Why India Failed. But China Succeeded.

आईआईटी की वजह से हजारों लोगों की जिंदगियां बनीं और अगर मैं आपको बोलूं कि इन आईआईटी की वजह से ही हमने हमारे स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर को इग्नोर कर दिया तो यह चीज हुई थी एक गलती की वजह से जो हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने करी और यही गलती हम आज भी दोहरा रहे हैं।

यह जो स्क्रीन पर आप टेक्स्ट पढ़ रहे हो यह सेकंड क्लास की टेक्स्ट बुक से है। सेकंड क्लास के स्टूडेंट तो छोड़ो, बस 42% फिफ्थ क्लास के स्टूडेंट्स ये टेक्स्ट पढ़ पाए। और अगर मैथ्स की बात करें तो हाल तो और बेहाल है। यह डिवीजन प्रॉब्लम देखो, बस 25% क्लास फिफ्थ के बच्चे यह प्रॉब्लम सॉल्व कर पाए।

बस इस वजह से, क्योंकि हमारा देश आईआईटी की तरफ भागता रहा, जबकि चाइना ने एक बहुत डिफरेंट अप्रोच यूज करी। वो भी बहुत गरीब थे और बहुत इलिटरेट थे, पर आज अपनी अप्रोच की वजह से उनको फायदे मिल रहे हैं। तो हमारे देश ने क्या गलतियां करी जिसका हम आज भी भुगतान कर रहे हैं और चाइना इतनी तरक्की कैसे कर पाया, इसको समझने के लिए मैंने यह रिसर्च पेपर पढ़ा जो इसी साल पब्लिश हुआ है।

भारत की टॉप-डाउन अप्रोच और इतिहास

अब कहानी स्टार्ट करते हैं इंडिया और चाइना की डिफरेंट सिचुएशन के लिए जिम्मेदार है कि हमने एक टॉप डाउन सिस्टम यूज किया, जहां हमारा फोकस रहा हायर एजुकेशन पर।

अंग्रेजों से पहले की शिक्षा व्यवस्था

अंग्रेजों से पहले एजुकेशन हमारे देश में गुरुकुल या फिर रिलीजस स्कूल्स के द्वारा दी जाती थी, जहां फोकस होता था स्क्रिप्चर, फिलोसोफी और रीजनल लैंग्वेज पर। गुरुकुल मानो एक तरीके की हॉस्टल एजुकेशन होती थी, जहां बच्चे घर छोड़कर अपने गुरु के साथ बैठते थे वेद का ज्ञान हासिल करने के लिए। इस विद्या में बोला जाता था कि ज्ञान बस बाहरी दुनिया में ही नहीं, बल्कि आपके भीतर भी है। पर ये एजुकेशन सिस्टम सबके लिए नहीं था। समाज के कास्ट डिविजंस का एक भारी असर पड़ा इस एजुकेशन सिस्टम पर। बस ब्राह्मण ही टीचर्स बन सकते थे और स्टूडेंट्स के बीच भी डिस्क्रिमिनेशन था।

अंग्रेजों का प्रभाव और सीमित उद्देश्य

फिर अंग्रेज हमारे देश को चलाने लग गए। और मनु पिल्लई ने अपनी किताब में बताया कि अंग्रेजों का भी कोई मूड नहीं था हमारे एजुकेशन सिस्टम में इस भेदभाव को बदलने का। गवर्नर एल्फिन्स्टोन ने यह आर्गू किया कि इंग्लिश एजुकेशन तो हमें लोअर कास्ट लोगों को देनी नहीं चाहिए। यह सिस्टम एक स्ट्रक्चर्ड और फॉर्मल सिस्टम होगा, जहां आपको मैथ्स, साइंस, इंग्लिश और हिस्ट्री जैसे सब्जेक्ट सिखाए जाएंगे। पर अंग्रेजों का फोकस हमारे देश में लोगों को एजुकेटेड करना नहीं था, बल्कि वो चाहते थे कि हमारे देश से उनको एक छोटी क्लास मिल जाए लो-रैंकिंग स्टाफ जैसे क्लर्क्स और असिस्टेंट की, जो उनको देश चलाने में मदद कर सके। देश चलाने के लिए उनको पुलिस ऑफिसर, सिविल सर्वेंट्स, जजेस और सोल्जर्स की जरूरत थी। उनको ऐसे इंडियंस चाहिए थे जो मानो एक नारियल की तरह थे, बाहर से इंडियन पर अंदर से अंग्रेज।

