इंडिया में क्यों बढ़ रही है इनइक्वैलिटी? जानिए 'दो भारत' बनने के मेन रीजंस

कुछ ही दिन पहले नॉर्थ इंडिया के एक कोने के गांव से काम की तलाश में मुंबई आया एक लड़का सड़को पर झोला लेके खड़ा है । बही से बो देख रहा है एक तरफ आसमान छूती लग्जरी बिल्डिंग्स, जहां करोड़ों की गाड़ियां पार्क होती हैं। बही दूसरी तरफ झुग्गियों की कतार है, जहां एक फैमिली को दो वक्त के खाने के लिए दिनभर हार्ड स्ट्रगल करके अपना पसीना बहाना पड़ता है। यह सिर्फ मुंबई का सीन नहीं, बल्कि पूरे इंडिया की हर्ष रियलिटी है। एक तरफ मॉल और ऊंची इमारतों वाला शाइनिंग इंडिया है, तो दूसरी तरफ बेसिक फैसिलिटीज के लिए जूझता दूसरा भारत। आखिर यह गैप इतना गहरा क्यों है? यह सिचुएशन असल में बनी कैसे? और क्या रियलिटी में इसका कोई पर्मानेंट सोल्यूशन भी है?

आज़ादी के 75 साल बाद भी देश के लाखों गांवों की रियलिटी कागज़ों पर दर्ज नहीं होती। पूर्वी भारत के एक गांव का सच्चा किस्सा इसकी परफेक्ट मिसाल है। जहां घर के सामने की सड़क आज भी कच्ची है। उसी कच्चे रास्ते पर पहली पीढ़ी यानि उनके दादा बड़े हुए, फिर दूसरी पीढ़ी, उनके पिता बड़े हुए, और अब तीसरी पीढ़ी यानि घर का युवा मेंबर खुद तीस साल का हो चुका है–फिर भी रोड पक्की नहीं बन पाई। उन लोगों पंचायत से कर ब्लॉक और जिला प्रशासन तक दौड़-भाग किया, लेकिन नतीजा जीरो। तीन जेनरेशंस गुज़र गईं, पर एक बेसिक फैसिलिटी वहीं की वहीं अटकी रह गई। यही "दूसरा भारत" है, जो चमक-दमक से काफी दूर दिखाई देता है।

डेटा क्या कहता है ?

यह असमानता सिर्फ फील करने की बात नहीं है, डेटा भी इसे पक्की तौर पर कन्फर्म करता है।

वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, भारत के टॉप 10% अमीर लोगों के पास नेशनल इनकम का करीब 58% शेयर है, जबकि बॉटम 50% आबादी, सिर्फ 15% पर गुज़ारा करती है।

वेल्थ का गैप ? उसका गैप तो और गहरा है। टॉप 1% अमीरों के पास देश की कुल वेल्थ का लगभग 40% हिस्सा है, जबकि बॉटम 50% के हिस्से में सिर्फ और सिर्फ 6% आता है। यह गैप पिछले एक डिकेड (2014-2024) से लगभग सेम बना हुआ है।

पावर्टी कम करने में इंडिया ने कुछ हद तक बेहतर किया है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक एक्स्ट्रीम पावर्टी 2011-12 के 16.2% से घटकर 2022-23 में सिर्फ 2.3% रह गई है। इस दौरान करीब 17 करोड़ लोग पावर्टी लाइन से बाहर आए। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक मल्टीडायमेंशनल पावर्टी भी 2013-14 के 29.17% से घटकर 2022-23 में 11.28% पर आ गई है। एम्प्लॉयमेंट का सीन मिक्स्ड है। PLFS 2025 के अकॉर्डिंग, ओवरऑल अनएम्प्लॉयमेंट रेट 3.1% पर स्टेबल है। यूथ अनएम्प्लॉयमेंट 2022 के 10.9% से घटकर 9.9% पर आया है। लेकिन पढ़े-लिखे युवाओं में अनएम्प्लॉयमेंट रेट काफी हाई है–नेशनल एवरेज से तीन गुना, यानी लगभग 11.2%।

मैसेज क्लियर है। एक भारत पावर्टी से बाहर निकल रहा है, लेकिन क्वालिफाइड यूथ के लिए भी जॉब पाना बड़ा चैलेंज बन चुका है। एजुकेशन और जॉब मार्केट की डिमांड में बड़ा गैप है, और वेल्थ कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटती जा रही है।

दो भारत कैसे बने? मेन रीजंस क्या हैं ?

