भारत के सबसे धनी बनाम सबसे गरीब राज्य

भारतीय राज्यों की आर्थिक तुलना: कौन आगे, कौन पीछे?

क्या आपको पता है कि गुजरात की पर कैपिटा इनकम बिहार से पांच गुना ज्यादा है। वेस्ट बंगाल जो एक समय पर हमारे देश की थर्ड लार्जेस्ट इकॉनमी होती थी। आज वो टॉप फाइव में भी नहीं है। पंजाब और हरियाणा दो स्टेट जिसका कैपिटल सेम है पर जिनकी इकोनॉमिक कहानी बहुत अलग। प्रधानमंत्री मोदी की एक इकोनॉमिक एडवाइज़री काउंसिल है। सितंबर 2024 में उन्होंने एक रिपोर्ट रिलीज करी थी जिसको ज्यादा अटेंशन मिला नहीं। यह रिपोर्ट बहुत ही इंटरेस्टिंग है क्योंकि बात करती है कि कौन सी स्टेट्स हमारे देश में अच्छा कर रही है और कौन सी नहीं। इस वीडियो के चार राउंड हैं। पहले राउंड में हम बात करेंगे महाराष्ट्र और बिहार की। सेकंड राउंड में बात करेंगे हम गुजरात और बंगाल की। थर्ड राउंड में पंजाब और हरियाणा और फोर्थ राउंड में उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु। और लास्ट में मैं बात करूंगा दो स्टेट्स के बारे में जिनसे हम सभी को सीख मिलनी चाहिए। अब मैं इसके बारे में भला क्यों बात कर रहा हूं? क्योंकि अर्णब गोस्वामी अभी बिजी है। एंड ऑल द डियर वन्स आर लाफिंग अवे लाइक नीड थ्रू इट। तो मैंने सोचा मैं जिम्मेदारी उठा लेता हूं हमारे पॉलिटिशियंस को बताने के लिए कि भैया जिंदगी में जरूरी है क्या?

राउंड 1: महाराष्ट्र बनाम बिहार

तो सबसे पहले बात करते हैं देश के वन ऑफ द रिचेस्ट और वन ऑफ द पुअरेस्ट स्टेट्स की। जैसे हर देश का एक जीडीपी होता है, उसी तरह हर स्टेट की एक एनएसडीपी होती है। महाराष्ट्र की एनएसडीपी हमारे देश में सबसे ज्यादा है। देश का 13% जीडीपी महाराष्ट्र से आता है। और अगर महाराष्ट्र खुद का एक देश होता तो वो दुनिया की 40थ लार्जेस्ट इकॉनमी होती। जबकि अगर हम बिहार की बात करें तो बिहार का कंट्रीब्यूशन हमारे देश की जीडीपी में 3% भी नहीं है। अब मैं तो एनएसडीपी की बात कर रहा हूं। पर हम पर कैपिटा की भी बात कर सकते हैं। पर कैपिटा के बेसिस पर बिहार हमारे देश में सबसे नीचे है। ₹30,000 की पर कैपिटा इनकम सोमालिया से भी कम है। अगर आप 60 साल पहले जाओगे तो सिचुएशन इतनी भी बुरी नहीं थी। बिहार का कंट्रीब्यूशन हमारी जीडीपी में 8% था जो आज आके बस 3% हो गया है।

महाराष्ट्र की सफलता के पीछे की कहानी

तो भला महाराष्ट्र ने ऐसा क्या किया जो बिहार ने नहीं? महाराष्ट्र की ग्रोथ के पीछे एक बड़ा श्रेय जाता है मुंबई को जो हमारे देश का फाइनेंसियल कैपिटल है। इनफैक्ट महाराष्ट्र की खुद की 20% जीडीपी अकेले मुंबई से ही आती है। पर महाराष्ट्र की सक्सेस के पीछे कई पॉलिटिकल डिसीजंस भी हैं जो उनके पॉलिटिशियंस ने लिए कई सालों पहले। जैसे महाराष्ट्र वन ऑफ द फर्स्ट स्टेट्स बनी हमारे देश की जहां एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज डेवलप हुई। उधर की सरकार ने इन कोऑपरेटिव्स को बैंक लोन दिलाना आसान कर दिया। जिसकी वजह से ये कॉरपोरेट्स मिल्स, डेयरीज और प्रोसेसिंग प्लांट्स बना पाए। इसी तरह 1950 के दौरान वेस्टर्न महाराष्ट्र के किसानों ने अपनी रिसोर्सेज एकजुट करके शुगर फैक्ट्रीज बनाई और आज देश की चीनी प्रोडक्शन में सबसे बड़ा योगदान महाराष्ट्र का ही है। ऐसी ही चीज हमने इंडस्ट्रीज में भी देखी। जैसे 1962 में महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बॉडी बनाई गई जिससे कंपनीज काम करना तुरंत स्टार्ट कर सकती थी बिना रोड, बिजली और पानी की झंझटों के और इसका फायदा महाराष्ट्र को मिला 1991 के बाद जब देश की इकॉनमी लिबरलाइज हुई। 1994 में Mercedes दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनीज में से एक ने महाराष्ट्र को चुना अपनी पहली असेंबली लाइन के लिए। अब अगर Mercedes अपने ऑपरेशन स्टार्ट कर सकती है महाराष्ट्र में तो दूसरी कंपनीज ने भी सोचा क्यों ना हम भी ट्राई करें जिसकी वजह से महाराष्ट्र देश की एक लीडिंग इंडस्ट्रियल स्टेट बन गई। आज महाराष्ट्र एक मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस है जहां कई शहरों में खुद की इंडस्ट्रीज डेवलप हो गई है। जैसे अगर मुंबई फाइनेंसियल कैपिटल है तो पुणे को बुलाया जाता है डेट्रॉइट ऑफ द ईस्ट उधर की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की वजह से। महाराष्ट्र फार्मास्यूटिकल्स में भी एक लीडर है। मुंबई, पुणे, नाशिक और औरंगाबाद में बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनीज़ हैं। इंक्लूडिंग सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जो दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन मैन्युफैक्चरर है। 2017 तक सबसे ज्यादा इंडस्ट्रीज की रैंकिंग में महाराष्ट्र सेकंड स्पॉट पर थी। पर गुजरात ने उनको पीछे छोड़ दिया। पिछले 60 साल में महाराष्ट्र का कंट्रीब्यूशन देश की जीडीपी में कंसिस्टेंटली करीब 13% रहा है।

बिहार की आर्थिक चुनौतियाँ और कारण

जबकि अगर हम बिहार की बात करें तो उधर कहानी बहुत अलग है। बिहार लिटरली एक फेल स्टेट है जो डीप में है। यह हाल ही में जन स्वराज के लीडर प्रशांत किशोर ने कहा था बिहार के बारे में। बिहार की रेपुटेशन इतनी खराब हो गई है कि देशवासी अपने ही साथियों के खिलाफ डिस्क्रिमिनेट करते हैं। बिहार के नाम से लोगों के मन में बस जंगल राज और बीमारू स्टेट ही आता है। पर बिहार की इन इकोनॉमिक दिक्कतों के पीछे कारण क्या है? मेन कारण है कि उधर इंडस्ट्री डेवलप ही नहीं हुई। बिहार की इकॉनमी का केवल 18% कंट्रीब्यूशन इंडस्ट्रीज से आता है। देश में बस पांच स्टेट्स और यूनियन टेरिटरीज है जहां इंडस्ट्री का कंट्रीब्यूशन 18% से भी कम है। गेस करो कौन? अंडमान निकोबार, मणिपुर, नागालैंड, दिल्ली और चंडीगढ़। अब आप खुद ही समझ गए होंगे कि बिहार की इंडस्ट्री की क्या हालत है। जहां महाराष्ट्र इंडस्ट्री पर फोकस कर रहा था। बिहार में फैक्ट्रियां बंद हो रही थी। 1950 के पहले बिहार में एक्चुअली शुगर प्रोडक्शन बहुत हद तक होती थी। देश की आधी से ज्यादा शुगर फैक्ट्रीज बिहार में थी। जो नंबर 75 साल पहले 29 होता था वो अब क्या है? नौ। या तो सरकार ने फैक्ट्री ही हड़प ली या फिर स्कैम या फिर वसूली की वजह से फैक्ट्री ही बंद हो गई। और मैं बस शुगर फैक्ट्रीज की बात नहीं कर रहा हूं। जैसे मोकामा का एग्जांपल देखते हैं। पटना से बस 80 कि.मी. दूर एक जमाने में इस शहर में नौकरी और इन्वेस्टमेंट की भरमार होती थी। बिहार के कोने-कोने से लोग इधर नौकरी की तलाश में आते थे। और एक बहुत फेमस चॉकलेट की ब्रांड मार्स की इधर फैक्ट्री होती थी। और आज इस फैक्ट्री की क्या हालत है? आप खुद ही देख लो। यह इलाका अब फैक्ट्रीज की ग्रेवयार्ड बनाया जाता है। हिंदी में बोलूं तो जहां फैक्ट्रियां दफनाई जाती है और इधर ही नहीं अगर आप मुजफ्फरपुर, नवादा और किशनगंज जाओगे उधर भी आपको ऐसी कई खाली फैक्ट्रीज मिलेंगी। अब देखो बिहार की गरीबी कल परसों स्टार्ट नहीं हुई। इसके बीज 18वीं सदी में बो दिए गए थे जब अंग्रेजों ने जमींदारी सिस्टम लागू किया। उसके बाद 1952 में भारत सरकार ने फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी स्टार्ट कर दी और इन दोनों पॉलिसीज ने ही बिहार की इकॉनमी की पीठ तोड़ दी। अब मैं ज्यादा डिटेल में जाऊंगा नहीं। अगर आपको डिटेल चाहिए तो रिसर्च पेपर के लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएंगे। इसके अलावा भारत सरकार ने भी बिहार को इतना सपोर्ट नहीं दिया। 1951 से लेकर 2012 तक यूपी और बिहार को पूरे देश में सबसे कम एलोकेशन मिली डेवलपमेंट के पर कैपिटा बेसिस में। जबकि इन 60 सालों के दौरान गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा को पर कैपिटा एलोकेशन दुगनी मिली बिहार और यूपी से। अब बिहार गरीब था और सेंट्रल सरकार ने कोई सपोर्ट भी नहीं दिया। अब बिना एक्सटर्नल सपोर्ट के बिहार अपनी गवर्नमेंट इंप्रूव भी कैसे करें? और अगर आप 100 साल पहले चले जाओगे ना तो स्टैटिस्टिक्स जरूर बदले हैं पर कहानी नहीं। 1930 में बॉम्बे प्रेसिडेंसी में करीब हर 800 लोगों के लिए एक पुलिस ऑफिसर होता था। जबकि बिहार में हर 2300 लोगों के लिए बस एक पुलिस ऑफिसर था। और अगर हम पिछले 30-40 साल की बात करें तो बिहार की पॉलिटिक्स में एंट्री हुई कास्ट पॉलिटिक्स की और बिहार की गरीबी भी कास्ट से लिंक हो गई। 1980 से पहले बिहार में कोई बड़े कास्ट बेस्ड पॉलिटिकल लीडर नहीं थे। यह बदला दो लोगों की एंट्री की वजह से। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। दोनों ओबीसी लीडर्स बिहार की अपर कास्ट डोमिनेटेड पॉलिटिक्स को हिलाना चाहते थे। इनफैक्ट लालू प्रसाद यादव का स्लोगन क्या था? विकास नहीं सम्मान चाहिए। अब लालू प्रसाद यादव ने कमजोर कम्युनिटीज को जरूर पॉलिटिकल पावर दी पर सोशल डेवलपमेंट के चक्कर में वो इकोनॉमिक डेवलपमेंट को भूल गए। बिहार की कास्ट बेस्ड पॉलिटिक्स में बस यही मायने रखता कि कौन सा गुंडा पुलिस थाने को कंट्रोल कर रहा है। क्या वो मेरी कास्ट का है? अगर हां तो जिंदगी ठीक है। पर अगर बाय चांस सरकार बदल गई और गुंडा भी थाने का तो मेरी जिंदगी बदल गई। सब लोग गुंडे की कास्ट पर ध्यान दे रहे हैं। पर किसी ने यह नहीं सोचा कि भैया तुम्हारा थाना एक गुंडे ने कंट्रोल कर रखा है। 21वीं सदी आते-आते नीतीश कुमार बड़ी उम्मीद के साथ आए। उन्होंने कई बदलाव करने की कोशिश करी। कुछ सफल हुए और कुछ नहीं। जैसे 2006 में उन्होंने एक नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी इंट्रोड्यूस करी और बिजनेसेस को वादा किया कि वो उनको सब्सिडीज देंगे। अब सरकार ने वादा तो कर दिया पर कंपनीज़ को सब्सिडीज मिली नहीं। इस वजह से कई कंपनी सरकार के खिलाफ कोर्ट तक गई। 2015 में फिर एक नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी है। पर इसमें प्रॉब्लम क्या थी कि पोस्ट प्रोडक्शन पॉलिसी थी। यानी कि कंपनीज़ को पहले फैक्ट्री सेटअप करनी पड़ेगी और फिर उनको सब्सिडी मिलेगी। अब आप ही मुझे बताओ कि कौन सा बिजनेस ओनर सब्सिडी लेगा फैक्ट्री सेटअप करने के बाद? वो भी बिहार जैसी जगह में जहां कोई गारंटी नहीं है कि सरकार पैसा देगी भी या फिर नहीं। अब देखो एक प्रॉब्लम जरूर सॉल्व हुई है। सेंट्रल सरकार अब बिहार की एक्चुअली बहुत मदद करती है। पर कैपिटा के मामले में बिहार वन ऑफ द हाईएस्ट स्टेट्स है जिसको फाइनेंसियल मदद मिलती है सेंट्रल गवर्नमेंट से। तो अब बिहार के पॉलिटिशियंस को डिसाइड करना होगा कि वो उस पैसे से करेंगे क्या? एक प्रॉब्लम है बिहार की इकॉनमी में कि अभी भी एग्रीकल्चर का बहुत ज्यादा डोमिनेशन है। जहां एग्रीकल्चर बिहार की जीडीपी में 20 से 25% कंट्रीब्यूट करता है। पर करीब 60% लोग इस सेक्टर में अभी नौकरी कर रहे हैं। जिसका बेसिकली मतलब है कि हद से ज्यादा लोग अभी एग्रीकल्चर में इनवॉल्वड है बिहार में। इसी वजह से उनको दूसरे सेक्टर्स पर फोकस करना होगा जो गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ने किया है। उसके लिए उनको बेटर स्कूल्स बनाने होंगे और इंफ्रास्ट्रक्चर में ध्यान देना होगा। देखो यह मैंने बहुत हाई लेवल बात करी पर प्रॉब्लम यह है कि कोई बिहार सरकार पर विश्वास नहीं करता क्योंकि उनकी अकाउंटेबिलिटी नहीं है। वो रिजल्ट्स डिलीवर नहीं कर पाते। इसी वजह से कोई भी एंटरप्रेन्योर या फिर बिज़नेस पर्सन सोचता है कि यार मैं क्यों बिहार में इन्वेस्ट करूं जब कोई गारंटी नहीं है कि सरकार मेरी मदद करेगी या फिर नहीं। और ये जो ट्रस्ट डेफिसिट है ना यही बहुत इंपॉर्टेंट है। और इस ट्रस्ट डेफिसिट को ओवरकम करने के लिए बिहार सरकार को एक्चुअली रिजल्ट्स डिलीवर करने होंगे। जो वो पॉलिसीज बनाते हैं उन पर उनको एक्शन लेना होगा। तभी प्रॉब्लम सॉल्व हो पाएगी क्योंकि जैसे इस मखाना ट्रेडर ने कहा था कि इन्वेस्टर्स को कॉन्फिडेंस चाहिए और अभी बिहार सरकार में कॉन्फिडेंस की कमी है।