इसलिए अंग्रेजों का ज्यादातर फोकस सेकेंडरी एजुकेशन पर था, प्राइमरी एजुकेशन पर नहीं, क्योंकि पूरे देश को पढ़ाना-लिखाना उनकी जिम्मेदारी थी नहीं। उनको तो बस ऑफिसर्स तैयार करने थे। जबकि क्रिश्चियन मिशनरीज, जो कई स्कूल्स को चला रहे थे, उनके दूसरे ऑब्जेक्टिव्स थे। मनु पिल्लई लिखते हैं कि मिशनरीज का ऑब्जेक्टिव था कि स्कूल्स के जरिए वो बच्चों को क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट कर पाए। एक अंग्रेज ने लिखा कि एक दिन ये एजुकेशन इतना बड़ा एक्सप्लोजन करेगी मानो इस देश से हिंदुइज्म ही नष्ट हो जाएगा। लिखा जाता है कि इन लोकल्स को वेस्टर्न साइंस देकर हम उनका कॉन्फिडेंस ही हटा देंगे अपने धर्म से। स्कूल्स में बाइबल तक पढ़ाई जाती और यह बोला जाता कि किसी हिंदू को पता भी नहीं चलेगा कि हम कर क्या रहे हैं उनके साथ।

1910 से 1940 के बीच एजुकेशन का 50% एक्सपेंडिचर सेकेंडरी लेवल पर था, जब बस 15% देश लिटरेट था। उन्होंने कोई रिफॉर्म भी क्रिएट नहीं किया जिससे प्राइमरी एजुकेशन कंपल्सरी हो सके। इसलिए हमारी देश की लिटरेसी रेट ज्यादा बढ़ी नहीं।

आज़ादी के बाद का भारत और आईआईटी का उदय

फिर देश आजाद हुआ। इंडियन सरकार ने भी प्राइमरी एजुकेशन को प्रायोरिटी नहीं दी। हमारा देश वर्ल्ड क्लास कॉलेजेस बनाने लगा, जैसे आजादी के 3 साल बाद ही देश का टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज आईआईटी खड़गपुर बना। क्योंकि 19वीं सदी के दौरान साइंस और टेक्नोलॉजी दुनिया भर में बहुत आगे बढ़ रही थी, इसलिए इंडियन सरकार का मानना था कि इन एडवांसेज का एडवांटेज लेने के लिए हमें एक वर्ल्ड क्लास हायर एजुकेशन सिस्टम बनाना होगा। वर्ल्ड वॉर II के बाद इंडिया को पता चला कि हमें टेक्निकल वर्कर्स की जरूरत है, क्योंकि इस वॉर के दौरान चाहे मशीनरी हो, टूल्स हों, टेक्निकल एक्सपर्टीज हो, वो भारत में ब्रिटेन या फिर दूसरे देशों से आती थी। जिसके बाद हमारे पॉलिटिशियन को रिलाइज हुआ कि हम दूसरे देशों पर निर्भर नहीं कर सकते।

इसीलिए 1944 में सर आर्देशिर दलाल, जो एक एक्स सिविल सर्वेंट हैं, उनकी लीडरशिप में एक डिपार्टमेंट ऑफ प्लानिंग एंड डेवलपमेंट बनाया गया। उन्होंने कहा कि हमें साइंस और टेक्नोलॉजी पर फोकस करना होगा अगर हमें देश की प्रॉब्लम्स को सॉल्व करना है, और इस चीज के लिए हमें लोगों को टेक्निकल स्किल्स देने होंगे। इसीलिए उन्होंने दो कदम उठाए: पहला, उन्होंने बनाया डिपार्टमेंट ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च और दूसरा, उन्होंने एक सरकारी कमेटी बनाई जिससे हमारे देश में टेक्निकल एजुकेशन बढ़े। इस सरकारी कमेटी ने कहा कि हमें चार एडवांस्ड टेक्निकल कॉलेजेस बनाने चाहिए हमारे देश में, यूएस के एमआईटी की तरह। प्रधानमंत्री नेहरू ने ये रिकमेंडेशंस एक्सेप्ट करी और हमारे देश ने वर्ल्ड क्लास कॉलेजेस बनाना स्टार्ट किया, जैसे आईआईटी खड़गपुर।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में इस कॉलेज की पहली कन्वोकेशन एड्रेस के दौरान बोला कि यह जगह बनी है एक डिटेंशन कैंप पर और ये हमारे देश का एक मॉन्यूमेंट है जो हमारे भविष्य को बनाएगा। वो बोलते हैं, "आप लोग इंजीनियर्स हो और इस दुनिया में हमें इंजीनियर्स की जरूरत है।" प्रधानमंत्री नेहरू मानते थे कि आईआईटी ही देश को आगे लेकर जाएंगे। इसीलिए उसी साल उन्होंने आईआईटी खड़गपुर एक्ट ऑफ 1956 पास करी जिसने आईआईटी को एन इंस्टिट्यूट ऑफ नेशनल इंपॉर्टेंस बनाया।

