Why India Failed. But China Succeeded.
आईआईटी की वजह से हजारों लोगों की जिंदगियां बती और अगर मैं आपको बोलूं कि इन आईआईटी की वजह से ही हमने हमारे स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर को इग्नोर कर दिया तो यह चीज हुई थी एक गलती की वजह से जो हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने करी और यही गलती हम आज भी दोहरा रहे हैं यह जो स्क्रीन पर आप टेक्स्ट पढ़ रहे हो यह सेकंड क्लास की टेक्स्ट बुक से है सेकंड क्लास के स्टूडेंट तो छोड़ो बस 42 पर फिफ्थ क्लास के स्टूडेंट्स ये टेक्स पढ़ता है मैं वापस बोल रहा हूं बस 42 फिफ्थ क्लास के स्टूडेंट्स एक सेकंड क्लास की टेक्स्ट बुक का टेक्स्ट पढ़ पाए और अगर मैथ्स की बात करें तो हाल तो और बेहाल है यह डिवीजन प्रॉब्लम देखो बस 25 पर क्लास फिथ के बच्चे यह प्रॉब्लम सॉल्व कर पाए बस इस वजह से क्योंकि हमारा देश आईटी की तरफ भागता रहा जबकि चाइना ने एक बहुत डिफरेंट अप्रोच यूज करी व भी बहुत गरीब थे और बहुत इलिटरेट थे पर आज अपनी अप्रोच की वजह से उनको फायदे मिल रहे हैं तो हमारे देश ने क्या गलतियां करी जिसका हम आज भी भुगतान कर रहे हैं और चाइना इतनी तरक्की कैसे कर पाया इसको समझने के लिए मैंने यह रिसर्च पेपर पढ़ा जो इसी साल पब्लिश हुआ है लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा अब कहानी स्टार्ट करते हैं इंडिया और चाइना की डिफरेंट सिचुएशन के लिए जिम्मेदार है कि हमने एक टॉप डाउन सिस्टम यूज किया ज हमारा फोकस रहा हायर एजुकेशन पर अंग्रेजों से पहले एजुकेशन हमारे देश में गुरुकूल या फिर रिलीजस स्कूल्स के द्वारा दी जाती थी जहां फोकस होता था स्क्रिप्चर फिलोसोफी और रीजनल लैंग्वेज पर गुरुकुल मानो एक तरीके की हॉस्टल एजुकेशन होती थी जहां बच्चे घर छोड़कर अपने गुरु के साथ बैठते थे वेद का ज्ञान हासिल करने के लिए इस विद्या में बोला जाता था कि ज्ञान बस बाहरी दुनिया में ही नहीं बल्कि आपके भीतर भी है पर ये एजुकेशन सिस्टम सबके लिए नहीं था समाज के कास्ट डिविजंस का एक भारी असर पड़ा इस एजुकेशन सिस्टम पर बस ब्राह्मण ही टीचर्स बन सकते थे और स्टूडेंट्स के बीच भी डिस्क्रिमिनेशन था फिर अंग्रेज हमारे देश को चलाने लग गए वी हैपन टू बी द बेस्ट पीपल इन द वर्ल्ड विद द हास्ट स्टैंडर्ड ऑफ डीसेंसी एंड जस्टिस लिबर्टी एंड पीस एंड द मोर ऑफ द वर्ल्ड वी इट द बेटर इट इज फॉर हूटी और मनू पिला ने अपनी किताब में बताया कि अंग्रेजों का भी कोई मूड नहीं था हमारे एजुकेशन सिस्टम में इस भेदभाव को बदलने का गवर्नर एल्फिन स्टोन ने यह आर्गू किया कि इंग्लिश एजुकेशन तो हमें लोअर कास्ट लोगों को देनी नहीं चाहिए यह सिस्टम एक स्ट्रक्चर्ड और फॉम सिस्टम होगा जहां आपको मैथ्स साइंस इंग्लिश और हिस्ट्री जैसे सब्जेक्ट