राउंड 2: गुजरात बनाम पश्चिम बंगाल

अब आते हैं दूसरे राउंड पर गुजरात और वेस्ट बंगाल। करीब 60 साल पहले गुजरात तो एक स्टेट भी नहीं होती थी। गुजरात बॉम्बे प्रेसिडेंसी का भाग था और उस समय गुजरात टॉप फाइव स्टेट्स में कहीं नहीं थी। जबकि बंगाल की बात करें तो वो देश की थर्ड लार्जेस्ट इकॉनमी होती थी गुजरात का दुगना। और अगर 60-70 साल की बात करें तो सिचुएशन रिवर्स हो गई है। तो ऐसा क्या हुआ कि गुजरात की इकॉनमी इतनी बढ़ गई और बंगाल की नहीं।

गुजरात का औद्योगिक उदय

महाराष्ट्र की तरह गुजरात ने इंडस्ट्रीज पर फोकस किया आजादी के बाद जिसकी वजह से कई लार्ज इंडस्ट्री जैसे पावर, सीमेंट और फर्टिलाइज़र्स उधर सेटअप किए गए। 1962 में गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनी जिसकी वजह से कई मेजर इंडस्ट्रियल हब्स बने। वापी में, अंकलेश्वर में और वड़ोदरा में। और 1991 की लिबरलाइजेशन के बाद गुजरात ने भी वही किया जो महाराष्ट्र ने किया। जैसे 1995 में उन्होंने एक नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी बनाई गुजरात 2008 एंड बियॉन्ड जिसने कंपनीज़ को कई इंसेंटिव्स दिए। इंडस्ट्रियल ग्रोथ को प्रमोट करने के लिए गुजरात ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप्स पर भी फोकस किया इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए। जैसे गुजरात मैरिटाइम बोर्ड बनाया गया ताकि प्राइवेट कंपनीज़ छोटे-छोटे पोर्ट्स में इन्वेस्ट कर पाए और लॉजिस्टिक्स सस्ते हो। गुजरात इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एक्ट की वजह से कंपनीज रोड्स, पावर और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर में इन्वेस्ट कर पाई। इसकी वजह से गुजरात में हाईवेज बने और बिजली आई जिसकी वजह से बिजनेस करना और आसान हो गया। ये प्राइवेट सेक्टर फ्रेंडली एनवायरमेंट एक्सलरेट हो गया जब नरेंद्र मोदी गुजरात के चीफ मिनिस्टर बने। नरेंद्र दामोदर दास मोदी। और आज चाहे केमिकल्स हो या फिर टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग हो। गुजरात वन ऑफ द मोस्ट अट्रैक्टिव स्टेट्स है इन्वेस्टमेंट्स के लिए। इसी वजह से इंडस्ट्रीज के मामले में गुजरात ने महाराष्ट्र को भी पीछे छोड़ दिया है।

