​आधुनिक भारत में जाति-प्रथा: बदलाव या सिर्फ नया रूप?

आज़ादी के साढे सात दशक बीत चुके हैं। फिर भी भारतीय सोसाइटी की एक बड़ी प्रॉब्लम का जवाब नहीं मिलता। अगर हम सचमुच एक जात-पात से मुक्त आधुनिक समाज बन चुके हैं, तो जाति-प्रथा आज भी क्यों बची हुई है? यह क्यों नया रूप धारण कर रही है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में छुआछूत को खत्म कर दिया गया है। कानून की नजर में सब बराबर हैं। शहरों में आधुनिक मॉल, कैफे और हाई-टेक ऑफिस बन चुके हैं। यह बिल्कुल सच है। लेकिन क्या हमारे अंदर की सच्चाई बदली है? इस सवाल के पीछे छिपी ज़मीनी हकीकत का एनालिसिस करना बेहद ज़रूरी है।

कानून बनाम हकीकत का टकराव

आज़ाद भारत के संविधान ने नागरिकों को बराबरी का वादा किया था। लेकिन कानून की नज़र में जो चीज़ मना है, सामाजिक और मेंटल लेवल पर उसकी जड़ें आज भी बहुत गहरी जमी हुई हैं।

आज के आधुनिक भारत का मुख्य सवाल कोई मामूली ऐतिहासिक बहस नहीं है। यह हमारे आज के समाज का चेहरा है। शहरों और हायर एजुकेशन के आने से छुआछूत का बाहरी रूप भले ही थोड़ा धुंधला हुआ हो, लेकिन खून के रिश्तों, पॉलिटिक्स और सोच में जाति-प्रथा आज भी बहुत मजबूत बेस बनकर टिकी हुई है। यह लगातार अपना रूप बदल रही है।

शिक्षा और शहरीकरण: पारंपरिक जाति-प्रथा में बदलाव

अर्बनाइजेशन और शिक्षा के फैलने से पुरानी छुआछूत और रोजमर्रा की जिंदगी का भेदभाव यकीनन कम हुआ है।

बस, ट्रेन, मेट्रो या शहर के किसी रेस्तरां में कौन किसके पास बैठकर खा रहा है या सफर कर रहा है, वहां जाति ढूंढने का कोई ऑप्शन नहीं है। उच्च शिक्षा और आधुनिक कॉर्पोरेट कल्चर के कारण लोग पुराने पारंपरिक काम छोड़ रहे हैं। वे अपनी योग्यता के हिसाब से काम करने के मौके पा रहे हैं।

लेकिन यह बदलाव सिर्फ 'बाहरी बर्ताव' तक ही सीमित है। अंदर की सोच में कितना बदलाव आया है, यह लोगों की पर्सनल लाइफ को देखने पर साफ हो जाता है।

शादी और खून के रिश्ते: कट्टरता का संस्थागत रूप

पढ़ाई-लिखाई का स्तर बढ़ने के बावजूद परिवार और शादी-ब्याह के मामले में पुरानी सोच लगभग वैसी ही बनी हुई है।

इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे और प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने 2021 में धर्म और समाज पर एक सर्वे किया था। इसके डाटा के मुताबिक भारत में इंटर-कास्ट मैरिज का रेट सिर्फ 5% से 6% के करीब है। यह स्थिति बहुत निराशाजनक है। प्यू रिसर्च के सर्वे में एक और बात सामने आई। भारत के लगभग 82% लोग मानते हैं कि अपनी जाति से बाहर शादी रोकना बेहद जरूरी है। आधुनिक मैट्रिमोनियल वेबसाइटें भले ही एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन वहां कास्ट का फिल्टर सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के डाटा एक गंभीर बात बताते हैं। ग्रामीण और छोटे शहरों में पिछड़ी और ऊंची जातियों के बीच शादियों पर ऑनर किलिंग और हिंसा के केस आज भी अक्सर होते हैं। NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 30-35 लोग ऑनर किलिंग में जान गंवाते हैं। उदाहरण के लिए, 2021 में 33 और 2022 में 25 केस दर्ज हुए। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। समाजशास्त्रियों, कानूनी विशेषज्ञों और ह्यूमन राइट्स कार्यकर्ताओं के मुताबिक, NCRB का यह सरकारी आंकड़ा असल समस्या का एक छोटा सा हिस्सा भर है। शक्ति वाहिनी, AIDWA या एविडेंस जैसी संस्थाओं ने अपने स्तर पर रिसर्च की है। इसके अनुसार, भारत में हर साल अंतरजातीय या अंतरधार्मिक शादियों की वजह से सैकड़ों युवा हिंसक हमलों और हत्याओं का शिकार होते हैं। इनमें से बहुत कम मामलों को कोर्ट या कागजातों में ऑनर किलिंग की जगह मिलती है।

