Why is Saudi Arabia Funding Pakistan? | (Full History)
पाकिस्तान-सऊदी अरब संबंध: अमेरिका-ईरान मध्यस्थता से लेकर सामरिक साझेदारी तक
कुछ दिन पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर को अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में मध्यस्थता के लिए धन्यवाद दिया। दो हफ्ते का युद्धविराम घोषित हुआ और भारतीय चैनलों पर बहस छिड़ गई। कुछ लोग यह दावा करने लगे कि पाकिस्तान के कहने पर अमेरिका और ईरान युद्धविराम के लिए राजी हुए।
सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की भूमिका सिर्फ संदेश पहुंचाने भर की थी, इससे अधिक कुछ नहीं। युद्धविराम टिका नहीं, बातचीत पूरी नहीं हुई और अनौपचारिक रूप से दोनों देश अब भी युद्ध की स्थिति में हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम बात पर कम लोगों का ध्यान गया।
सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की तैनाती
जिस समय सऊदी अरब पर ईरानी हमलों का खतरा मंडरा रहा था, पाकिस्तान ने 13,000 सैनिक और 10 से 18 लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजे। यह बल सऊदी अरब के पूर्वी सेक्टर स्थित किंग अब्दुल अजीज एयरबेस पर तैनात किया गया। सऊदी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की कि यह तैनाती दोनों देशों के बीच सैन्य समन्वय को बेहतर बनाएगी।
संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौता
यह तैनाती पिछले वर्ष हस्ताक्षरित संयुक्त रणनीतिक रक्षा समझौते का हिस्सा है। समझौते में स्पष्ट प्रावधान है कि एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। लेकिन यह समझौता केवल सैन्य सहायता तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक गहरी आर्थिक और सामरिक निर्भरता छिपी है।
आर्थिक मदद का छिपा पहलू
कुछ हफ्ते पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पाकिस्तान से 3.5 बिलियन डॉलर का ऋण अचानक वापस मांग लिया। पाकिस्तान के पास इतनी राशि उपलब्ध नहीं थी। तब सऊदी अरब ने आगे बढ़कर पाकिस्तान को यह राशि प्रदान की ताकि वह यूएई का ऋण चुका सके।
परमाणु बम: रिश्ते की असल वजह
इन सबके मूल में एक अहम चीज है जो सऊदी अरब के पास नहीं है लेकिन पाकिस्तान के पास है – परमाणु बम। यही कारण है कि पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। यह रिश्ता करीब 80 वर्षों में विकसित हुआ है और इसे देखकर एक बार फिर यह बात पुष्ट होती है कि पाकिस्तानी सेना अपने आप में कितनी व्यस्त है। जैसा कहा जाता है, दूसरे देशों के पास सेना होती है, पाकिस्तान में सेना के पास देश है। यही कारण है कि पाकिस्तान शिक्षा से अधिक रक्षा पर व्यय करता है।
1940 का दशक: रिश्ते की नींव
1940 में मोहम्मद अली जिन्ना ने लाहौर प्रस्ताव पेश कर पाकिस्तान की मांग की। इसके तुरंत बाद सऊदी अरब के शाह इब्न सऊद के पुत्र सऊद बिन अब्दुल अजीज अपने पांच भाइयों के साथ लाहौर आए। सऊदी अरब को एक ऐसे मुस्लिम राष्ट्र की आवश्यकता थी जो मक्का और मदीना के संरक्षक के रूप में सऊद परिवार की भूमिका को स्वीकार करे।
पाकिस्तान एक गैर-अरब मुस्लिम देश होने के कारण इस भूमिका के लिए बिल्कुल उपयुक्त था। वह मिस्र की तरह यह दावा नहीं कर सकता था कि सऊद अरब जगत का नेतृत्व नहीं कर सकते। 1946 में जब मुस्लिम लीग संयुक्त राष्ट्र में समर्थन जुटाने का प्रयास कर रही थी, सऊदी राजकुमार फैसल ने उनके प्रतिनिधियों को यूएन डेलिगेट्स से मिलने में मदद की। 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद सऊदी अरब उसे मान्यता देने वाले पहले देशों में शामिल था।