बंगाल का औद्योगिक पतन और टाटा नैनो विवाद

पर बंगाल यह चीज क्यों नहीं कर पाया? यह है 2008 में रतन टाटा का बयान। वी डू नॉट वांट टू कम टू एन एरिया व्हेयर वी परसीव दैट वी आर अनवांटेड। वेस्ट बंगाल के हुगली डिस्ट्रिक्ट के सिंघूर इलाके में टाटा के खिलाफ बहुत बड़ा प्रदर्शन हो रहा था। 2006 में Tata Motors ने डिसाइड किया था कि वह बंगाल में कार मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बनाएंगे अपनी गाड़ी Tata Nano के लिए। चीफ मिनिस्टर थे बुद्धादेव भट्टाचार्य जी जिन्होंने बंगाल की इकॉनमी कई सालों में डूबाने के बाद डिसाइड किया कि वो बंगाल को एक इंडस्ट्रियल हब बनाना चाहते हैं। अब जमीन के लिए किसानों को कंपनसेशन दिया गया। पर कई किसानों ने एक्सेप्ट नहीं किया। इसीलिए उन्होंने प्रदर्शन स्टार्ट किया और एक नौजवान पॉलिटिकल लीडर ममता बनर्जी ने इस प्रोटेस्ट को सपोर्ट किया। अल्टीमेटली रतन जी ने टाटा को गुड बाय बोला और वो बंगाल छोड़कर गुजरात चले गए। बंगाल सरकार ने ₹2500 करोड़ का प्रोजेक्ट तो खोया ही इसके अलावा उनको टाटा को ₹750 करोड़ देने पड़े क्योंकि उनकी वजह से उनका लॉस हो गया था। और यह एक छोटा सा उदाहरण है बंगाल की इंडस्ट्रियल कहानी के बारे में। आजादी के समय बॉम्बे, कोलकाता और मद्रास देश के इंडस्ट्रियल हब्स होते थे। इसकी वजह से महाराष्ट्र, बंगाल और तमिलनाडु देश के इकोनॉमिक सेंटर्स बन गए। 1955 में देश का 24% इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और 27% इंडस्ट्रियल जॉब्स बंगाल में थी। 50 साल बाद ये नंबर्स कितने हो गए? चार और 5%। बिहार की तरह ही बंगाल के इंडस्ट्रियल डिक्लाइन के पीछे कई ओन गोल्स भी हैं। अब कई सालों से बंगाल में जूट इंडस्ट्री बहुत मेजर इंडस्ट्री होती थी। पर पार्टीशन की वजह से ये इंडस्ट्री मानो टूट गई। 5 साल के अंदर ही जो बड़े-बड़े जूट मिल्स थे वो बंद हो गए क्योंकि जो रॉ जूट का सप्लाई था वो पाकिस्तान से आता था। इसके बाद 1965 और 1971 की जंगें हुईं। अब इन वॉर्स की वजह से इंडियन सरकार ने रेल्वेज में इन्वेस्ट करना बंद कर दिया और इससे बहुत बड़ा असर पड़ा बंगाल की इकॉनमी पर क्योंकि बंगाल की इकॉनमी अब इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज पर निर्भर करती थी और इन इंडस्ट्रीज को रेलवे की इन्वेस्टमेंट की जरूरत थी पर क्योंकि इंडियन सरकार ने रेल्वेज पर इन्वेस्ट करना कम कर दिया। इस वजह से बंगाल की इकॉनमी पर भी असर पड़ा। पर इसके अलावा बंगाल की सरकार ने भी कई ओन गोल्स करे। सबसे पहले बंगाल की पॉलिटिक्स में कम्युनिस्ट पार्टी की डोमिनेशन आई। जिसके बाद धीरे-धीरे इंडस्ट्रीज बंद होने लगी। और यह हुआ क्यों? स्ट्राइक्स और लॉकआउट्स की वजह से। स्ट्राइक्स तब होती है जब वर्कर्स काम करने से मना कर देते हैं। और लॉकआउट्स तब होते हैं जब कंपनी काम करवाने से मना कर देती है। यह वो समय था जब बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी का भारी सपोर्ट ट्रेड यूनियंस और इंडस्ट्रियल लेबर से आता था। और इसीलिए बंगाल सरकार ने कहा कि अगर कभी भी कंपनी और वर्कर्स के बीच झगड़ा होगा ना तो पुलिस कंपनी को सपोर्ट नहीं कर सकती। इसलिए कंपनीज ने सोचा कि बंगाल में इन्वेस्ट करने से क्या ही फायदा है। इसलिए वो दूसरी स्टेट चले गए। 1977 में फिर बंगाल में ज्योति बासू की लेफ्ट फ्रंट गवर्नमेंट आई। लेफ्ट फ्रंट गवर्नमेंट ने बंगाल पर राज किया 34 सालों के लिए। जिसकी वजह से वो डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड लॉन्गेस्ट सर्विंग लेफ्ट गवर्नमेंट बनी पूरी दुनिया में। इस सरकार ने छोटी इंडस्ट्रीज को प्रायोरिटी दी ना कि बड़ी कॉरपोरेशंस और फॉरेन मल्टीनेशनल कंपनीज। अब ये छोटी-मोटी लोकल इंडस्ट्रीज जॉब्स तो दे सकती थी पर ये कभी भी अच्छे प्रोडक्ट्स बना ही नहीं सकती थी क्योंकि उनके पास टेक्नोलॉजी ही नहीं थी और उसके बाद 1991 की लिबरलाइजेशन आई। 1994 में लेफ्ट गवर्नमेंट कई सालों के बाद जाग पड़ी कि भैया अब तो हमें बंगाल में इन्वेस्टमेंट चाहिए। चीफ मिनिस्टर ज्योति बासू कई कैपिटलिस्ट देश भी गए इन्वेस्टर्स को अट्रैक्ट करने के लिए। इसलिए 1991 और 2006 के बीच बंगाल में कई नई इंडस्ट्रीज आई। पर मुद्दा ये था कि बंगाल का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत खराब था। सरकार ने उन चीजों पर कभी फोकस ही नहीं किया। अब आप 10-20 साल के बाद जाग पड़े कि आपको इन्वेस्टमेंट चाहिए तो उस वजह से कंपनीज़ तो सेटअप नहीं करेंगी ना। उसके अलावा लैंड को एक्वायर करना या फिर जमीन को खरीदना बहुत मुश्किल था। जैसे हमने Tata के एग्जांपल में देखा ही। Nano हैज़ कम टू अ हॉल्ट। लास्ट इवनिंग प्रोटेस्टर्स ट्राई टू ब्लॉक अ फैक्ट्री गेट टू प्रिवेंट Tata Motors एंप्लॉई फ्रॉम लीविंग। ममता बनर्जी इंसिस्ट शी इज़ नॉट इन फेवर ऑफ वायलेंस बट इज़ नॉट रिस्पांसिबल फॉर इंडिविजुअल एक्शंस। फिर ममता बनर्जी जब चीफ मिनिस्टर बनीं, तो पार्टी का सिंबल तो बदल गया पर प्रॉब्लम्स नहीं। जैसे बंगाल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अभी भी बहुत अनऑर्गनाइज्ड है और इसीलिए अभी भी बंगाल इंडस्ट्रीज के मामले में दूसरी स्टेट्स जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश से अभी भी पिछड़ा हुआ है। अब अपनी इकॉनमी को फिक्स करने के लिए बंगाल को कई चीजें करनी होगी। इंक्लूडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में इन्वेस्ट करना। अभी दूसरी मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस ड्रिवन स्टेट्स के कंपैरिजन से बंगाल में इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बहुत कम है। जैसे इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने के लिए बंगाल गुजरात के सानंद इंडस्ट्रियल स्टेट और आंध्र प्रदेश के श्री सिटी कॉरिडोर से इंस्पिरेशन ले सकता है। इन कॉरिडोर्स में रिलायबल पानी और बिजली मिलती है। एफिशिएंट लॉजिस्टिक्स मिलते हैं और बिजनेस करने की कॉस्ट कम हो जाती है। और ऐसे डिसीजंस लेने से ना बंगाल की इमेज बदलेगी। एंड इमेज मैटर्स। अभी बंगाल हमारे देश में इंडस्ट्रियल फ्रेंडली स्टेट नहीं मानी जाती और इस इमेज को बदलने के लिए बंगाल को कई डिसीजंस लेने होंगे।