राजनीति और मताधिकार: जाति-प्रथा की मान्यता

डेमोक्रेसी की मूल बात सोशल इक्वालिटी थी। लेकिन भारतीय पॉलिटिक्स ने जाति-प्रथा को खत्म नहीं किया। इसके बजाय इसे बनाए रखने के मुख्य टूल के रूप में इस्तेमाल किया है। हर पॉलिटिकल पार्टी उम्मीदवार चुनने से लेकर चुनावी प्रचार तक, सब कुछ में जाति की आबादी को सबसे अहम मानकर चलती है। डेमोक्रेटिक सिस्टम में पावर में बने रहने के लिए जातिगत पहचान को मजबूत किया जा रहा है। इसे खत्म नहीं होने दिया जा रहा। इसके नतीजे के तौर पर कास्ट बेस्ड आइडेंटिटी की राजनीति दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

जगह, सामाजिक जुड़ाव और सेहत पर असर

आधुनिक शहरों की रिहाइश और इंटरनेट के दौर में भी भेदभाव अपनी रफ्तार से बना हुआ है। दिल्ली, मुंबई या कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी दलित या पिछड़े वर्ग के लोगों को मकान किराए पर मिलने या फ्लैट खरीदने में अंदरूनी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अपनी जाति के नाम से पेज, ग्रुप और 'कास्ट प्राइड' दिखाने का ट्रेंड युवाओं के एक हिस्से में फिर से बढ़ रहा है।

डब्ल्यूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कमिशन ऑन सोशल डिटरमिनेंट्स ऑफ हेल्थ रिपोर्ट जारी की थी। इसमें साफ कहा गया है कि सोशल डिस्क्रिमिनेशन, जाति-आधारित बहिष्कार और असमानता का बुरा असर होता है। यह इंसान की फिजिकल और मेंटल हेल्थ को नुकसान पहुंचाता है। डब्ल्यूएचओ की रिसर्च से एक और बात पता चलती है। जाति और सामाजिक भेदभाव के शिकार लोगों में लगातार तनाव, डिप्रेशन और असमय मौत का रिस्क आम लोगों के मुकाबले काफी ज्यादा होता है। भारत में हेल्थ सर्विसेज में बराबरी का हक न मिलने और मेंटल ट्रामा के पीछे भी यह सामाजिक भेदभाव एक बड़ी वजह है।

ज़मीनी हकीकत: भारतीयों का दोहरा रवैया

भारतीय समाज मुंह से तो बराबरी की बात करता है, लेकिन असल में जाति-प्रथा को खत्म क्यों नहीं कर पा रहा है?

भारतीय समाज की सबसे बड़ी प्रॉब्लम इसका दोहरा चेहरा यानी पब्लिक बनाम प्राइवेट लाइफ है। एक आधुनिक भारतीय नागरिक दफ्तर में या बाहर खुद को प्रोग्रेसिव और जाति-प्रथा के खिलाफ बताता है। लेकिन घर के अंदर या शादी-ब्याह के डिसीजन्स लेते समय वह बहुत कट्टर सामाजिक रूप अपना लेता है। इसके अलावा, भारतीय एजुकेशन सिस्टम लोगों को काम-काज में तो काबिल बना रहा है, लेकिन यह सदियों पुराने रीति-रिवाजों और अंधविश्वासों को तोड़कर माइंडसेट बदलने में नाकाम साबित हो रहा है। साथ ही, ऊंची जातियां या ताकतवर वर्ग अपना पुराना दबदबा और इकोनॉमिक पकड़ बनाए रखना चाहते हैं। इसीलिए वे अंदर ही अंदर जाति-प्रथा को जिंदा रखते हैं। आज भारतीय समाज में इस व्यवस्था के कई नए चेहरे सामने आ चुके हैं।

