भारत ने वो कर दिखाया जो 99% देश करने में असफल रहे।
भारत का सबसे बड़ा न्यूक्लियर सपना और 70 साल पुरानी योजना
अप्रैल 6, 2026 रात के 8:25 चेन्नई से 70 कि.मी. दूर एक छोटा सा शहर है अल्पक्काम। इस शहर के कंट्रोल रूम में कई साइंटिस्ट मौजूद हैं। इस कमरे में एक आदमी डॉ. अजीत कुमार मोहंती जो डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के सेक्रेटरी हैं, वो इस प्रोजेक्ट पर कई दशकों से काम कर रहे हैं। सभी की आंखें कुछ इंस्ट्रूमेंट्स पर हैं। सडनली इन इंस्ट्रूमेंट्स पर नंबर्स चेंज हो जाते हैं। इंडिया की वन ऑफ द मोस्ट एंबिशियस मशीनंस मानो अब काम करने लगी है।
इन लैंडमार्क डेवलपमेंट द कंट्रीस मोस्ट एडवांस एटॉमिक रिएक्टर द प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर एट कल्पकम हैज़ अ टेम क्रिटिकल।
क्रिटिकैलिटी का असली मतलब क्या है?
अब आपको यह कोई बड़ी हेडलाइन लगेगी नहीं। इंडिया के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकिटी अचीव कर ली। तो क्या मूवीज में क्रिटिकल का मतलब होता है एक ऐसी चीज जो मानो एक्सप्लोर करने वाली हो। यानी कि बैड न्यूज़। पर न्यूक्लियर इंजीनियरिंग में दिस इज़ एक्चुअली गुड न्यूज़।
इसका मतलब कि रिएक्टर एक मानो परफेक्शन या फिर स्टेबल बैलेंस की स्टेट तक पहुंच गई है जहां चेन रिएक्शन अपने आप को सस्टेन कर रहा है बिना किसी की हेल्प से।
कुछ ही घंटों में फॉर्मर एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन अनिल काकोड़कर Twitter पर एक पोस्ट डालते हैं।
“Today is a historic day. India has entered second stage of a three stage nuclear power program with the achievement of criticality of PFBR.”
इस रिएक्टर को 20 से ज्यादा साल लगे बनने में। यह होना था रेडी 2010 में पर 16 साल और लगे। 3300 करोड़ का जो बजट था वो 8000 करोड़ भी पार कर गया।
दूसरे देशों ने क्यों छोड़ा यह प्रोजेक्ट?
जहां हमारा देश स्ट्रगल कर रहा था इस प्रोजेक्ट को कंप्लीट करने में, दूसरे देशों की हालत और भी खस्ता थी। यूनाइटेड स्टेट्स ने अपना ब्रीडर प्रोग्राम बंद कर दिया। फिर जर्मनी ने किया। फिर जापान और फिर फ्रांस।
बट इंडिया डिडन्ट वॉक अवे। क्योंकि इंडिया के लिए स्टेक्स बहुत ज्यादा थे। यह बस इलेक्ट्रिसिटी के बारे में नहीं था। यह प्रोजेक्ट था एनर्जी इंडिपेंडेंस के लिए।
अगले 200 साल तक क्या हमारे देश को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा हमारी एनर्जी के लिए? इफ दिस प्रोजेक्ट सक्सीड्स, हमें कोई इंपोर्ट्स की जरूरत नहीं होगी। ना रशिया पर डिपेंडेंस होगी ना सऊदी अरेबिया पर।
भारत की सबसे बड़ी समस्या — बिजली
15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ। पर आजादी के साथ तुम्हें बिजली नहीं मिली। ना फैक्ट्रीज, ना रेल्वेज, ना वो शहर जिनके पास साफ पानी था।
हमारे देश में थे 35 करोड़ लोग जिनमें से ज्यादातर बेहद गरीब थे। और जो वन ऑफ द मोस्ट इंपोर्टेंट क्वेश्चंस था नई सरकार के लिए वो था कि हम अपने लोगों को बिजली कैसे देंगे?
इस समय हमारे देश की पूरी जनरेशन कैपेसिटी करीब 1400 मेगावाट की थी। टू पुट दैट इन पर्सपेक्टिव, आज एक अकेले पावर प्लांट की कैपेसिटी 1400 मेगावाट से ज्यादा हो सकती है।
न्यूक्लियर एनर्जी की शुरुआत
6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर एक एटॉमिक बॉम्ब गिरा। तीन दिन बाद जापान के शहर नागासाकी में दूसरा बॉम्ब गिरा। पूरी दुनिया में कहर मच गया।
पर साइंटिफिक कम्युनिटी में एक सवाल खड़ा हुआ कि अगर एटम्स को स्प्लिट करके इतनी ज्यादा एनर्जी निकल सकती है, तो क्या सेम एनर्जी हम इलेक्ट्रिसिटी के लिए यूज नहीं कर सकते?