सिखाए जाएंगे पर अंग्रेजों का फोकस हमारे देश में लोगों को एजुकेटेड करना नहीं था बल्कि वो चाहते थे कि हमारे देश से उनको एक छोटी क्लास मिल जाए लो रैंकिंग स्टाफ जैसे क्लर्क्स और असिस्टेंट की जो उनको देश चलाने में मदद कर सके देश चलाने के लिए उनको पुलिस ऑफिसर सिविल सर्वेंट्स जजेस और सोल्जर्स की जरूरत थी उनको ऐसे इंडियंस चाहिए थे जो मानो एक नारियल की तरह थे बाहर से से इंडियन पर अंदर से अंग्रेज इसलिए अंग्रेजों का ज्यादातर फोकस सेकेंडरी एजुकेशन पर था प्राइमरी एजुकेशन पर नहीं क्योंकि पूरे देश को पढ़ाना लिखा उनकी जिम्मेदारी थी नहीं उनको तो बस ऑफिसर्स तैयार करने थे तो अंग्रेज चाहते थे कि हमारे देश से बस सिविल सर्वेंट्स बने जबकि क्रिश्चियन मिशनरीज जो कई स्कूल्स को चला रहे थे उनके दूसरे ऑब्जेक्टिव्स थे मनु पलाई लिखते हैं कि मिशनरीज का ऑब्जेक्टिव था कि स्कूल्स के जरिए वो बच्चों को क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट कर पाए एक अंग्रेज ने लिखा का कि एक दिन ये एजुकेशन इतना बड़ा एक्सप्लोजन करेगी मानो इस देश से हिंदुइज्म ही नष्ट हो जाएगा लिखा जाता है कि इन लोकल्स को वेस्टर्न साइंस देकर हम उनका कॉन्फिडेंस ही हटा देंगे अपने धर्म से स्कूल्स में बाइबल तक पढ़ाई जाती और यह बोला जाता कि किसी हिंदू को पता भी नहीं चलेगा कि हम कर क्या रहे हैं उनके साथ 1910 से 1940 के बीच एजुकेशन का % एक्सपेंडिचर सेकेंडरी लेवल पर था 50 पर एक्सपेंडिचर सेकेंडरी लेवल पर था जब बस 15 पर देश लिटरेट था बस 15 पर उन्होंने कोई रिफॉर्म भी क्रिएट नहीं किया है जिससे प्राइमरी एजुकेशन कंपल्सरी हो सके इसलिए हमारी देश की लिटरेसी रेट ज्यादा बढ़ी नहीं फिर देश आजाद हुआ एंड नाउ द टाइम कम्स वन वी शल रिडीम आवर प्लेज एट द स्ट्रो ऑफ द मिडनाइट आवर व्हेन द वर्ल्ड स्लीप्स इंडिया विल अवेक लाइफ एंड फ्रीडम इंडियन सरकार ने भी प्राइमरी एजुकेशन को प्रायोरिटी नहीं दी हमारा देश वर्ल्ड क्लास कॉलेजेस बनाने लगा जैसे आजादी के 3 साल बाद ही देश का टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज आईटी खड़कपुर बना क्योंकि 19 के दौरान साइंस और टेक्नोलॉजी दुनिया भर में बहुत आगे बढ़ रही थी इसलिए इंडियन सरकार का मानना था इन एडवांसेज की एडवांटेज लेने के लिए हमें एक वर्ल्ड क्लास हायर एजुकेशन सिस्टम बनाना होगा वर्ल्ड वॉर ट के बाद इंडिया को को पता चला कि हमें टेक्निकल वर्कर्स की जरूरत है क्योंकि इस वॉर के दौरान चाहे मशीनरी हो टूल्स हो टेक्निकल एक्सपर्टीज हो वो भारत में आती ब्रिटेन या फिर दूसरे देशों से जिसके बाद हमारे पॉलिटिशियन को रिलाइज हुआ कि हम दूसरे देशों पर निर्भर नहीं कर सकते और इसीलिए 1944 में आर्द शर दलाल जो एक एक्स सिविल सर्वेंट है उनकी लीडरशिप में एक डिपार्टमेंट ऑफ प्लानिंग एंड डेवलपमेंट बनाया गया जहां उन्होंने कहा कि हमें साइंस और टेक्नोलॉजी पर फोकस करना होगा अगर हमें देश की प्रॉब्लम्स को सॉल्व करना तो और इस चीज के लिए हमें लोगों को टेक्निकल स्किल्स देने होंगे इसीलिए उन्होंने दो कदम उठाए पहला उन्होंने बनाया डिपार्टमेंट ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च और दूसरा उन्होंने एक सरकार कमेटी बनाई जिससे हमारे देश में टेक्निकल एजुकेशन बढ़े इस सरकार कमेटी ने कहा कि हमें चार एडवांस टेक्निकल कॉलेजेस बनाने चाहिए हमारे देश में यूएस के एमआईटी की तरह प्रधानमंत्री नेहरू ने ये रिकमेंडेशंस एक्सेप्ट करी और हमारे देश ने वर्ल्ड क्लास कॉलेजेस बनाना स्टार्ट किया जैसे आईआईटी खड़कपुर ये एक कॉलेज बनाया गया उसी जमीन पर जहां एक जमाने में एक अंग्रेजी जेल होता था पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में इस कॉलेज की पहली कन्वोकेशन एड्रेस के दौरान बोला कि यह जगह बनी है एक डिटेंशन कैंप पर और ये हमारे देश का एक मनुम है जो हमारे भविष्य को बनाएगा वो बोलते हैं आप लोग इंजीनियर्स हो और इस दुनिया में हमें इंजीनियर्स की जरूरत है प्रधानमंत्री नेहरू मानते थे कि आईआईटी ही देश को आगे लेकर जाएंगे इसीलिए उसी साल उन्होंने आईआईटी खड़कपुर एक्ट ऑफ 1956 पास करी जिसने आईआईटी को एन इंस्टिट्यूट ऑफ नेशनल इंपॉर्टेंस बनाया देश के कई प्राइम मिनिस्टर्स प्रेसिडेंट मिनिस्टर्स और फॉरेन डिप्लोमेट्स आईआईटी की कन्वोकेशन सेरेमनीज में जाते उस देश में जहां लाखों करोड़ों बच्चों को बेसिक एजुकेशन ही सिखाई जा रही आईआईटी इस देश के हीरे बन गए इनफैक्ट 1960 तक इंडिया की लिटरेसी रेट बस 28 पर ही थी जबकि इन 10 सालों के दौरान इंडिया ने पांच आईटी और एक आईएम बना दिया जबकि चाइना की अप्रोच बिल्कुल अपोजिट थी इंडिया की टॉप डाउन अप्रोच थी चाइना की बॉटम अप यानी कि उन्होंने फोकस किया प्राइमरी एजुकेशन पर अपने इतिहास में चाइना ने फोकस किया था इंपीरियल सिविल एग्जाम पर इंडिया की तरह चाइना का भी ऑब्जेक्टिव यही था कि इस एग्जाम से वो सिविल सर्वेंट्स तैयार करें पर लेट 1890 के बाद चाइना ना पर दूसरे देशों का इन्फ्लुएंस बढ़ने लगा पहली साइनो जापनीज वॉर के बाद चाइना को एक बहुत बुरी हार झेलनी पड़ी जापान के खिलाफ इसने चाइना को बताया कि वह जापान और दूसरे देशों से मिलिट्री और इक्विपमेंट के मामले में बहुत कमजोर है इस हार ने चाइना की चिंग डायनेस्टी को हिला दिया और उनको ये रिलाइज हुआ कि जब तक चाइना अपने इंस्टीट्यूशंस को मॉडर्नाइज नहीं करेगा उनको ऐसी हार झेलनी ही पड़ेगी जिसकी वजह से 1905 में चिंग डायनेस्टी ने इंपीरियल सिविल सर्विस एग्जाम्स को कै किया और स्पेशलाइज स्कूल्स तैयार करें मॉडर्न एजुकेशन के बेसिस पर उन्होंने देखा कि जापान में तो