इनफैक्ट 1960 तक इंडिया की लिटरेसी रेट बस 28% ही थी, जबकि इन 10 सालों के दौरान इंडिया ने पांच आईआईटी और एक आईआईएम बना दिया।

चाइना की बॉटम-अप अप्रोच

जबकि चाइना की अप्रोच बिल्कुल अपोजिट थी। इंडिया की टॉप-डाउन अप्रोच थी, चाइना की बॉटम-अप, यानी कि उन्होंने फोकस किया प्राइमरी एजुकेशन पर। अपने इतिहास में चाइना ने फोकस किया था इंपीरियल सिविल एग्जाम पर, इंडिया की तरह चाइना का भी ऑब्जेक्टिव यही था कि इस एग्जाम से वो सिविल सर्वेंट्स तैयार करें। पर लेट 1890 के बाद चाइना पर दूसरे देशों का इन्फ्लुएंस बढ़ने लगा। पहली साइनो-जापनीज वॉर के बाद चाइना को एक बहुत बुरी हार झेलनी पड़ी जापान के खिलाफ। इसने चाइना को बताया कि वह जापान और दूसरे देशों से मिलिट्री और इक्विपमेंट के मामले में बहुत कमजोर है।

इस हार ने चाइना की चिंग डायनेस्टी को हिला दिया और उनको ये रिलाइज हुआ कि जब तक चाइना अपने इंस्टीट्यूशंस को मॉडर्नाइज नहीं करेगा, उनको ऐसी हार झेलनी ही पड़ेगी। जिसकी वजह से 1905 में चिंग डायनेस्टी ने इंपीरियल सिविल सर्विस एग्जाम्स को कैंसल किया और स्पेशलाइज्ड स्कूल्स तैयार किए मॉडर्न एजुकेशन के बेसिस पर। उन्होंने देखा कि जापान में तो बच्चों के लिए कंपलसरी एजुकेशन है, पर चाइना में नहीं है। इसलिए अगले साल ही उन्होंने कंपलसरी एजुकेशन लॉ पास किया, जिसने कहा कि 7 साल की उम्र के बच्चों को स्कूल जाना ही होगा।

1928 में चाइनीज सरकार ने डिसाइड किया कि वह प्राइमरी एजुकेशन को और बढ़ावा देंगे तीन फेजेस में: पहली फेज में उन्होंने 80% बच्चों के लिए कंपलसरी एजुकेशन करी एक साल के लिए, दूसरी फेज में यह कंपलसरी एजुकेशन 2 साल की हो गई, और आखिरी फेज में 4 साल की। तो जहां इंडिया का बजट सेकेंडरी और टर्शरी लेवल्स की तरफ जाने लगा, चाइना का फोकस कई सालों से प्राइमरी लेवल पर था और धीरे-धीरे सेकेंडरी और टर्शरी लेवल पर बढ़ा।

तो दोनों इंडिया और चाइना में 90% पॉपुलेशन अनपढ़ थी, पर 1980 में आते-आते जहां इंडिया की 60% एडल्ट पॉपुलेशन इलिटरेट थी, यह नंबर चाइना के लिए बस 22% था। क्योंकि चाइना ने करोड़ों लोगों को बेसिक लिटरेसी और न्यूमेरिकल स्किल सिखा दिए।