प्रधानमंत्री नेहरू भी ग्लोबल न्यूक्लियर रेस को बहुत बारीकी से समझ रहे थे। और 6 अप्रैल 1948 को उन्होंने एटॉमिक एनर्जी बिल इंट्रोड्यूस किया।
“We must develop atomic energy for peaceful purpose. We dare not fall behind in the developments in this vital field.”
भारत के पास यूरेनियम कम था
अगर इंडिया को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी बनानी है तो हमें यूरेनियम की जरूरत होगी। लेकिन कुछ सालों बाद रिजल्ट्स आए और वो डिसअपॉइंटिंग थे।
हमें पता चला कि इंडिया के पास इतना यूरेनियम है ही नहीं। दुनिया के कुल यूरेनियम रिजर्व्स का 2% से भी कम इंडिया में था।
लेकिन फिर एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी इनसाइट मिली। केरला और उड़ीसा के कोस्ट पर मौजूद मोनोसाइट सैंड में थोरियम पाया गया। और दुनिया का 25% थोरियम इंडिया में है।
होमी भाभा और थ्री स्टेज प्लान
इस आदमी का नाम था होमी जहांगीर भाभा। उन्होंने समझ लिया था कि अगर भारत को एनर्जी इंडिपेंडेंस चाहिए तो उसे थोरियम बेस्ड न्यूक्लियर प्रोग्राम बनाना होगा।
भाभा का प्लान था एक थ्री स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम।
पहली स्टेज
प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर जिसमें नेचुरल यूरेनियम इस्तेमाल होगा। इससे प्लूटोनियम तैयार होगा।
दूसरी स्टेज
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर जिसमें प्लूटोनियम इस्तेमाल होगा और उससे U233 बनेगा।
तीसरी स्टेज
थोरियम और U233 को मिलाकर लंबे समय तक एनर्जी प्रोड्यूस की जाएगी।
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इतना मुश्किल क्यों है?
फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में लिक्विड सोडियम का इस्तेमाल किया जाता है। ऑन पेपर यह बेस्ट सॉल्यूशन है। लेकिन प्रैक्टिकली यह बेहद खतरनाक है।
अगर लिक्विड सोडियम हवा को छू जाए तो आग लग जाती है। अगर पानी को छू जाए तो एक्सप्लोजन हो सकता है।
जापान के मोंजू रिएक्टर में 1995 में सोडियम लीक हुआ और पूरे देश में एंटी न्यूक्लियर प्रोटेस्ट शुरू हो गए।
भारत ने हार नहीं मानी
इंडिया के पास दूसरा ऑप्शन नहीं था। हमारे यूरेनियम डिपॉजिट्स कम थे। और इसलिए इंडिया जस्ट केप्ट बिल्डिंग।
कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की कंस्ट्रक्शन 2004 में शुरू हुई। बजट था ₹3500 करोड़ और टारगेट था 2010।
लेकिन फिर सुनामी आई, टेक्नोलॉजिकल प्रॉब्लम्स आईं, और दुनिया में कोई ऐसा नहीं था जिससे इंडिया मदद मांग सके।
हर प्रॉब्लम का सॉल्यूशन इंडियन इंजीनियर्स को खुद ढूंढना पड़ा।
2026 — ऐतिहासिक पल
फाइनली 2026 में इंडिया के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकिटी अचीव कर ली।
रशिया के बाद इंडिया दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया जिसने इतना बड़ा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ऑपरेट किया।
यह सिर्फ एक टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि भारत के 70 साल पुराने सपने का एक बड़ा कदम है।
अभी भी लंबा रास्ता बाकी है
क्रिटिकिटी हासिल करना शुरुआत है। अभी थर्ड स्टेज तक पहुंचने में 20 से 30 साल और लग सकते हैं।
आज भारत करीब 8 गीगावाट न्यूक्लियर पावर प्रोड्यूस करता है। 2047 तक लक्ष्य है 100 गीगावाट।
लेकिन इस सफर ने यह जरूर साबित कर दिया कि अगर विजन लंबा हो और धैर्य हो तो भारत दुनिया की सबसे कठिन टेक्नोलॉजी भी बना सकता है।
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