बच्चों के लिए कंपलसरी एजुकेशन है पर चाइना में नहीं है इसलिए अगले साल ही उन्होंने कंपलसरी एजुकेशन लॉ पास किया जिसने कहा कि 7 साल की उम्र के बच्चों को स्कूल जाना ही होगा 1928 में चाइनीज सरकार ने डिसाइड किया कि वह प्राइमरी एजुकेशन को और बढ़ावा देंगे तीन फेजेस में पहली फेज में उन्होंने 80 पर बच्चों के लिए कंपलसरी एजुकेशन करी एक साल के लिए दूसरी फ्रेज में यह कंपलसरी एजुकेशन 2 साल की हो गई और आखिरी फेज में 4 साल की तो जहां इंडिया का बजट सेकेंडरी और टर्श लेवल्स की तरफ जाने लगा चाइना का फोकस कई सालों से प्राइमरी लेवल पर था और धीरे-धीरे सेकेंडरी और टर्श लेवल पर बढ़ा तो दोनों इंडिया और चाइना ने डिफरेंट अप्रोचेबल पॉपुलेशन अनपढ़ थी पर 1980 में आते-आते जहा इंडिया की 60 पर एडल्ट पॉपुलेशन इलिटरेट थी यह नंबर चाइना के लिए बस 22 पर था क्योंकि चाइना ने करोड़ों लोगों को बेसिक लिटरेसी और न्यूमेरिकल स्किल सिखा दिए इस वजह से यह लोग अपने खेत छोड़कर इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में काम कर सकते थे सस्ते लेबर की वजह से चाइना पूरे दुनिया की फैक्ट्री बन गई वो परिवार जो एक टाइम किसान हो थे कुछ टाइम बाद फैक्ट्री में लेबरर्स बन गए इनमें से कुछ लेबरर्स फिर फैक्ट्री के मैनेजर्स बने और कुछ मैनेजर्स फैक्ट्री के ओनर्स जैसे जू चुन फे जो आज चाइना की सबसे बड़ी बिलियनर्स में से एक है एक जमाने में जू शनजन की एक छोटी सी फैक्ट्री में काम करती थी 1993 में बस 22 साल की उम्र में उन्होंने अपनी ₹ लाख की सेविंग्स यूज करी एक नई कंपनी लॉन्च करने के लिए लेंस टेक्नोलॉजी जो हाई क्वालिटी ग्लास को मैन्युफैक्चर करती थी उनकी और उनकी कंपनी की किस्मत बदली 2001 में जब टीसीएल कॉरपोरेशन ने उनको एक मोटा कांट्रैक्ट दिया आज यह कंपनी इतनी बड़ी बन गई है कि वह हजारों लोगों को एंप्लॉय करती है जिनके परिवार एक जमाने में खेती करते थे और यही कहानी है चाइना की जहां एजुकेशन ने किसानों को लेबरर बनाया कुछ लेबरर्स को मैनेजर और कुछ मैनेजर्स को ओनर पर अनफॉर्चूनेटली हमारी एजुकेशन की से यह इंडिया में नहीं हुआ 1987 में दोनों इंडिया और चाइना में 62 पर लोग खेती करते थे अगले 30 सालों के दौरान ये नंबर चाइना के लिए बस 15 पर हो गया पर इंडिया के लिए 40 पर अब क्योंकि इंडिया में कंपल्सरी एजुकेशन लॉ ही नहीं था इसलिए करोड़ों लोगों के पास बेसिक स्किल्स नहीं थे और क्योंकि उनके पास वो स्किल्स नहीं थे वो खेती छोड़ ही नहीं पाए सिचुएशन सबसे खराब है किसानों के बच्चों की ना उनके पास स्किल्स है खेती छोड़ने के लिए और ना खेती में पैसे हैं इसीलिए वो उधर अटक गए जैसे हसीब अहमद की बात करते हैं उत्तर प्रदेश के रामपुर इलाके से उन्होंने 2020 के फार्म लॉस के खिलाफ प्रदर्शन किया था वो कहते हैं