्टूडेंट्स को आर्थिक दबाव से मुक्त करना है। यह योजना खास तौर पर JEE, NEET, UPSC, SSC और CUET जैसी कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए है। हालांकि, वास्तव में इस बड़ी घोषणा की ज़मीनी हकीकत, इसकी चुनौतियों और दूरगामी असर पर एक गहरे विश्लेषण की जरूरत है।
लक्ष्य बनाम क्वालिटी: क्या सिर्फ ऑनलाइन लेक्चर्स काफी हैं?
सरकार डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए करोड़ों स्टूडेंट्स तक पहुंचने का लक्ष्य रख रही है। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि क्या सिर्फ डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल करके शिक्षा की क्वालिटी पक्की की जा सकेगी?
भारतीय सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के 2025 के शिक्षा सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 27% स्टूडेंट्स अपनी पढ़ाई के लिए कोचिंग पर निर्भर हैं। इनमें शहरी इलाकों में यह दर 30.7% और ग्रामीण इलाकों में 25.5% है। NSSO की इसी रिपोर्ट के अनुसार, प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले परिवारों का प्रति बच्चे पर सालाना खर्च औसतन लगभग ₹32,000 है। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों के परिवारों का खर्च लगभग ₹4,200 है, जो तुलना में लगभग 8 गुना कम है। यह अंतर साफ दिखाता है कि कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स में टिके रहने के लिए मध्यम वर्ग अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने पर मजबूर हो रहा है।
लेकिन कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स का इतिहास कुछ और ही बताता है। UPSC, JEE या NEET जैसे कठिन एग्जाम्स में सफलता केवल रिकॉर्डेड या लाइव लेक्चर्स देखकर हासिल नहीं की जा सकती।
इसके लिए पर्सनल गाइडेंस, लगातार टेस्ट-चेकिंग और सही रणनीति की जरूरत होती है। डिजिटल स्क्रीन के जरिए एक साथ करोड़ों स्टूडेंट्स को यह सब देना सबसे कठिन काम है।
बुनियादी शिक्षा का संकट और ढांचे की चुनौतियां
इस बड़े प्लान के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट भारत में बुनियादी शिक्षा का बेहद कमजोर ढांचा है। अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड बैंक की लर्निंग पॉवर्टी ब्रीफ 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 54 से 56 प्रतिशत बच्चे प्राइमरी लेवल पर बेसिक रीडिंग स्किल्स भी हासिल नहीं कर पाते हैं।
इसी तरह, भारतीय एनजीओ 'प्रथम' की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2024 के आंकड़े भी चिंताजनक हैं। इसके अनुसार स्कूली स्टूडेंट्स का सीखने का स्तर 2020 की महामारी से पहले के समय से भी नीचे बना हुआ है।
जब किसी बच्चे का बेसिक आधार ही कमजोर हो, तो वह सीधे एडवांस लेवल की कॉम्पिटिटिव कोचिंग का फायदा कैसे उठा पाएगा?