बुनियादी शिक्षा का आर्थिक प्रभाव

इस वजह से यह लोग अपने खेत छोड़कर इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में काम कर सकते थे। सस्ते लेबर की वजह से चाइना पूरी दुनिया की फैक्ट्री बन गई। वो परिवार जो एक टाइम किसान थे, कुछ टाइम बाद फैक्ट्री में लेबरर्स बन गए। इनमें से कुछ लेबरर्स फिर फैक्ट्री के मैनेजर्स बने और कुछ मैनेजर्स फैक्ट्री के ओनर्स। जैसे झोउ कुनफेई, जो आज चाइना की सबसे बड़ी बिलियनेयर्स में से एक हैं, एक जमाने में शेन्ज़न की एक छोटी सी फैक्ट्री में काम करती थीं। 1993 में बस 22 साल की उम्र में उन्होंने अपनी 20 लाख की सेविंग्स यूज करी एक नई कंपनी लॉन्च करने के लिए, लेंस टेक्नोलॉजी, जो हाई क्वालिटी ग्लास को मैन्युफैक्चर करती थी। उनकी और उनकी कंपनी की किस्मत बदली 2001 में जब टीसीएल कॉरपोरेशन ने उनको एक मोटा कांट्रैक्ट दिया। आज यह कंपनी इतनी बड़ी बन गई है कि वह हजारों लोगों को एंप्लॉय करती है, जिनके परिवार एक जमाने में खेती करते थे। और यही कहानी है चाइना की, जहां एजुकेशन ने किसानों को लेबरर बनाया, कुछ लेबरर्स को मैनेजर और कुछ मैनेजर्स को ओनर।

भारत में अटके किसान

पर अनफॉर्चूनेटली, हमारी एजुकेशन की वजह से यह इंडिया में नहीं हुआ। 1987 में दोनों इंडिया और चाइना में 62% लोग खेती करते थे, अगले 30 सालों के दौरान ये नंबर चाइना के लिए बस 15% हो गया, पर इंडिया के लिए 40%। अब क्योंकि इंडिया में कंपल्सरी एजुकेशन लॉ ही नहीं था, इसलिए करोड़ों लोगों के पास बेसिक स्किल्स नहीं थे, और क्योंकि उनके पास वो स्किल्स नहीं थे, वो खेती छोड़ ही नहीं पाए। सिचुएशन सबसे खराब है किसानों के बच्चों की, ना उनके पास स्किल्स हैं खेती छोड़ने के लिए और ना खेती में पैसे हैं, इसीलिए वो उधर अटक गए।

जैसे हसीब अहमद की बात करते हैं, उत्तर प्रदेश के रामपुर इलाके से, उन्होंने 2020 के फार्म लॉस के खिलाफ प्रदर्शन किया था। वो कहते हैं कि उनके दो बच्चे हैं, एक 12वीं में और एक 9वीं में, और दोनों खेती से कुछ करना ही नहीं चाहते। बच्चे अपनी जिंदगी में कुछ और हासिल करना चाहते हैं, उन्होंने देखा कि मैंने अपनी पीठ कितनी तोड़ी है पर उस चीज के लिए मुझे कुछ मिला नहीं। इंडिया में एक छोटे से किसान के पास बस करीब 1 हेक्टेयर जमीन है और उनकी एवरेज इनकम करीब 10,000 रुपए महीना, यानी कि वो साल के कमाते हैं 1,20,000 रुपए, पर 70,000 से ज्यादा रुपए का तो उन पर कर्ज है। कहां से रोटी-सब्जी खाएंगे? इसलिए सीता आर्या, उत्तर प्रदेश के अमरोहा डिस्ट्रिक्ट से, कहती हैं कि वो चाहती हैं कि उनके बच्चे किसान बनने की बजाय कोई बीड़ी या पान की दुकान ही खोल लें। वो कहती हैं कि मेरा परिवार कर्ज से डूब रहा है, मैं कैसे अपने बच्चों को कहूं कि तुम इसी खेतीबाड़ी में लगे रहो।

जबकि मैं आपको उदाहरण देता हूं कि चाइना में कितनी अलग सिचुएशन है। झान फूमेई चाइना की फुजियान प्रोविंस में सुताई गांव से हैं और उनका पूरा परिवार किसानों का है। छोटी सी उम्र में वह भी परिवार के खेत में ही काम करती थीं, 12 लोग एक ही घर में रहते थे। अब क्योंकि चाइना में एक कंपलसरी लॉ था एजुकेशन का, इसलिए उनको स्कूल जाना ही पड़ा। स्कूल गईं और फिर 2002 में उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन सर्जरी में कंप्लीट करी और बीजिंग में उनको एक रिसर्च इंस्टिट्यूट में एक जॉब मिली। उनकी बहन भी एक कॉलेज अटेंड कर पाई, जहां सरकार ने कोई फीस भी नहीं ली। आज सभी लोगों की एक अच्छी ऑफिस जॉब है।

