Bihar has no industries. Why?
बिहार में उद्योग और विकास की पहेली
क्यों समुद्र से दूरी बहाना नहीं हो सकती और क्या हैं असली रुकावटें
1. लैंडलॉक राज्य का तर्क — सच या सुविधाजनक बहाना?
बिहार से सबसे निकटतम बंदरगाह लगभग 700 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के हल्दिया में है। यह भौगोलिक स्थिति मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नियंत्रण से बाहर है और इसी कारण बड़े उद्योग बिहार की ओर आकर्षित नहीं होते — ऐसा अक्सर कहा जाता है। बिहार चारों ओर से स्थलरुद्ध है और समुद्र से सटे इलाकों में ही उद्योग लगाए जाते हैं। यहाँ तक कि पिछले वर्ष नीतीश कुमार की पार्टी के एक सदस्य ने राज्यसभा में माँग उठाई थी कि लैंडलॉक्ड राज्यों जैसे बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश को विशेष सुविधाएँ (personalities — port connectivity incentives) दी जाएँ ताकि ये राज्य अपने स्वयं के बंदरगाह विकसित कर सकें।
2. इतिहास गवाह है — समुद्र से दूरी हमेशा बाधा नहीं रही
यह पूरी तरह सच नहीं है कि बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन का मुख्य कारण उसका लैंडलॉक होना है। औपनिवेशिक काल में बिहार उतना पिछड़ा नहीं था। उस समय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर टिकी थी, परंतु यह क्षेत्र कोलकाता बंदरगाह के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों से जुड़ा हुआ था। पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे अन्य स्थलरुद्ध राज्यों की ओर देखें तो वे बिना समुद्री तट के भी औद्योगिक विकास कर चुके हैं। इसलिए केवल तटीय रेखा की अनुपस्थिति को दोष देना न्यायसंगत नहीं होगा।
3. नीतीश कुमार के शासनकाल में कानून-व्यवस्था में सुधार, लेकिन निवेश क्यों नहीं?
अनेक विशेषज्ञों ने स्वीकार किया है कि नीतीश कुमार के आने के बाद कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ। स्वयं मुख्यमंत्री ने भी माना कि इसके बावजूद निजी निवेश नहीं आ पाया। एक रिक्शा चालक के शब्दों में — “ना कोई रोज़ी है, ना रोटी है, कहीं कुछ नहीं मिल रहा है।” सुशील कुमार मोदी ने एक साक्षात्कार में बताया कि कोई भी सरकार किसी कंपनी को जबरन नहीं ला सकती। उद्योगपतियों को 20 अलग-अलग लोगों से बात करनी पड़ती है और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया बेहद जटिल है। छोटे-छोटे किसानों की पूरी आजीविका ज़मीन पर निर्भर है, इसलिए वे आसानी से ज़मीन बेचना नहीं चाहते।
4. सकारात्मक औद्योगिक नीति का जादू — गुड़गांव की मिसाल
लगभग 40 वर्ष पहले हरियाणा सरकार ने मारुति को गुड़गांव में संयंत्र लगाने के लिए आमंत्रित किया और बंजर ज़मीन पर सब्सिडी दी। इसके बाद एक के बाद एक कंपनियाँ आती गईं और गुड़गांव एक बड़ा औद्योगिक केंद्र बन गया। जब सरकार उद्योग-समर्थक नीतियाँ आरंभ करती है तो उससे उद्यमिता को स्वाभाविक बढ़ावा मिलता है। ऐसे ही बेंगलुरु अपनी तकनीकी प्रतिभा और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसी संस्थाओं के कारण स्टार्टअप का गढ़ बन गया।
5. बिहार में औद्योगिक स्पिल-ओवर क्यों नहीं हुआ — तीन प्रमुख कारण
(क) सरकार की प्रतिष्ठा और विश्वास की कमी