राउंड 3: पंजाब बनाम हरियाणा

अब आते हैं हमारे थर्ड राउंड में हरियाणा वर्सेस पंजाब। ये दोनों स्टेट्स हैं तो अगल-बगल पर इनकी कहानियां बहुत ही अलग है। गुजरात की तरह आजादी के बाद हरियाणा की स्टेट तो एक्सिस्ट भी नहीं करती थी। पर पार्टीशन के बाद हरियाणा के इलाके में लोगों के बीच बहुत गुस्सा था। दो कारणों की वजह से वो बोलते थे कि हिंदी स्पीकिंग एरियाज में इतनी डेवलपमेंट हो ही नहीं रही है। इसलिए चौधरी मनफूल सिंह ने एक मूवमेंट लॉन्च करी और कहा कि पंजाबी स्पीकिंग एरियाज को क्यों इतनी प्रेफरेंस दी जा रही है? फाइनली फर्स्ट नवंबर 1966 को पंजाब तीन स्टेट्स पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में डिवाइड किया गया। इनफैक्ट जब हरियाणा की स्टेट बनी तब कई लोग हरियाणा के बारे में ऑप्टिमिस्टिक नहीं थे। इनफैक्ट हरियाणा को पंजाब का गरीब भाई बुलाया जाता था। पर कुछ सालों के बाद सिचुएशन ही बदल गई और 2010 में हरियाणा ने पंजाब को टेकओवर कर लिया।

हरियाणा का आर्थिक उदय: हरित क्रांति से आईटी हब तक

तो यह हुआ कैसे? हरियाणा के बनने के बस एक साल पहले इंडिया ने दो फेमिनस देखे। इसकी वजह से अनाज की प्रोडक्शन 20% तक गिर गई। क्राइसिस के दौरान इंडियन साइंटिस्ट एमएस स्वामीनाथन ने मेक्सिको के साइंटिस्ट के साथ अनाज की हाई यील्डिंग वैरायटीज के सीड्स इंडिया में ट्राई करे और इसी के साथ इंडिया में ग्रीन रेवोल्यूशन की शुरुआत हुई और इन नई सीड्स को बहुत ज्यादा पानी चाहिए था और ये उन स्टेट्स में इंट्रोड्यूस हुई जहां इरीगेशन सिस्टम अच्छा था जैसे पंजाब और हरियाणा और यह हरियाणा के लिए एक टर्निंग पॉइंट बन गया। ग्रीन रेवोल्यूशन की वजह से हरियाणा जहां एक समय एग्रीकल्चर प्रोडक्टिविटी थी नहीं अब वो पूरे देश के लिए अनाज उगा रही थी। यही रेवोल्यूशन मिल्क इंडस्ट्री में भी देखा गया। 1970 में एक ऑपरेशन फ्लड स्टार्ट हुआ जिसका मकसद था पूरे देश में दूध की बाढ़ लाना। डेरी किसानों के साथ कोऑपरेटिव्स बनाई गई और उनको मॉडर्न रिसोर्सेज और ट्रेनिंग दी गई। हरियाणा पहली स्टेट बनी जिन्होंने इस चीज को अडॉप्ट किया। अब चाहे दूध हो, अंडे हो या फिर गेहूं। हरियाणा एक बड़ा एग्रीकल्चर हब बन गया। अब ये चीज तो पंजाब में भी हो रही थी। पर एक चीज जो हरियाणा ने करी और जो पंजाब ने नहीं करी वो है कि हरियाणा ने इंडस्ट्री और सर्विसेज पर भी फोकस किया। एक जमाने में इंडस्ट्रीज हरियाणा में बस अंबाला में होती थी। पर फिर Maruti की एंट्री हुई जिसके बाद हरियाणा का मानो रुख बदल गया। आठ बड़े-बड़े इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स हैं हरियाणा में जहां हजारों छोटी और बड़ी कंपनीज़ है। जैसे Maruti, MSBush, Honda और Nestle। हरियाणा की ग्रोथ के पीछे एक मेजर कारण उसकी लोकेशन भी है क्योंकि वो एनसीआर दिल्ली को तीन तरफ से सराउंड करती है। जिसकी वजह से बिजनेसेस उधर आना चाहते हैं और इन बिजनेसेस से जो हरियाणा ने टैक्स इनकम कमाई उस इनकम को हरियाणा ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के लिए यूज़ किया। आज हरियाणा में गुरुग्राम एक आईटी पावर हाउस है। 2015 में ही 500 से ज्यादा उधर आईटी कंपनीज आ गई थी जैसे Microsoft, HCL, Google, IBM, Motorola और Samsung और ग्रेजुअली सर्विस सेक्टर उल्टा मेन सेक्टर हो गया हरियाणा की इकॉनमी में। आज हरियाणा की पर कैपिटा इनकम पंजाब से दुगनी है। और यह इतना सरप्राइजिंग नहीं होना चाहिए।