भारत का ब्रेन ड्रेन और आईआईटी का विरोधाभास

अब हमारे देश में हजारों आईआईटी ग्रेजुएट्स की तो जिंदगी बन गई है, पर उन लाखों लोगों का क्या जो किसान के बेटे-बेटी हैं? हमने आईआईटी जैसे हीरे तो बना दिए, पर हमें यह भी रिलाइज करना चाहिए कि आईआईटी के ग्रेजुएट्स के लिए ज्यादा अपॉर्चुनिटी इंडिया के बाहर है। गूगल के टॉप रैंकर्स के बारे में एक स्टडी ने यह दिखाया कि जितनी ज्यादा आपकी रैंक है, उतनी ज्यादा प्रोबेबिलिटी है कि आप देश छोड़ के दूसरी नौकरी करोगे। इनफैक्ट, टॉप 1000 रैंकर्स में देश छोड़ने की प्रोबेबिलिटी 38% है, टॉप 100 में 62%, और टॉप 10 में 90%। अब ऑफकोर्स हर आईआईटीयन देश छोड़कर नहीं जा रहा, पर टॉप 1000 में से 38% बहुत अच्छा खासा नंबर है।

तो हमने मानो एक स्क्विड गेम जैसा सिस्टम क्रिएट कर लिया, जहां अगर आपने जेईई सिस्टम की रेड लाइट-ग्रीन लाइट गेम पार कर ली तो आपकी जिंदगी बन गई, पर अगर नहीं करी तो क्या? अब ऑफकोर्स कुछ लोग अपना बिजनेस सेटअप करेंगे, मार्केटिंग में अच्छा करेंगे, कंटेंट क्रिएटर बन जाएंगे, पर उन लाखों-करोड़ों लोगों का क्या जिनके पास ये अपॉर्चुनिटी नहीं है? जो एक किसान के परिवार में पैदा हुए हैं, जिनके पिताजी ऑटो चलाते हैं और उनको एक सरकारी स्कूल में भी ढंग की नॉलेज नहीं मिल रही।

आज की ज़मीनी हकीकत और राजनीतिक प्राथमिकताएं

पर एक सवाल जो हमें पूछना चाहिए, वो है कि देश की आजादी के 75 साल बाद भी हम हमारे एजुकेशन सिस्टम में इतना बदलाव क्यों नहीं कर पाए हैं? जीडीपी का 4% हमारा देश एजुकेशन पर खर्च करता है, जो एक बुरा नंबर नहीं है। प्रॉब्लम यह नहीं है कि हम पैसा खर्च नहीं कर रहे, प्रॉब्लम यह है कि हम पैसे को ढंग से खर्च नहीं कर रहे, क्योंकि ये एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी ही नहीं है।

राजस्थान के धौलपुर गांव में एक सरकारी स्कूल टीचर ने कहा कि जब सरकारी ऑफिशल्स हमारे स्कूल आते हैं, वो चेक करते हैं कि दूध की क्वालिटी क्या है जो हम मिड-डे मील में सर्व कर रहे हैं, ना कि यह कि हम मैथ या फिर हिंदी ढंग से सिखा रहे हैं या नहीं। क्योंकि पॉलिटिशियन को भी पता है कि जो दिखता है वही बिकता है। मिड-डे मील से वोटर्स को पता है कि उनके बच्चे को मिल क्या रहा है, पर कितने वोटर्स टेंशन में हैं कि उनके बच्चों को प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया क्या जा रहा है?

इसी वजह से कई पॉलिटिकल पार्टीज इलेक्शन से पहले ही बच्चों को लैपटॉप और दूसरी चीजें देती हैं, पर इन स्कीम्स से एजुकेशन की स्थिति नहीं बदली। जैसे इस वीडियो को देखो, यूपी के अन्नाव में एक सरप्राइज इंस्पेक्शन के दौरान यह पता चला कि क्लास 8वीं की टीचर जो सब्जेक्ट इंग्लिश पढ़ा रही है, वह खुद ही नहीं पढ़ सकती।

बुनियादी ढांचे की कमी

अब यह भी गलत होगा कि हम सारा दोष पंडित नेहरू को ही दे रहे हैं, 75 साल हो गए हैं देश की आजादी को, अभी भी ये प्रॉब्लम फिक्स नहीं हुई है। जैसे मैंने अपने रिसेंट आईएएस वीडियो में बताया था कि टीचर्स पर इतना पेपर वर्क थोप दिया गया है कि बच्चों को कंप्यूटर लैब यूज करने की बजाय उनको टेंशन रहती है कि कंप्यूटर चोरी ना हो जाए। 25% रूरल इंडिया के स्कूल्स के पास तो पीने का पानी और टॉयलेट की फैसिलिटी नहीं है।

