गार्गी से मुर्मू तक: क्या सच में बदली है भारतीय नारी की किस्मत? जानिए पूरा सच।

भारतीय समाज में महिलाओं की जगह और उनके अधिकारों को किसी एक सीधे तराजू में नहीं तौला जा सकता। अगर हम अपने भारतीय इतिहास को उठाकर देखें, तो यह कहानी सीधी-सपाट बिल्कुल नहीं रही है। इसमें एक तरफ महिलाओं के ज्ञान और नेतृत्व की झलक मिलती है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक बंदिशों और भेदभाव का एक लंबा दौर भी दिखता है। वैदिक काल से शुरू होकर यह कहानी आज के स्पेस रिसर्च सेंटर्स, स्पोर्ट्स ग्राउंड और कॉरपोरेट बोर्डरूम्स तक सफलता से पहुँची है। यह सिर्फ समय बीतने का सफर नहीं है, बल्कि अपनी पहचान और हक को खुद हासिल करने की एक निरंतर कोशिश है।

वैदिक काल से अंधकार युग तक: इतिहास के पन्ने

प्राचीन भारत के वैदिक दौर में महिलाओं की स्थिति वैसी बिल्कुल नहीं थी, जैसी बाद के दिनों में बन गई थी। उस ज़माने में महिलाओं को पुरुषों के बराबर समझा जाता था। उन्हें पढ़ने-लिखने का पूरा राइट था। उनका उपनयन संस्कार (पढ़ाई शुरू करने और जनेऊ धारण करने का धार्मिक अनुष्ठान) भी होता था और समाज के बड़े डिसीजन्स मेकिंग में उनकी राय अवश्य ली जाती थी। उस दौर में वेदों और दर्शन की जानकार महिलाओं को 'ब्रह्मवादिनी' कहा जाता था। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने ज्ञान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। राजसभाओं में जीवन के मुश्किल सवालों पर वे ऋषियों से सीधे डिबेट में टक्कर देती थीं। ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ विदुषी गार्गी की वो ऐतिहासिक बहस आज भी भारतीय दर्शन में काफी प्रसिद्ध है, जिसका जिक्र 'बृहदारण्यक उपनिषद' में हमे मिलता है।

लेकिन समय बदलने के साथ-साथ यह स्थिति क्रोनोलॉजिकली बिगड़ने लगी। मध्यकाल में आकर हालात काफी खराब हो गए थे। लगातार बाहरी हमले होने लगे और सुरक्षा की चिंता बढ़ गई। पुरानी संकीर्ण सोच की वजह से महिलाओं की आजादी पर एक के बाद एक कई पाबंदियां लगा दी गईं। बाल विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा और लड़कियों को पढ़ाई से दूर रखने जैसी अंधविश्वास और रूढ़िवादी विचारधारा समाज में गहरी जड़ें जमा गईं। महिला की पहचान सिर्फ घर-गृहस्थी संभालने और परिवार को आगे बढ़ाने तक ही सीमित कर दी गई। समाज एक तरह से भूल ही गया कि मानो इसी समाज में कभी गार्गी और मैत्रेयी जैसी ज्ञानी महिलाएं भी हुआ करती थीं।

सामाजिक पुनर्जागरण और आजादी का आंदोलन

यह लंबा और मुश्किल दौर 19वीं सदी की शुरुआत में धीरे धीरे बदलना शुरू हुआ। भारत में समाज सुधार का एक नया दौर आया। धर्म और परंपरा के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ देश के महान व्यक्तित्व ने आवाज उठानी शुरू की। एक तरफ जैसे राजा राममोहन राय ने लगातार प्रयास करके सती प्रथा को बंद कराने के लिए कानूनी आधार बनवाया। तो दूसरी तरफ ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने कड़े सामाजिक विरोध का सामना करते हुए विधवा पुनर्विवाह शुरू कराया और लड़कियों की शुरुआती एजुकेशन के लिए काम किया। ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने वंचित वर्ग की लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। वहीं बेगम रुकैया ने अपनी लिखावट से मुस्लिम महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने की रूप रेखा बनबा दी।

इसी सामाजिक सुधार की नींव पर 20वीं सदी में आजादी की लड़ाई शुरू हुई। इस आंदोलन में महिलाएं केवल घर की चार दीवारों में बंद नहीं रहीं, बल्कि बे अब सीधे मैदान में उतरीं। अंग्रेजों के खिलाफ इस लड़ाई में सरोजिनी नायडू, मातंगिनी हाजरा, प्रीतिलता वाद्देदार, कल्पना दत्त और अरुणा आसफ अली जैसी महिलाओं ने आगे बढ़कर काम किया। आजादी के बाद 1950 में जब स्वतंत्र भारत का संविधान लागू हुआ, तो एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया और पहले ही दिन से महिलाओं को पुरुषों के बराबर का वोटिंग राइट मिला। जहाँ अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में महिलाओं को इस अधिकार के लिए दशकों तक लंबा संघर्ष करना पड़ा था, लेकिन भारत ने अपनी बेटियों के लिए इसे शुरुआत से ही अपने संविधान में शामिल किया।

बीते तीन-साढ़े तीन दशकों के बड़े बदलाव

अब आते है आज के दौर में । आजादी के बाद शुरुआती दशकों में कानून में अधिकार तो जरूर मिले, लेकिन आम और ग्रामीण महिलाओं की लाइफ में बदलाव की रफ्तार फिर भी धीमी थी। हालांकि, पिछले 30 से 35 सालों में देश की इकोनॉमी, सोसाइटी और टेक्नोलॉजी में जो बदलाव आए हैं, उन्होंने महिलाओं की स्थिति को काफी हद तक बदला है।