पंजाब का वित्तीय संकट और बिजली सब्सिडी का जाल

नामी इकॉनॉमिस्ट रंजीत सिंह घुमन ने भी कहा था कि पंजाब अपने क्राइसिस को एक्सेप्ट ही नहीं करना चाहता। कौन सा क्राइसिस? पंजाब का फाइनेंसियल क्राइसिस। आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में क्लियरली कहा है कि पंजाब एक फाइनेंसियल क्राइसिस में है। इसके बारे में मैंने एक डिटेल वीडियो बनाया था जो आप इस वीडियो के बाद देख सकते हो। पर मैं आपको समराइज कर देता हूं मेन आर्गुमेंट्स है क्या? 2022-23 में पंजाब पर जो कर्ज है उनके सालाना रेवेन्यू से चार गुना ज्यादा है। इस क्राइसिस ने पंजाब सरकार की फाइनेंसेस की तो धज्जियां उड़ाई है बल्कि लोगों की उम्मीदों पर भी पानी फेरा है। आप मानोगे नहीं कि पहला वादा जो आम आदमी पार्टी सरकार ने पूरा किया था पंजाब में वो है कि उन्होंने एक Volvo बस इंट्रोड्यूस करी जालंधर से एयरपोर्ट तक। तो सरकार भी कह रही है कि भैया आपके भविष्य के लिए आप इस स्टेट से बाहर चले जाओ वही बेहतर है। और यह क्राइसिस ना एक-दो हफ्ते पहले इंट्रोड्यूस नहीं हुआ है बल्कि कई साल पहले इंट्रोड्यूस हुआ था। पंजाब सरकार की खुद की रिपोर्ट कहती है कि पंजाब के डेट इंडिकेटर्स शायद पूरे देश में सबसे खराब है। आपको ग्रीन रेवोल्यूशन याद है ना? वही रेवोल्यूशन जिसने हमारे देश के एग्रीकल्चर को बदल दिया उसी ने ही बीज बोए पंजाब के फाइनेंसियल क्राइसिस के लिए। क्योंकि यह हाई यील्डिंग वैरायटी ऑफ सीड्स इंट्रोड्यूस करी गई थी। जिनकी पानी की रिक्वायरमेंट ज्यादा थी। इसी वजह से पंजाब का कैनाल इरीगेशन सिस्टम जो था वो पानी के लिए काफी नहीं था। इसलिए किसान ट्यूबवेल और पंप सेट यूज़ करने लग गए जमीन से पानी खींचने के लिए। अब किसान इतना पानी खींच रहे थे जमीन से कि पानी कम हो गया। अब पानी कम हो गया तो उनको और बड़े पंप सेट लगाने पड़े और बड़े पंप सेट की वजह से उनकी जो इलेक्ट्रिसिटी कॉस्ट थी वो इनक्रीस हो गई। इसलिए कई किसानों ने एक भारतीय किसान यूनियन स्टार्ट किया सरकार की मदद मांगने के लिए। क्या मांग थी उनकी? कि भैया हमारा बिजली का बिल माफ करो। हमें इतने बड़े-बड़े पंप सेट लगाने पड़ते हैं। हमें ये बिजली के बिल नहीं भरने। इसके अलावा खलिस्तान मूवमेंट स्टार्ट हुई। आके खड़ी हो गई। चलो अब भगत सिंह और एक इंसर्जेंसी भी। इन्हीं चैलेंजेस की वजह से पंजाब में कोई भी सरकार किसानों के खिलाफ कुछ करना ही नहीं चाहती थी। फाइनली कांग्रेस सरकार मान गई कि वो इस डिमांड को पूरा करेंगे। पर उन्होंने यह रियलाइज नहीं किया कि इस डिमांड को एक्सेप्ट करके वो पूरी स्टेट में एक नशा इंट्रोड्यूस कर रहे हैं और नशे से बाहर निकलना इतना आसान नहीं है। एक पुरानी रिपोर्ट कहती है कि 1990 के इलेक्शंस बस सब्सिडीज के नाम ही जीते जा रहे थे। पंजाब सरकार अब बिजली की सब्सिडी में इतना भारी पैसा खर्च करती है कि उनके पास और चीजें करने के लिए अब पैसा बचा ही नहीं है। यूनाइटेड साइकिल्स एंड पार्ट्स मैन्युफैक्चर एसोसिएशन प्रेसिडेंट के डीएस चावला कहते हैं कि इंपोर्टर्स पंजाब आना ही नहीं चाहते क्योंकि हमारे पास एयर कनेक्टिविटी ही नहीं है। उल्टा कहते हैं कि आप न्यू दिल्ली आ जाओ मिलने के लिए। रिजल्ट यह है कि जहां पंजाब वन ऑफ द टॉप स्टेट से एक नीचे के स्थान पर आ गई है। हरियाणा नीचे से ऊपर पहुंच गया है। देखो पंजाब के लिए सॉल्यूशन क्लियर है। उनको अब टफ डिसीजंस लेने होंगे। उनको किसानों को बोलना होगा कि भैया तुम चावल और गेहूं नहीं उगा सकते। उल्टा उनको इंसेंटिव्स देने होंगे किसानों को दूसरे क्रॉप्स ग्रो करने के लिए। क्योंकि जो बिजली की सब्सिडीज दी जा रही है वो सस्टेनेबल नहीं है। पर देखो ये कोई नई चीज मैं नहीं कह रहा हूं। यही चीज 25 साल पहले एग्रीकल्चरल इकोनॉमिस्ट एस एस जोहल ने कही थी। कई सालों से पंजाब सरकार एक गड्ढा खोद रही है या वो नीचे जाए जा रहे हैं। वो यह रियलाइज नहीं करते कि भैया इस खुदाई के लिए किसी ना किसी को तो पैसे भरने ही होंगे। अब या तो ये पैसे भरेंगे पंजाब की करंट जनरेशन या फिर फ्यूचर जनरेशन। ये डिसाइड करना है पंजाब को।

राउंड 4: उत्तर प्रदेश बनाम तमिलनाडु

अब आते हैं हमारे चौथे राउंड में उत्तर प्रदेश वर्सेस तमिलनाडु। 1903 में एक छोटा सा लड़का जो तमिलनाडु के एक शहर में पैदा हुआ था, उसका नाम था कामराज। बचपन में अपनी पढ़ाई के लिए वो एक छोटे से स्कूल जाता था और बहुत छोटी सी उम्र में उस लड़के ने ट्रैजेडी देखी जब उसके पापा का देहांत हो गया। जिसकी वजह से उसको स्कूल छोड़ना पड़ा परिवार के लिए पैसे कमाने के लिए। और आपको पता है कि स्कूल ड्रॉप आउट ने 40 साल बाद क्या किया? वो तमिलनाडु का चीफ मिनिस्टर बना और स्कूल ड्रॉप आउट ने तमिलनाडु के एजुकेशन सेक्टर को बदल दिया।