अगर गहराई से विश्लेषण करके देखे तो यह गैप रातों-रात नहीं बना। इसके पीछे कई हिस्टोरिकल और पॉलिसी-लेवल फेल्योर रहा हैं।

ब्रिटिश रूल और पोस्ट-इंडिपेंडेंस पॉलिसी गैप्स: ये ऐतिहासिक सच्चाई है के ब्रिटिश शासन भारत से बेशुमार दौलत लूटकर ले गया। इस बात कोई इनकार नहीं करता । लेकिन आज़ादी के बाद जो भी रिसोर्सेज बचे, उन पर सभी नागरिकों को इक्वल राइट्स क्यों नहीं मिले? कहीं न कहीं पोस्ट-इंडिपेंडेंस सरकारों के डिसीजंस और पॉलिसीज़ में कमियां रहीं है, जिससे डेवलपमेंट का फायदा हर तबके तक बराबर नहीं पहुंचा। तब के ज़मींदारी सिस्टम ने इस प्रॉब्लम को और गहरा किया।

1991 के बाद की अनइक्वल ग्रोथ: उदारीकरण के बाद GDP तेज़ी से बढ़ी, पर इसका डायरेक्ट बेनिफिट सिर्फ शहरी और एजुकेटेड क्लास को मिला। रूरल और अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर तेजी से काफी पीछे छूट गया।

एजुकेशन और हेल्थकेयर तक अनइक्वल एक्सेस: जहां भारत से गरीब दुनिया के कई देशों में आम से आम नागरिक के पास फाइव स्टार एजुकेशनल और हेल्थकेयर फैसिलिटीज का एक्सेस है । बही भारत के प्राइवेट स्कूल्स-हॉस्पिटल्स सिर्फ अमीर क्लास के लिए अफोर्डेबल हैं, जबकि गवर्नमेंट इंस्टीट्यूशंस रिसोर्सेज की कमी से जूझ रहे हैं। इससे गरीब बच्चे शुरुआत से ही पीछे रह जाते हैं।

अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर का डोमिनेंस: बड़ी आबादी अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करती है, जहां न फिक्स्ड सैलरी है और न कोई सोशल सिक्योरिटी। इससे फैमिली को कभी भी फिर से पावर्टी में जाने का खतरा रहता है।

रीजनल इनइक्वैलिटी: डेवलपमेंट की बात करे तो ये सिर्फ कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित रहा। कई रूरल एरियाज आज भी इन्वेस्टमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर से वंचित हैं, जिससे जॉब्स का इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन नहीं हो पा रहा है।

टैक्स सिस्टम की लिमिटेशंस: वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट के मुताबिक ये हकीकत है के भारत का टैक्स सिस्टम सुपर-रिच क्लास पर पर्याप्त टैक्स नहीं लगा पाता, जिससे एजुकेशन-हेल्थ में गवर्नमेंट इन्वेस्टमेंट सीमित रह जाता है।

क्या गरीब सच में काम नहीं करना चाहते? (माइंडसेट वर्सेस रियलिटी)

अक्सर बिजनेसमैन और एलीट क्लास के एक खेमें के लोग यह आर्गुमेंट देते हैं कि "गरीब लोग काम ही नहीं करना चाहते, वे बस बैठकर हमारे टैक्स के पैसों से मिलने वाली सरकारी फैसिलिटीज और फ्रीबीज पर डिपेंड रहना चाहते हैं।"