कि उनके दो बच्चे हैं एक 12थ में और एक नाइंथ में और दोनों खेती से कुछ करना ही नहीं चाहते बच्चों अपनी जिंदगी में कुछ और हासिल करना चाहते हैं उन्होंने देखा कि मैंने अपनी पीठ कितनी तोड़ी है पर उस चीज के लिए मुझे कुछ मिला नहीं इंडिया में एक छोटे से किसान के पास बस करीब 1 हेक्टेयर जमीन है और उनकी एवरेज इनकम करीब 00 यानी कि वो साल के कमाते हैं 0000 पर 70000 से ज्यादा रुपए का तो उन पर कर्ज है कहां से रोटी सब्जी खाएंगे इसलिए सीता आर्या उत्तर प्रदेश के अमरोहा डिस्ट्रिक्ट से कहती हैं कि वो चाहती है कि उनके बच्चे किसान बनने की बजाय कोई बीड़ी या पान की दुकान ही खोल ले वो कहती हैं कि मेरा परिवार कर्ज से डूब रहा है मैं कैसे अपने बच्चों को कहूं कि तुम इसी खेतीबाड़ी में लगे रहो जबकि मैं आपको उदाहरण देता हूं कि चाइना में कितनी अलग सिचुएशन है जन फू मेंे चाइना की फुजिया प्रोविंस में सुताई गांव से हैं और उनका पूरा परिवार किसानों का है छोटी सी उम्र में वह भी परिवार के खेत में ही काम करते थे 12 लोग एक ही घर में रहते थे अब क्योंकि चाइना में एक कंपलसरी लॉ था एजुकेशन का इसलिए उनको स्कूल जाना ही पड़ा स्कूल गए और फिर 2002 में उन्होंने अपनी ग्रेजुएट सर्जरीज कंप्लीट करी और बेजिंग में उनको एक रिसर्च इंस्टिट्यूट में एक जॉब मिली उनकी बहन भी एक कॉलेज अटेंड कर पाई जहां सरकार ने कोई फीस भी नहीं आज सभी लोगों की एक अच्छी ऑफिस जॉब है अब हमारे देश में हजारों आईटी ग्रेजुएट्स की तो जिंदगी बन गई है पर उन लाखों लोगों का क्या जो किसान के बेटे बेटी हैं और हमने आईटी जैसे हीरे तो बना दिए पर हमें यह भी रिलाइज करना चाहिए कि आईटी के ग्रेजुएट्स के लिए ज्यादा अपॉर्चुनिटी इंडिया के बाहर है व्हाट ड वी इंपोर्ट फ्रॉम इंडिया वी इंपोर्ट रियली स्मार्ट पीपल सीम टू शेयर अ कमन क्रूडें देर ग्रेजुएट्स ऑफ द इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बेटर नोन ए आईईटी हो google3 के टॉप रैंकर्स के बारे में जिसने यह दिखाया कि जितनी ज्यादा आपकी रैंक है उतनी ज्यादा प्रोबेबिलिटी है कि आप देश छोड़ के दूसरी नौकरी लोगे इनफैक्ट टॉप 1000 रैंकर्स में देश छोड़ने की प्रोबेबिलिटी 38 है टॉप 100 में 62 और टॉप 10 में 90 अब ऑफकोर्स हर आईटी न देश छोड़कर नहीं जा रहा पर टॉप 1000 में से 38 पर बहुत अच्छा खासा नंबर है तो हमने मानो एक स्क्विड गेम जैसा सिस्टम क्रिएट कर लिया जहां अगर आपने जेई सिस्टम की रेड लाइट ग्रीन लाइट गेम पार कर ली तो आपकी जिंदगी बन गई पर अगर नहीं करी तो क्या अब ऑफकोर्स कुछ लोग अपना बिजनेस सेटअप करेंगे मार्केटिंग में अच्छा करेंगे कंटेंट क्रिएटर बन जाएंगे पर उन लाखों करोड़ों लोगों का क्या जिनके पास ये अपॉर्चुनिटी नहीं है जो एक किसान के परिवार में पैदा हुए हैं जिनके