आज के दौर की बदली हुई जाति-प्रथा

जाति-प्रथा की मूल सोच आज सिर्फ पुराने धर्मग्रंथों के चार वर्णों तक सीमित नहीं रह गई है। वह अब जन्म, जगह, स्थिति या पहचान में फैल चुकी है। कथित आधुनिक भारतीय समाज खुद को दूसरों से बड़ा या बेहतर समझने के खेल में लगा हुआ है। आज के आधुनिक शहरों की इमारतों और इंटरनेट के दौर में पारंपरिक जाति-भेद भले ही थोड़ा कम हुआ हो, लेकिन भेदभाव ने अपना नया और आधुनिक रूप ढूंढ लिया है।

1.इकोनॉमिक और क्लास बेस्ड भेदभाव: अमीर तबके की सोशल पावर और दूसरी तरफ गरीबों या डोमेस्टिक हेल्पर्स के लिए अलग लिफ्ट या लिफ्ट में न चढ़ने देना, अलग बर्तन या अलग रास्ता तय करना पुरानी छुआछूत व्यवस्था का ही एक चमकदार कॉर्पोरेट रूप नहीं है? 

2. गांव बनाम शहर: गांव और शहर के बीच कल्चरल और रहने-सहने का फर्क बनाए रखना। शहर के लोगों को समझदार और आधुनिक और गांव के लोगों को देहाती, पिछड़ा या कम अक्लमंद समझना पुराने गांव बनाम बाहरी इलाकों के भेदभाव का ही नया रूप है। 

3. राज्य और भाषा के नाम पर भेदभाव: राज्य और भाषा की वजह से दूसरे राज्य या भाषा के लोगों का मजाक उड़ाना और उन्हें नीचा दिखाने की आदत। 

4. पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ बर्ताव: पूर्वोत्तर भारत के लोगों के चेहरे, कपड़े या फूड हैबिट्स पर फब्तियां कसना और उन्हें देश के बाकी हिस्सों से अलग समझना आधुनिक भारतीय समाज का एक बहुत बुरा भेदभाव है। 

5. भाषाई एलिट कल्चर: खुद को भाषा के मामले में बड़ा मानकर साफ अंग्रेजी या हिंदी बोलने वालों को अपने आप ऊंची जाति या बड़े खानदान का और दूसरी मातृभाषा बोलने वालों को बैकवर्ड समझना। यह अतीत में संस्कृत बनाम प्राकृत भाषा के फर्क की याद दिलाता है। 

6. पॉश सोसायटियां बनाम झुग्गी-झोपड़ियां: बड़ी-बड़ी सोसायटियों और स्लम की असली पिक्चर। जहां देखा जाता है कि शहरों की ऊंची-ऊंची आधुनिक सोसायटियों के बगल में बसी बस्तियों के लोगों को बिना वजह गंदा या क्रिमिनल मान लिया जाता है। 

7. खाने-पीने का भेदभाव: खाने-पीने के भेदभाव को लेकर भी भारतीय समाज में संकीर्णता भरी है। कौन शाकाहारी है और कौन मांसाहारी, इसके आधार पर इंसान के कैरेक्टर का फैसला करना, फ्लैट किराए पर न देना या समाज से बेदखल करना। 

8. कचरा बीनने वालों के साथ बर्ताव: कचरा छांटने और प्लास्टिक बीनने वाले न हों तो हर शहर कचरे के पहाड़ में डूब जाएगा। लेकिन इन्हें देखते ही समाज अक्सर शक की निगाह से चोर या गंदा समझकर दूर भागता है या भगा देता है। 

9. अस्पताल के सफाई कर्मचारियों की अनदेखी: एक ही अस्पताल में मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को सबसे ज्यादा रिस्पेक्ट मिलती है, लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर खतरनाक कचरा साफ करने वाले सफाई कर्मचारियों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है। 