सरकारी स्कूलों का खाली होना

इसी वजह से बच्चे पब्लिक स्कूल नहीं, बल्कि प्राइवेट स्कूल जाते हैं। 2010 और 2016 के बीच इंडिया में पब्लिक स्कूल्स में एनरोलमेंट 1.3 करोड़ से कम हो गई और प्राइवेट में 1.7 करोड़ से बढ़ गई। इसका मतलब है कि पब्लिक स्कूल तो बिल्कुल खाली हो गए। क्योंकि स्कूल्स खाली हो गए, कई सरकारी स्कूल्स को मर्ज करना पड़ा, यानी कि एक क्लासरूम में 40 स्टूडेंट्स तो हैं, पर कई स्टूडेंट्स फर्स्ट क्लास से हैं, सेकंड और कई थर्ड, तो टीचर सेम टाइम तीनों क्लास के स्टूडेंट्स को पढ़ा रही है। अब क्या ही पढ़ पाएंगे?

आज भी हम वही गलती कर रहे हैं जो हमने 75 साल पहले करी थी, हमने प्राइमरी एजुकेशन को अपना फोकस बनाया ही नहीं।

चाइना का मॉडर्न मिशन और निवेश

जबकि चाइना ने 10 साल पहले ही एक मिशन मोड स्टार्ट किया। मार्च 2008 में चाइना की एक पॉलिटिकल बॉडी ने एक नेशनल स्ट्रेटजी बनाई, जहां देश की एजुकेशन डेवलपमेंट उनकी प्रायोरिटी बनेगी। इसीलिए उन्होंने मीडियम और लॉन्ग टर्म एजुकेशन प्लांस बनाए, जिनको बुलाया गया "द प्लान"। 2000 लोगों को इंक्लूड किया गया इन प्लांस बनाने के लिए, जहां 500 एक्सपर्ट शामिल थे। प्लान का ड्राफ्ट बनाने के बाद पब्लिक से कंसल्टेशन करी गई, कंसल्टेशन में 14000 लेटर्स उनको मिले जिनमें 21 लाख प्रपोजल्स थे। मई और जून 2010 को प्रेसिडेंट हू जिंताओ ने खुद दो मीटिंग्स चेयर करी इस प्लान के बारे में। प्लान ने फोकस किया रूरल एजुकेशन पर, टीचर-स्टूडेंट रेशो पर और टीचर्स की सैलरीज पर।

इन पॉलिसीज की वजह से ही रूरल चाइना में एजुकेशन मानो पूरी तरह बदल ही गई है। जैसे ये हैं हेड प्रिंसिपल चाइना के डिशी एरिया में, और वो कहते हैं कि सरकार ने टेक्नोलॉजी इक्विपमेंट में काफी पैसा खर्च किया है, जिसकी वजह से गांव के बच्चों में भी अब उतना ही कॉन्फिडेंस देखने को मिलता है जो चाइना के शहरी बच्चों में देखने को मिलता है। अब हालांकि कई टीचर्स चाइना में भी गांव में नहीं पढ़ाना चाहते, पर टेक्नोलॉजी की वजह से वो टीचर्स जो शहरों में बेस्ड हैं, वो भी गांव के बच्चों को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पढ़ा पाते हैं।

समाधान की दिशा में कदम

इसीलिए चाइना की तरह ही इंडिया को भी इसको एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी बनाना होगा। हरियाणा जैसी स्टेट्स ने यह करने की जरूर कोशिश करी है, एक "सक्षम घोषणा" प्रोग्राम के जरिए वह स्कूल लेवल पर लर्निंग आउटकम्स बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसकी अकाउंटेबिलिटी चीफ मिनिस्टर मनोहर लाल खट्टर ने खुद ली थी। लेटेस्ट रिपोर्ट्स के हिसाब से 119 में से 94 ब्लॉक्स अब सक्षम डिक्लेयर कर दिए गए हैं, इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की लर्निंग बहुत हद तक इंप्रूव हो गई है। अपने पहले टर्म में आम आदमी पार्टी हमारे देश में कुछ सरकारों में से एक है जिन्होंने एजुकेशन को एक पॉलिटिकल प्रायोरिटी बनाया।

यही चीज देश के और स्टेट्स को भी करनी होगी, क्योंकि अंग्रेज और पंडित नेहरू पर दोष डालना जरूर आसान है, मुश्किल है देश के करोड़ों बच्चों का भविष्य बदलना एजुकेशन के जरिए।