तमिलनाडु की शिक्षा, स्वास्थ्य और मैन्युफैक्चरिंग क्रांति

जब के कामराज चीफ मिनिस्टर बने 1954 में तमिलनाडु की लिटरेसी रेट बस 19% थी और करीब 10 साल बाद यह लिटरेसी रेट 36% हो गई। इसके पीछे एक मेजर कारण था कि के कामराज ने मिड डे मील्स इंट्रोड्यूस करी स्कूल्स में जिसकी वजह से कई गरीब परिवार अब अपने बच्चों को स्कूल्स भेजना चाहते थे। पर इस एक पॉलिसी डिसीजन से तमिलनाडु के एजुकेशन और हेल्थ सेक्टर में एक इंपैक्ट आया। आज भी अगर आप असर की रिपोर्ट देखोगे तो तमिलनाडु के स्टूडेंट्स दूसरी स्टेट्स के कंपैरिजन से रीडिंग और मैथ्स में बहुत बेहतर करते हैं। हेल्थ केयर में भी तमिलनाडु सरकार ने हॉस्पिटल्स और प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स में इन्वेस्ट किया है। और इन सबका इंपैक्ट अब हम मैन्युफैक्चरिंग में देख सकते हैं। महाराष्ट्र के अलावा तमिलनाडु में भी एक देश का ऑटोमोबाइल हब है। Ford और Hyundai जैसी कंपनीज़ ने अपने प्लांट सेटअप करे हैं। अब मैन्युफैक्चरिंग तो कई और स्टेट्स में हो रही है। पर तमिलनाडु के बारे में जो यूनिक चीज है वो है कि उनकी वर्कफोर्स में कई महिलाएं हैं। हमारे देश की आधी फीमेल फैक्ट्री वर्कर्स तमिलनाडु में ही है। जहां महाराष्ट्र में 12 और गुजरात में 7% फैक्ट्री वर्क फोर्स फीमेल है। ये नंबर तमिलनाडु के लिए 40% है। इसके पीछे एक मेजर कारण है कि साल 2000 में मद्रास हाईकोर्ट ने एक रूलिंग पास करी थी कि महिलाएं भी नाइट शिफ्ट कर सकती हैं फैक्ट्रीज में। इसकी वजह से जब आप फोटोस देखोगे आज की तमिलनाडु फैक्ट्रीज में आप देखोगे कि महिलाएं देश के iPhones बना रही हैं। इसी वजह से हमारे आज की देश की मैन्युफैक्चरिंग स्टोरी तमिलनाडु की महिलाएं लिख रही हैं।

उत्तर प्रदेश: जाति की राजनीति और धीमा सुधार

अब जहां तमिलनाडु में करीब 70 सालों से हेल्थ और एजुकेशन पर फोकस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में कहानी बहुत ही अलग है। पिछड़े पावे 100 में 60। यह एक कोट था राम मनोहर लोहिया का जो उत्तर प्रदेश में कहते थे कि पिछड़े हुए समाज को 60% रिप्रेजेंटेशन मिलनी चाहिए। पर बिहार की तरह ही उत्तर प्रदेश में पॉलिटिक्स हेल्थ या फिर एजुकेशन के बारे में नहीं थी बल्कि कास्ट के बारे में थी। उत्तर प्रदेश में कास्ट डिसाइड करती कि किसके पास जमीन थी, किसको नौकरी मिलती और किसको ढंग की एजुकेशन। इसी वजह से 1950 में उत्तर प्रदेश में लिटरेसी रेट बस 12% थी। जबकि देश की एवरेज 18% थी। 40 साल तक भी हम एजुकेशन सेक्टर फिक्स नहीं कर पाए। हम पैसा तो खर्च कर रहे थे पर गलत चीजों पर। 1990 में 90% एलिमेंट्री एजुकेशन का बजट टीचर्स की सैलरीज और पेंशंस पर जाता था। अब इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम यह है कि वो टीचर्स काम भी नहीं कर रही थी। उल्टा ये टीचर्स पॉलिटिकली बहुत मजबूत हो गई थी उत्तर प्रदेश में। इनफैक्ट इन टीचर्स को गारंटीड रिप्रेजेंटेशन भी मिलती स्टेट की लेजिस्लेटिव काउंसिल में। जहां 1970 में उत्तर प्रदेश में हर आदमी के लिए ₹15 खर्च हो रहे थे हेल्थ केयर के लिए। तमिलनाडु में यह नंबर दुगना था ₹34। अगर हम आज भी बात करें तो नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स पर तमिलनाडु सेकंड रैंक पर है। जबकि उत्तर प्रदेश बहुत नीचे है। अब थैंकफुली उत्तर प्रदेश में सिचुएशन थोड़ी जरूर बदल रही है। जैसे लेटेस्ट असर रिपोर्ट के हिसाब से रीडिंग स्किल्स उत्तर प्रदेश के स्टूडेंट्स में ऑलमोस्ट दुगने हो गए हैं। ऐसा ही हाल मैथ स्किल्स का भी है। क्या बदला सरकार की पॉलिसी? 2017 में स्टेट सरकार ने ऐलान किया कि वो ऑपरेशन कायाकल्प के जरिए राज्य के स्कूल्स को बदलेंगे। इसके अलावा उन्होंने स्टेट के टीचर क्राइसिस को भी फिक्स किया जहां करीब 1.5 लाख नई टीचर्स को रिक्रूट किया गया। एक डिजिटल डैशबोर्ड बनाया गया स्टूडेंट्स और टीचर्स के परफॉर्मेंस को ट्रैक करने के लिए। देखो इंप्रूवमेंट तो हो रही है पर अभी रास्ता बहुत लंबा है। मैं आपको रिमाइंड करना चाहता हूं कि अभी उत्तर प्रदेश में जो इंप्रूवमेंट हमने देखी है रीडिंग स्कूल्स में कि अब 28% हो गई है। उसका मतलब ये है कि 28% क्लास थ्री के स्टूडेंट्स क्लास टू का टेक्स्ट पढ़ सकते हैं। ये नंबर 100% होना चाहिए। पर अभी 28% ही है।

दो बड़ी सफलता की कहानियाँ: सिक्किम और उड़ीसा

अब मैं बात करना चाहता हूं दो स्टेट्स के बारे में। ये बहुत बड़ी सक्सेस स्टोरीज है जिनके बारे में हम सबको पता होना चाहिए।