इसके अलावा, भारतीय सरकारी संस्था शिक्षा मंत्रालय के पास इससे जुड़ा कोई ऑफिशियल ट्रैकिंग डेटा नहीं है। उनके पास सेल्फ-स्टडी बनाम कोचिंग के असर का हिसाब नहीं है। इस वजह से इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करना और भी कठिन हो जाता है।
तकनीकी स्तर पर भी, ग्रामीण भारत में आज भी स्थिर हाई-स्पीड इंटरनेट की भारी कमी है। SWAYAM, DIKSHA और PM eVIDYA जैसे पिछले सरकारी डिजिटल एजुकेशन प्लेटफॉर्म्स की रफ्तार काफी धीमी रही है। यह इस बात का सबूत है कि केवल ऐप या वेबसाइट बना देने से ही स्टूडेंट्स खुद-ब-खुद पढ़ाई शुरू नहीं कर देते। इसके साथ ही, सब कुछ फ्री होने पर कोर्स बीच में छोड़ने का रिस्क भी हमेशा बना रहता है।
दांव पर क्या लगा है? आर्थिक बोझ से भी बड़ा संकट
यह योजना केवल कोई बजट घोषणा या नीतिगत बदलाव नहीं है। यह भारत के लाखों परिवारों की जीवन-भर की बचत और बच्चों की मानसिक स्थिति से गहराई से जुड़ी हुई है।
भारतीय सरकारी संस्था नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2024 की रिपोर्ट बेहद दर्दनाक तस्वीर दिखाती है। देश में एक साल में रिकॉर्ड 14,488 स्टूडेंट्स की आत्महत्याएं दर्ज की गईं। इनमें परीक्षा में असफलता और कोचिंग हब्स का दम घुटने वाला दबाव मुख्य कारणों में शामिल था।
प्राइवेट कोचिंग इंडस्ट्री ने न केवल पेरेंट्स की क्षमता से बाहर जाकर उनका फायदा उठाया है, बल्कि स्टूडेंट्स को अत्यधिक मानसिक तनाव की ओर धकेल दिया है।
रास्ता क्या हो सकता है? एक प्रैक्टिकल समाधान
सरकार यदि सचमुच प्राइवेट कॉर्पोरेट मॉडल की कोचिंग माफिया का विकल्प तैयार करना चाहती है, तो उसे केवल एक वीडियो लाइब्रेरी बनाने के दायरे से बाहर निकलना होगा, क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी पे फोकस करना पड़ेगा। उसे नीचे दी गई कुछ बातों पर गहराई से विचार करना होगा:
1. हाइब्रिड मॉडल: डिजिटल कंटेंट के साथ-साथ कॉमन सर्विस सेंटरों (CSC) या स्थानीय सरकारी स्कूलों में रीजनल डाउट-सॉल्विंग सेंटर्स बनाए जाने चाहिए।
2. पीयर-मेंटरशिप: पिछले वर्षों के सफल उम्मीदवारों और टॉपर्स को क्षेत्रीय स्तर पर स्टूडेंट्स के मेंटर या सलाहकार के रूप में जोड़ा जाए।
3. मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का इंटीग्रेशन: नए प्लेटफॉर्म्स बनाने के साथ साथ पहले से चल रहे SWAYAM, DIKSHA और SATHEE प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया जाए। इन्हें AI एनालिटिक्स से लैस करके अपग्रेड करना बेहतर होगा।
4. सही निगरानी: इस योजना से क्या रिजल्ट निकल रहा है, उस पर हर 3 महीने में पारदर्शी निगरानी होनी चाहिए। इससे समस्याओं की पहचान करके उनके सही समाधान निकाले जा सकेंगे।
स्टूडेंट्स की असली मांग: कंटेंट नहीं, समाधान चाहिए
आज के स्टूडेंट को केवल पढ़ाई वाले वीडियो की जरूरत नहीं है। उसकी असली मांग है–तुरंत डाउट-क्लियरिंग, समय पर मॉक टेस्ट, साफ-सुथरा मूल्यांकन और बेहतर गाइडेंस। यानी शिक्षा की क्वालिटी में समय के हिसाब से सुधार होना चाहिए।
NSSO के आंकड़े बताते हैं कि 27% परिवार पहले से ही भारी रकम खर्च कर रहे हैं। वहीं वर्ल्ड बैंक और ASER की रिपोर्ट दर्शाती है कि आधे बच्चे बुनियादी शिक्षा में ही पीछे छूटे हुए हैं।
ऐसे हालात में क्या यह योजना प्राइवेट कोचिंग का असली विकल्प बन पाएगी? या यह केवल एक फ्री सप्लीमेंट बनकर रह जाएगी? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार इसे केवल आंकड़ों का खेल मानती है या स्टूडेंट्स को वास्तव में व्यक्तिगत समाधान देती है।
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