पिताजी ऑटो चलाते हैं और उनको एक सरकारी स्कूल में भी ढंग की नॉलेज नहीं मिल रही पर एक सवाल जो हमें पूछना चाहिए व है कि देश की आजादी के 70 साल बाद भी हम हमारे एजुकेशन सिस्टम में इतना बदलाव क्यों नहीं कर पाए हैं जीडीपी का 4 पर हमारा देश एजुकेशन पर खर्च करता है जो एक बुरा नंबर नहीं है प्रॉब्लम यह नहीं है कि हम पैसा खर्च नहीं कर रहे प्रॉब्लम यह है कि हम पैसे को ढंग से खर्च नहीं कर रहे क्योंकि ये एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी ही नहीं है राजस्थान के धौलपुर गांव में एक सरकारी स्कूल टीचर ने कहा कि जब सरकारी ऑफिशल्स हमारे स्कूल आते हैं वो चेक करते हैं कि दूध की क्वालिटी क्या है जो हम मिडडे मील में सर्व कर रहे हैं ना कि कि हम मैथ या फिर हिंदी ढंग से सिखा रहे हैं या फिर नहीं क्योंकि पॉलिटिशियन को भी पता है कि जो दिखता है वही बिकता है तो मिडडे मील से वोटर्स को पता है कि उनके बच्चे को मिल क्या रहा है पर कितने वोटर्स टेंशन में है कि उनके बच्चों को प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया क्या जा रहा है इसी वजह से कई पॉलिटिकल पार्टीज इलेक्शन से पहले ही बच्चों को लैपटॉप और दूसरी चीजें देती हैं पर इन स्कीम से एजुकेशन की स्थिति नहीं बदली इतनी जैसे इस वीडियो को देखो यूपी के अन्नाव में एक सरप्राइज इंस्पेक्शन के दौरान यह पता चला कि क्लास एथ की टीचर जो सब्जेक्ट इंग्लिश पढ़ा रही है वह खुद ही नहीं पढ़ सकती इ टीचर शी कां रीड शी कांट ड इंग्लिश सो व्ट आपसे इसका मैं अनुवाद करने को नहीं कह रहा हूं आप पढ़ने को कह रहा हूं तो पढ़ स है ना अब यह भी गलत होगा कि हम सारा दोष पंडित नेहरू को ही दे रहे हैं 75 साल हो गए हैं देश की आजादी को अभी भी ये प्रॉब्लम फिक्स नहीं हुई है जैसे मैंने अपने रिसेंट आईएएस वीडियो में बताया था कि टीचर्स पर इतना पेपर वर्क थोप दिया गया है कि बच्चों को कंप्यूटर लैब यूज करने की बजाय उनको टेंशन रहती है कि कंप्यूटर चोरी ना हो जाए 25 पर रूरल इंडिया के स्कूल्स के पास तो पीने का पानी और टॉयलेट की फैसिलिटी नहीं है जैसे यह देख लो उत्तर प्रदेश के भागपत डिस्ट्रिक्ट के स्कूल का हाल इधर से देखो यहां तक ठीक है ये वाला को इसी वजह से बच्चे पब्लिक स्कूल नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूल जाते हैं 2010 और 2016 के बीच इंडिया में पब्लिक स्कूल्स में एनरोलमेंट 1.3 करोड़ से कम हो गई और प्राइवेट में 1.7 करोड़ से बढ़ गई इसका मतलब है कि पब्लिक स्कूल तो बिल्कुल खाली हो गए क्योंकि स्कूल्स खाली हो गए कई सरकारी स्कूल्स को मर्ज करना पड़ा यानी कि एक क्लासरूम में 40 स्टूडेंट्स तो हैं पर कई स्टूडेंट्स फर्स्ट क्लास से हैं सेकंड और कई थर्ड तो टीचर सेम टाइम तीनों क्लास के स्टूडेंट्स को पढ़ा