सिक्किम: ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर से आर्थिक क्रांति

अब हमें पता है कि एनएसडीपी के मामले में महाराष्ट्र हमारे देश में सबसे अमीर स्टेट है। पर पर कैपिटा बेसिस में कौन सी स्टेट है? ना महाराष्ट्र, ना गुजरात, ना तमिलनाडु वो है सिक्किम। 40 साल पहले सिक्किम की पर कैपिटा इनकम हमारी नेशनल एवरेज से कम थी। पर लास्ट 20 सालों में सिक्किम ने सारी स्टेट्स को पीछे छोड़ दिया है। तो सिक्किम ने भला ऐसा किया क्या? 2003 में सिक्किम सरकार ने एक इंपॉर्टेंट डिसीजन लिया था। जहां उन्होंने अपने एग्रीकल्चर को 100% ऑर्गेनिक बनाया। यानी कि ना कोई फर्टिलाइजर और ना कोई पेस्टिसाइड्स। हम सब हिंदुस्तानी के लिए गर्व और फक्र की बात है कि सिर्फ भारत का छोटा प्रदेश सिक्किम पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य बन चुका है। इसकी वजह से उधर की एग्रीकल्चर प्रोडक्टिविटी बढ़ गई। जैसे एक किसान कहते हैं कि उनकी उपज दुगनी या फिर तिगनी हो गई। पर एक्चुअली ये ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर तो एक बहाना था। इसकी वजह से कई और चीजें हुई जिसने सिक्किम की इकॉनमी बढ़ाई। जैसे उधर फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज आई। तो सिक्किम बस रॉ हल्दी या फिर अदरक नहीं बेच रही थी बल्कि उधर के प्रोसेसिंग सेंटर्स ने पाउडर्स और मसाले बेचने स्टार्ट करे। फिर इस ऑर्गेनिक टैग से सिक्किम में टूरिज्म बढ़ा। सिक्किम ने अपने आप की मार्केटिंग करी कि देखो हम एक ऑर्गेनिक पैराडाइस है जिससे कई टूरिस्ट उधर आए। इसके अलावा सरकार ने फार्मास्यूटिकल सेक्टर को कई सब्सिडीज दी ताकि उधर कंपनी सेटअप हो जाए। और आज कई मेजर कॉरपोरेशंस अब सिक्किम में हैं।

उड़ीसा: प्राकृतिक संसाधनों और सशक्त नेतृत्व से पुनरुत्थान

ऐसी ही एक स्टेट जिसने लास्ट 20-30 सालों में बहुत प्रोग्रेस करी है वो है उड़ीसा। उड़ीसा हमारे देश में एक ऐसी स्टेट बन सकती है जिसकी $1 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी है। ये कहा था सज्जन जिंदल ने जो जेएसडब्लू स्टील के मैनेजिंग डायरेक्टर है। 60 साल पहले उनकी बात पर कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था। क्योंकि उस समय उड़ीसा हमारे देश की सबसे गरीब स्टेट्स में से एक थी। और उड़ीसा ने भी वही तरकीब अपनाई जो तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र ने अपनाई थी। उन्होंने एग्रीकल्चर की बजाय दूसरे सेक्टर्स पर फोकस किया। लिबरलाइजेशन के बाद चीफ मिनिस्टर बीजू पटनायक ने उड़ीसा की रिसोर्सेज यूज करी और स्टील प्लांट्स, पावर प्लांट्स और रिफाइनरीज बनाई। इंफ्रास्ट्रक्चर में बीजू एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट और पोर्ट मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट स्टार्ट हुए कंपनीज़ की मदद करने के लिए। और यह सब पॉसिबल था स्ट्रांग पॉलिटिकल लीडरशिप की वजह से। इसी वजह से एक समय में जब नेचुरल डिजास्टर्स की वजह से कई जाने जाती थी उड़ीसा में। आज उड़ीसा की डिजास्टर मैनेजमेंट एक सक्सेस स्टोरी बन गई है। उड़ीसा ने एक जीरो कैजुअल्टी अप्रोच अपनाई है जो एक ग्लोबल एग्जांपल बना है साइक्लोन प्रिपेयर्डनेस में। और देखो ऐसी चीजों से ना बिजनेसेस को कॉन्फिडेंस मिलता है कि सरकार हमारी मदद करेगी अगर कोई प्रॉब्लम होती है तो। और उड़ीसा को वही फायदा मिल रहा है।

निष्कर्ष: अमीर बनने से पहले बूढ़े ना हो जाएं

एक लाइन इंडिया के बारे में बोली जाती है कि होपफुली वी बिकम रिच बिफोर वी बिकम ओल्ड। हमारे देश को बूढ़े होने से पहले अमीर बनना होगा। इसका मतलब है कि हमारे पास ज्यादा टाइम नहीं है और जो स्टेट्स महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जो अच्छा कर रही हैं ना उसका मतलब यह नहीं है कि वो आराम कर सकती हैं। अगर हम महाराष्ट्र की बात करें तो कुछ इलाके जरूर हैं जहां ऑन एवरेज एनएसडीपी ₹3 लाख से ज्यादा है पर कैपिटा। पर ऐसे कई डिस्ट्रिक्ट्स हैं जहां किसान बेचारे तड़प रहे हैं। गुजरात की पर कैपिटा इनकम हाई जरूर है पर अगर हम सोशल इंडिकेटर्स की बात करें वो बंगाल से पिछड़े हुए हैं। तमिलनाडु मैन्युफैक्चरिंग में तो बहुत अच्छा कर रहा है पर साउथ ईस्ट एशिया के कंपैरिजन से हम बहुत पीछे हैं। इसके पीछे एक मेजर कारण है कि हमारे देश में कोई ब्लू कॉलर वर्कर की अच्छी ट्रेनिंग ही नहीं है। वियतनाम, चाइना, ऑस्ट्रेलिया, यूएस में प्लंबर्स या फिर इलेक्ट्रिशियंस की एक अच्छी ट्रेनिंग होती है और ये रिस्पेक्टेबल जॉब्स होती है। पर हमारे देश में तो हम मानते हैं कि एकदम बेकार नौकरी है। तो यह वीडियो मेरा एक अटेम्प्ट था ताकि हम फोकस ला सकें इकॉनमी पर। बिकॉज़ इवेंचुअली व्हाट मैटर्स इज़ कि भैया पैसा कितना है लोगों के पास। और यह तभी होगा जब हमारे पॉलिसी मेकर्स इन चीजों पर ध्यान देंगे।