लेकिन क्या यह सच है? प्रैक्टिकली देखा जाए, तो ऐसे लोगों का नंबर सिर्फ 5-10% ही होगा शायद, जो काम किए बिना सरकारी सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं। बाकी 90% गरीब लोग तो ईमानदारी से मेहनत करके अपने परिवार के लिए कमाना चाहते हैं। असली प्रॉब्लम नीयत में नहीं, बल्कि यह है कि उनके पास काम करने के लिए सफिशिएंट जॉब्स या फील्ड्स ही अवेलेबल नहीं हैं। जब ये फैसिलिटीज ही नहीं होंगी, तो कोई काम कैसे करेगा? इसलिए गरीबी को लोगों का आलस कहना ग्राउंड रियलिटी से आंखें मूंदने जैसा है।

गवर्नमेंट स्कीम्स: कितना इम्पैक्ट और कितनी दूरी बाकी ?

गवर्नमेंट ने इस गैप को कम करने के लिए कई बड़े स्टेप्स उठाए हैं।

मनरेगा (MGNREGA) ने रूरल एरियाज में एम्प्लॉयमेंट की गारंटी देकर करोड़ों परिवारों को सपोर्ट दिया। प्रधानमंत्री जन धन योजना ने बैंकिंग सर्विसेज को गांव-गांव तक पहुंचाया। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से सब्सिडी सीधे अकाउंट्स में पहुंचने से करप्शन कम हुआ। स्किल इंडिया, PM मुद्रा योजना और स्टार्टअप इंडिया जैसी स्कीम्स जॉब क्रिएशन को कुछ हद तक तो बढ़ावा दे रही हैं।

SBI रिसर्च के मुताबिक इन स्टेप्स का पॉजिटिव इम्पैक्ट दिखा है। रूरल-अर्बन कंजप्शन एक्सपेंस का गैप 2009-10 के 88.2% से घटकर अब करीब 70% रह गया है। लेकिन फैक्ट यह भी है कि ये स्कीम्स पावर्टी तो कम कर सकी हैं, इनइक्वैलिटी नहीं। गरीबी कम होना और अमीर-गरीब का गैप घटना–दो अलग अलग बातें हैं।

दूसरी तरफ रियल लाइफ में ग्राउंड रियलिटी अलग होती है। कई गरीब परिवारों का एक्सपीरियंस है कि जन धन अकाउंट तो खुल गया, पर जब मिनिमम बैलेंस मेंटेन नहीं रह पाया, तो बैंक ने पेनल्टी लगा दी। जिस स्कीम का मेन गोल सिक्योरिटी देना था, वही एक बोझ बन गई।

क्या इसका परमानेंट सोल्यूशन पॉसिबल है?

इस प्रॉब्लम का कोई क्विक सोल्यूशन नहीं है, लेकिन कुछ प्रैक्टिकल स्टेप्स उठाए जा सकते हैं । जैसे पब्लिक एजुकेशन और हेल्थकेयर में इन्वेस्टमेंट बढ़ाना, ताकि हर बच्चे को इक्वल अपॉर्चुनिटी मिले। टैक्स सिस्टम को प्रोग्रेसिव बनाना, ताकि रिच क्लास का रेवेन्यू सोशल डेवलपमेंट में इस्तेमाल हो सके, जो भारत के ही रिसोर्सेज़ यूज़ करके उन्हें मिलती है। अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर के वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी और पेंशन कवर के दायरे में लाना बहुत जरूरी है। रूरल एरियाज और छोटे शहरों में जॉब्स और इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट को और बढ़ावा देना, ताकि इनइक्वैलिटी कम से कम हो सके।

असली चैलेंज सिर्फ इकोनॉमिक ग्रोथ की स्पीड बढ़ाना नहीं है, बल्कि उस ग्रोथ का बेनिफिट हर इंडियन तक पहुंचाना है। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक पेपर्स पर पावर्टी भले ही कम दिखे, ग्राउंड पर "दो भारत" की पिक्चर बनी रहेगी। जिस दिन यह चैलेंज सॉल्व होगा, उसी दिन ये दो भारत आपस में मिलकर सचमुच एक शक्तिशाली भारत बना पाएंगे। तब तरक्की सिर्फ कुछ लोगों की स्टोरी नहीं, बल्कि पूरे देश की मिलीजुली जीत होगी।