रही है अब क्या ही पढ़ पाएंगे आज भी हम वही गलती कर रहे हैं जो हमने 75 साल पहले करी थी हमने प्राइमरी एजुकेशन को अपना फोकस बनाया ही नहीं जबकि चाइना ने 10 साल पहले ही एक मिशन मोड स्टार्ट किया मार्च 2008 में चाइना की एक पॉलिटिकल बॉडी ने एक नेशनल स्ट्रेटजी बनाई जहां देश की एजुकेशन डेवलपमेंट उनकी प्रायोरिटी बनेगी इसीलिए उन्होंने मीडियम और लॉन्ग टर्म एजुकेशन प्लांस बनाए जिनको बुलाया गया द प्लान 2000 लोगों को इंक्लूड किया गया इन प्लांस बनाने के लिए जहां 500 एक्सपर्ट शामिल थे प्लान का ड्राफ्ट बनाने के बाद पब्लिक से कंसल्टेशन करी गई कंसल्टेशन में 14000 लेटर्स उनको मिले जिनमें 21 लाख प्रपोजल्स थे मई और जून 2010 को प्रेसिडेंट हु जिंताओ ने खुद दो मीटिंग्स चेयर करी इस प्लान के बारे में प् ने फोकस किया रूरल एजुकेशन पर टीचर स्टूडेंट रेशो पर और टीचर्स की सैलरीज पर इन पॉलिसीज की वजह से ही रूरल चाइना में एजुकेशन मानो पूरी तरह बदल ही गई है जैसे ये है हेड प्रिंसिपल चाइना के डिशी एरिया में और वो कहते हैं कि सरकार ने टेक्नोलॉजी इक्विपमेंट में काफी पैसा खर्च किया है जिसकी वजह से गांव के बच्चों में भी अब उतना ही कॉन्फिडेंस देखने को मिलता है जो चाइना के शहरी बच्चों में देखने को मिलता है अब हालांकि कई टीचर्स चाइना में भी गांव में नहीं पढ़ाना चाहते पर टेक्नोलॉजी की वजह से वह टीचर्स जो शहरों में बेस्ड है वह भी गांव के बच्चों को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पढ़ा पाते हैं इसीलिए चाइना की तरह ही इंडिया को भी इसको एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी बनाना होगा पर चाइना ने पूरी उल्टी पॉलिसी अपनाई जिसकी वजह से आज उनको कई फायदे मिल रहे हैं हरियाणा जैसी स्टेट्स ने यह करने की जरूर कोशिश करी है एक सक्षम घोषणा प्रोग्राम के जरिए वह स्कूल लेवल पर लर्निंग आउटकम्स बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और इसकी अकाउंटेबिलिटी चीफ मिनिस्टर मनोहर लाल खट्टर ने खुद ली थी हरियाणा के जो मेधावी बचे हैं लगभग 8000 उनको सम्मानित किया जाएगा लेटेस्ट रिपोर्ट्स के हिसाब से 119 में से 94 ब्लॉक्स अब सक्षम डिक्लेयर कर दिए गए हैं इस प्रोग्राम के जरिए इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की लर्निंग बहुत हद तक इंप्रूव हो गई है अपने पहले टर्म में आम आदमी पार्टी हमारे देश में कुछ सरकारों में से एक है जिन्होंने एजुकेशन को एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी बनाया और यही चीज देश के और स्टेट्स को भी करनी होगी क्योंकि अंग्रेज और पंडित नेहरू पर दोष डालना जरूर आसान है मुश्किल है देश के करोड़ों बच्चों का भविष्य बदलना एजुकेशन के जरिए.
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