10. निर्माण मजदूरों के साथ भेदभाव: दिहाड़ी मजदूरों की बनाई ऊंची इमारतों में अमीर और मिडिल क्लास आराम से रहते हैं, लेकिन इमारत बनते ही सिक्योरिटी और सुंदरता का बहाना बनाकर मजदूरों को उस इलाके से निकाल दिया जाता है। 

11. अंतिम संस्कार करने वालों का सामाजिक बहिष्कार: अपने किसी करीबी के गुजर जाने पर जिन लोगों की मदद के बिना काम नहीं चलता, अंतिम संस्कार खत्म होते ही उनके हाथ का छुआ पानी तक कई लोग नहीं पीते। इंसान को आखिरी विदाई देने वाले ये लोग पूरी जिंदगी समाज से कटकर रहते हैं। 

12. चमड़ा उद्योग के मजदूरों को अछूत समझना: जिस समाज के लोग लाखों रुपये की लेदर जैकेट या ब्रांडेड जूते पहनने पर गर्व करते हैं, वही लोग चमड़े की सड़न की बदबू सहकर कच्चा माल तैयार करने वाले मजदूर को नीची जात का समझकर दूर धकेल देते हैं। 

13. सफाईकर्मियों को वाजिब सम्मान न मिलना: हम जो गंदगी पूरे शहर में फैलाते हैं, कुछ लोग उसे साफ करके समाज को साफ-सुथरा और सेहतमंद रखते हैं। लेकिन जो गंदगी फैलाता है वह अगर साफ-सुथरा कहलाता है, तो जो गंदगी साफ करता है वह क्यों समाज की नजरों में नीचा माना जाता है?

हमे इस अमानवीय बर्ताव को खत्म करने के लिए ठोस और व्यावहारिक रास्ते तलाशने होंगे।

समाधान की राह: समाजशास्त्रियों का संदेश और आधुनिक उपाय

जाति-प्रथा के पुराने और नए रूप को सिर्फ कानून के डर या इकोनॉमिक ग्रोथ से खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए बेसिक माइंडसेट को बदलने की जरूरत है।

डॉ. आंबेडकर ने एक बात बहुत साफ कही थी। सिर्फ जात-पात की बाहरी छुआछूत बंद करने से जाति-प्रथा खत्म नहीं होगी। इसका एकमात्र लॉजिकल सोल्यूशन बड़े पैमाने पर इंटर-कास्ट मैरिज करना है। इसके साथ ही धार्मिक ग्रंथों पर टिकी इस सामाजिक व्यवस्था की तर्कसंगत आलोचना करना भी जरूरी है।

ज्योतिराव फुले और पेरियार का सोशल मूवमेंट समाज को तर्क और इंसानियत के आधार पर फिर से खड़ा करने की बात करता है। पढ़ाई का मकसद सिर्फ नौकरी पाना नहीं है। एजुकेशन का असली मकसद पुरानी सामाजिक सोच और अंधविश्वासों पर सवाल उठाना होना चाहिए।

फैमिली और सोच में सुधार सबसे पहले जरूरी है। सरकार कानून बना सकती है, लेकिन परिवार के भीतर जो जाति-प्रथा का चलन है, उसे खत्म करने के लिए सोशल अवेयरनेस की चर्चा शुरू करनी होगी।

स्कूल के लेवल पर सोशल एजुकेशन को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है। प्राइमरी स्कूल से ही बच्चों को इंसानियत और ह्यूमन राइट्स की सीख देना अनिवार्य करना होगा। यही इंसान की पहली पहचान है। लेकिन भारतीय एजुकेशन सिस्टम में यह अभी तक पूरी तरह शामिल नहीं हो पाया है।

बराबरी और विविधता बनाए रखने के लिए सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ कॉर्पोरेट और प्राइवेट कंपनियों में भी पिछड़े वर्गों के लिए डाइवर्सिटी पॉलिसी को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

अंत में कहें तो जाति-प्रथा अभी खत्म नहीं हुई है। इसने बस समय के साथ अपना रूप बदलकर नए कपड़े पहन लिए हैं। जब तक हम एक-दूसरे को काबिलियत के बजाय जाति या सरनेम से आंकेंगे, तब तक आधुनिक भारत का सपना अधूरा ही रहेगा। इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करना ही आज हमारा सबसे बड़ा चैलेंज है।