बिहार में उद्योगों का विकास क्यों नहीं हुआ: कारण, राजनीति और संभावित समाधान।
बिहार में उद्योग क्यों नहीं बढ़ पाए? कारण, राजनीति और संभावित समाधान
बिहार से सबसे नजदीक पोर्ट करीब सात सौ किलोमीटर दूर है, वेस्ट बंगाल के हल्दिया पोर्ट से। यह दूरी बिहार के औद्योगिक विकास पर असर डालती है। कई लोग मानते हैं कि यही कारण है कि बिहार इंडस्ट्रीज को आकर्षित नहीं कर पाता।
अक्सर यह कहा जाता है कि समुद्र के नजदीक वाले इलाकों में उद्योग लगाना आसान होता है क्योंकि वहां से व्यापार और ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा बेहतर रहती है। इसी वजह से कई बड़े उद्योग बिहार आने से बचते हैं।
क्या केवल पोर्ट की कमी ही वजह है?
लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। इतिहास को देखें तो बिहार की अर्थव्यवस्था कभी काफी मजबूत थी। बिहार का कृषि क्षेत्र इंटरनेशनल ट्रेड रूट्स से जुड़ा हुआ था और कोलकाता पोर्ट के जरिए व्यापार होता था।
अगर केवल समुद्र से दूरी ही विकास की वजह होती, तो पंजाब, हरियाणा और मध्यप्रदेश जैसे राज्य भी विकसित नहीं हो पाते। इन राज्यों के पास भी कोई कोस्टलाइन नहीं है, फिर भी वहां उद्योग तेजी से बढ़े।
बिहार में प्राइवेट कंपनियां क्यों नहीं आतीं?
कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से बेहतर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद प्राइवेट इंडस्ट्रीज यहां निवेश करने से बचती हैं। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस समस्या को स्वीकार किया है।
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी कहा था कि सरकार किसी कंपनी को जबरदस्ती निवेश करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
सबसे बड़ी समस्या जमीन अधिग्रहण की है। बिहार में जमीन छोटे-छोटे किसानों के पास बंटी हुई है। ऐसे में किसी बड़ी कंपनी को जमीन खरीदने के लिए हजारों लोगों से बातचीत करनी पड़ती है।
दूसरे राज्यों ने क्या अलग किया?
हरियाणा सरकार ने करीब 40 साल पहले मारुति कंपनी को गुड़गांव आने का निमंत्रण दिया था। सरकार ने कंपनियों को सब्सिडी और सुविधाएं दीं। इसके बाद धीरे-धीरे गुड़गांव ऑटोमोबाइल और कॉर्पोरेट हब बन गया।
इसी तरह बेंगलुरु में टेक कंपनियों को बढ़ावा दिया गया। वहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और टेक्निकल टैलेंट की वजह से टेक्नोलॉजी सेक्टर तेजी से बढ़ा।
बिहार सरकार की छवि और पुरानी समस्याएं
बिहार में कई छोटे उद्योग समय के साथ बंद हो गए। हजारों राइस मिल्स और शुगर मिल्स बंद पड़ी हैं। कई बिजनेसमैन का कहना है कि सरकारी प्रक्रियाएं और वसूली जैसी समस्याओं ने उद्योगों को नुकसान पहुंचाया।
कई उद्योगपतियों का यह भी कहना है कि सरकार ने जो सब्सिडी और सहायता का वादा किया था, वह समय पर नहीं मिली। कुछ मामलों में कंपनियों को कोर्ट तक जाना पड़ा।
“तारीख पर तारीख मिल रही है, लेकिन इंसाफ नहीं मिला।”
राजनीतिक कारण और सामाजिक बदलाव
बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों के आसपास घूमती रही। लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति को मजबूत किया। इससे पिछड़े वर्गों को राजनीतिक ताकत मिली, लेकिन आर्थिक विकास की गति पर असर पड़ा।
कई रिसर्च पेपर्स में यह बात सामने आई कि बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति ने समाज में बदलाव तो लाया, लेकिन इंडस्ट्रियल ग्रोथ पर उतना फोकस नहीं हो पाया।
बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है निवेशकों का भरोसा जीतना। जब तक सरकार अपने वादों को समय पर पूरा नहीं करेगी, तब तक बड़े उद्योग यहां आने से हिचकिचाते रहेंगे।
बिहार को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज सरकारी प्रक्रियाएं और उद्योगों के लिए भरोसेमंद माहौल बनाना होगा।
जमीन अधिग्रहण का नया मॉडल
बिहार सरकार अब एक नए मॉडल पर काम कर रही है, जिसमें छोटे किसान मिलकर अपनी जमीन बेचने का फैसला करेंगे। उनकी जानकारी एक वेबसाइट पर डाली जाएगी ताकि कंपनियां सीधे उनसे संपर्क कर सकें।
सरकार ने 2019 में नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी भी लॉन्च की, जिसके तहत ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट पर सब्सिडी देने की बात कही गई।
निष्कर्ष
बिहार की समस्या केवल एक कारण से नहीं जुड़ी है। यहां पोर्ट की दूरी, कमजोर इंडस्ट्रियल पॉलिसी, जमीन अधिग्रहण की दिक्कतें, राजनीतिक इतिहास और निवेशकों के भरोसे की कमी — सभी मिलकर विकास को प्रभावित करते हैं।
अगर सरकार अपने वादों पर मजबूती से काम करे, बेहतर गवर्नेंस दे और उद्योगों के लिए भरोसेमंद माहौल बनाए, तो बिहार में भी बड़े स्तर पर औद्योगिक विकास संभव है।
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