पिछले 20 वर्षों में अनेक लघु उद्योग बंद हो गए। लगभग 2,000 राइस मिलें और 15 से अधिक चीनी मिलें बंद हुईं। कुछ को सरकारी नियंत्रण के कारण बंद करना पड़ा, तो कई वसूली (जबरन उगाही) और भय के माहौल का शिकार हुईं। मुज़फ़्फ़रपुर, नवादा, किशनगंज जैसे ज़िलों में आज भी खाली पड़ी फैक्ट्रियाँ गवाह हैं। बिहार सरकार को सबसे पहले निवेशकों के बीच अपनी साख बहाल करनी होगी और विश्वास का माहौल बनाना होगा।
(ख) नीतियों की घोषणा और क्रियान्वयन के बीच का अंतर
2006 में जब नीतीश कुमार ने नई औद्योगिक नीति घोषित की, तो उसके तहत सब्सिडी देने का वादा किया गया। परंतु कई कंपनियों को वह सब्सिडी मिली ही नहीं। 2020 में पटना उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को सब्सिडी देने का निर्देश दिया, फिर भी व्यवसायियों को उम्मीद नहीं कि बिना अदालत गए उनका भुगतान होगा। 2015 में लाई गई पॉलिसी ‘पोस्ट-प्रोडक्शन इंसेंटिव’ पर आधारित थी, यानी पहले कारखाना लगाओ, फिर लाभ मिलेगा। ऐसे माहौल में जहाँ सरकार पर भरोसा ही नहीं, यह उम्मीद करना कठिन है। व्यवसायी सत्यजीत सिंह मखाना प्रसंस्करण इकाई लगाना चाहते थे, पर सरकार ने अनुमति नहीं दी। भागलपुर में छोटा हवाई अड्डा बनाकर कनेक्टिविटी सुधारने की इच्छा रखने वाले उद्यमी को भी सहयोग नहीं मिला।
(ग) राजनीति की दिशा — सामाजिक न्याय से आर्थिक विकास तक का सफ़र
बिहार में 19वीं-20वीं सदी में कोई मजबूत जन-नेता नहीं उभरा जो आर्थिक विकास को मुद्दा बना पाता। दक्षिण भारत के द्रविड़ आंदोलनों या महाराष्ट्र के अंबेडकरवादी आंदोलन के विपरीत, बिहार की राजनीति पर सवर्ण वर्चस्व बना रहा। लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ों और दलितों को सामाजिक न्याय का वादा कर सत्ता हासिल की। उनकी सरकार ने सामाजिक परियोजनाओं पर संसाधन केंद्रित किए और औद्योगिक विकास को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया। नतीजतन, राज्य की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती गई और बाहर पलायन बढ़ता गया। अब स्थिति बदल रही है; 2020 के चुनाव में तेजस्वी यादव ने “नया बिहार” का नारा देते हुए कहा कि सामाजिक न्याय का दौर बीत चुका है, अब आर्थिक न्याय का समय है।
6. भूमि अधिग्रहण — सबसे पेचीदा चुनौती
बिहार में भूदान आंदोलन और ज़मींदारी उन्मूलन कानूनों के कारण भूमि का वितरण अपेक्षाकृत बिखरा हुआ है। अधिकांश किसान छोटे जोत वाले हैं और उनकी रोज़ी-रोटी ज़मीन से जुड़ी है। इसलिए भूमि अधिग्रहण राजनीतिक और सामाजिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। सरकार का ताज़ा समाधान यह है कि वह स्वयं ज़मीन अधिग्रहण न करके केवल मध्यस्थता करेगी। जो किसान अपनी ज़मीन बेचना चाहते हैं, वे सामूहिक रूप से अपनी ज़मीन का मूल्य तय करेंगे और ज़िला अधिकारी के माध्यम से एक वेबसाइट पर विवरण साझा किया जाएगा। इच्छुक कंपनियाँ सीधे किसानों से संपर्क कर सकेंगी।
7. सरकार के प्रयास और आगे की राह
बिहार सरकार ने इथेनॉल उत्पादन जैसी कृषि-आधारित उद्योगों में स्वयं निवेश करना शुरू किया है। 2019 में नई औद्योगिक नीति लाई गई जिसके तहत परिवहन लागत पर सब्सिडी का प्रावधान है। लेकिन ये सभी पहल तभी सफल होंगी जब सरकार अपने वादों पर खरी उतरेगी और समय पर लाभार्थियों को भुगतान होगा।
जब तक प्रशासनिक विश्वास बहाल नहीं होता, बुनियादी ढाँचा और सुशासन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक बिहार के लोग रोज़गार की तलाश में राज्य से बाहर पलायन करते रहेंगे।
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