अगर हम 1990 के दशक को देखें, तो 1992-93 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए 33% सीट्स रिजर्व कीं गई। इसी दौरान इला भट्ट की संस्था 'सेवा' (SEWA) ने अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को आर्थिक रूप से धीरे धीरे जोड़ना शुरू किया। 1997 में कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला बनीं। उसी साल अरुंधति रॉय को उनकी किताब के लिए इंटरनेशनल बुकर प्राइज मिला।

2000 के दशक में 2005 का घरेलू हिंसा से बचाव का कानून आया। इसके साथ ही हिंदू उत्तराधिकार कानून में बदलाव करके बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का राइट दिया गया। हालांकि, भारत में अलग-अलग पर्सनल लॉ होने के कारण संपत्ति के अधिकारों में आज भी असमानता साफ दिखती है, पर बोलने वाला कोई नहीं। जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार में बेटी को, बेटे के मुकाबले आधा हिस्सा ही मिलने का प्रावधान है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यह स्थिति कब बदलेगी और क्या सभी महिलाओं को समान संपत्ति अधिकार देने के लिए, किसी नए सामाजिक या कानूनी सुधार की जरूरत होगी?

इसी दशक में 2006 में इंद्रा नूयी पेप्सिको की ग्लोबल सीईओ बनीं और 2007 में प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। स्पोर्ट्स में सानिया मिर्जा ने टेनिस में अपनी जगह बनाकर यह दिखाया कि लड़कियां, खेल में भी सफलता से अपना शानदार करियर बना सकती हैं।

2010 के दशक में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे अभियानों के साथ-साथ साइंस और डिफेंस में भी महिलाओं ने अपनी छाप छोड़ी। 2013-14 के इसरो (ISRO) के 'मंगलयान' प्रोजेक्ट में ऋतु करिधाल और नंदिनी हरिनाथ जैसी महिला साइंटिस्ट्स की भूमिका अहम रही। 2016 में अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोहना सिंह भारतीय वायुसेना की पहली महिला फाइटर पायलट बनीं। वहीं दूसरी तरफ ओलंपिक्स में पी. वी. सिंधु और मैरी कॉम ने मेडल जीतकर देश का परचम लहराया।

2020 के दशक की बात करें तो 2022 में द्रौपदी मुर्मू भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं। बिजनेस में फाल्गुनी नायर के 'नायका' (Nykaa) ब्रांड ने दिखाया कि महिलाएं खुद की बल पर ही बड़ा बिजनेस खड़ा कर सकती हैं। वहीं राजनीति के क्षेत्र में सितंबर 2023 में पास हुआ 106वां संविधान संशोधन कानून ('नारी शक्ति वंदन अधिनियम') संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीट्स रिजर्व करने का रास्ता साफ करता है।

ग्राउंड रियलिटी और सरकारी रिपोर्टों के आंकड़े

कानूनों और चुनिंदा बड़ी सफलताओं से मुंह उठा कर अगर हम देश की जमीनी हकीकत और हालिया रिपोर्टों को देखें, तो कई बड़ी चुनौतियां आज भी दीवार की तरह सामने खड़ी हैं:

महिला सुरक्षा: एनसीआरबी (NCRB) और सुरक्षा से जुड़ी हालिया रिपोर्टों के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं की सेफ्टी और जेंडर आधारित अपराध आज भी एक चिंताजनक मुद्दा बने हुए हैं।

रोजगार में भागीदारी: पीएलएफएस (Periodic Labour Force Survey) के डेटा के मुताबिक, पढ़ाई-लिखाई में लड़कियों का नामांकन जरूर बढ़ा है। लेकिन दूसरी तरफ नौकरियों और फॉर्मल लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले अभी भी काफी कम है।

बिना वेतन का काम: इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) का डेटा बताता है कि हमारे समाज में खाना बनाने, घर संभालने और बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल का ज्यादातर बोझ अकेले महिलाओं पर ही रहता है।

डिजिटल दूरी: हालिया नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) और डिजिटल रिपोर्टों के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के पास स्मार्टफोन्स और इंटरनेट का एक्सेस कम है, जिससे एक डिजिटल गैप बना हुआ है।

आगे की राह और आशा की किरण

इतिहास बताता है कि जब भी महिलाओं को सही मौके और माहौल मिला, उन्होंने अपनी क्षमता साबित करके ही दिखाई है। उनके लिए वैदिक काल से लेकर आज की टेक्नोलॉजी और डिसीजन मेकिंग तक का सफर आसान नहीं रहा है। भारतीय महिलाओं ने हर दौर में अपने अधिकारों और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष किया है, और आज भी जारी है। वूमेन एम्पावरमेंट कोई एहसान या मदद नहीं है, बल्कि यह दुनिया के किसी भी स्वस्थ तथा सभ्य समाज के आगे बढ़ने की एक जरूरी और अभिन्न शर्त है। आधी आबादी को पीछे छोड़कर कोई भी समाज पूरा विकास कभी भी नहीं कर सकता। पुरानी गलतियों को मान कर, उस से सीखकर एवं सामाजिक सोच को और ज्यादा बेहतर बनाकर ही, एक बराबरी वाला समाज निश्चित तौर पर बनाया जा सकता है।