1965 का युद्ध और अमेरिकी विश्वासघात
1965 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता की पूरी उम्मीद थी। लेकिन अमेरिका ने दोनों देशों पर हथियार प्रतिबंध लगा दिया। पाकिस्तान को एहसास हुआ कि उसे नए सहयोगियों की तलाश करनी होगी। सऊदी अरब के शाह फैसल ने पाकिस्तान के साथ एक रक्षा सहयोग प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत पाकिस्तानी पायलट और प्रशिक्षक सऊदी वायुसेना को प्रशिक्षित करने लगे और बदले में पाकिस्तान को वित्तीय सहायता मिलती रही।
1971 का आघात और परमाणु कार्यक्रम
1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने और 90,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के बाद पाकिस्तानी सेना का मनोबल टूट चुका था। जुल्फिकार अली भुट्टो ने घोषणा की, "हम घास खाएंगे और भूखे रहेंगे लेकिन अपना परमाणु बम बनाकर रहेंगे।" जनवरी 1972 में शीर्ष वैज्ञानिकों की गुप्त बैठक हुई और परमाणु बम बनाने का निर्णय लिया गया।
समस्या धन की थी। भुट्टो ने सऊदी अरब का रुख किया। 1973 के तेल संकट के बाद सऊदी अरब के पास धन की बाढ़ आ चुकी थी। सऊदियों ने एक शर्त रखी – पाकिस्तान का बम सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए। यह सौदा तय हो गया।
जियाउल हक और इस्लामीकरण
1977 में जनरल जियाउल हक ने सत्ता पर कब्जा कर भुट्टो को फांसी दे दी। अपने शासन को वैधता देने के लिए उन्होंने पाकिस्तान को एक सख्त इस्लामी राज्य बनाने का अभियान शुरू किया। कानूनी प्रणाली में कठोर इस्लामी दंड लागू किए गए, स्कूलों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य हुई और सेना में कट्टरपंथी अधिकारियों को तरजीह दी जाने लगी। सऊदी अरब इस बदलाव से अत्यधिक प्रसन्न हुआ।
अफगान जिहाद: साझा मिशन
दिसंबर 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया। सऊदी अरब और अमेरिका ने अफगान मुजाहिदीन को अरबों डॉलर की सहायता दी, लेकिन यह सारा धन और हथियार पाकिस्तान की आईएसआई के माध्यम से पहुंचाए गए। आईएसआई ने सीमा पर प्रशिक्षण शिविर स्थापित किए और तय किया कि किस लड़ाके को कितने हथियार मिलेंगे।
सऊदी अरब ने पाकिस्तान में सैकड़ों मदरसे बनवाए जहां इस्लाम का अत्यंत कठोर स्वरूप पढ़ाया जाता था। दस वर्षों में पाकिस्तान में पंजीकृत मदरसों की संख्या 900 से बढ़कर 8,000 हो गई। 1989 में सोवियत सेना की वापसी के साथ यह साझेदारी सफल साबित हुई।
1998 के परमाणु परीक्षण
मई 1998 में भारत द्वारा पोखरण में परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद पाकिस्तान पर प्रचंड दबाव बना। यदि वह परीक्षण नहीं करता तो भारत को स्थायी परमाणु श्रेष्ठता मिल जाती, और यदि करता तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता। 28 मई 1998 को पाकिस्तान ने पांच परमाणु परीक्षण किए।
सऊदी अरब ने तुरंत समर्थन दिया। सऊदी शासक ने कहा, "हम समझते हैं कि आपने ऐसा क्यों किया और हम आपकी अपेक्षा से कहीं अधिक समर्थन करेंगे।" सऊदी अरब ने प्रतिदिन 50,000 बैरल तेल मुफ्त देने का वादा किया ताकि आर्थिक प्रतिबंधों का प्रभाव कम हो सके। सऊदी रक्षा मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से पाकिस्तान की परमाणु सुविधाओं का दौरा किया।
नवाज शरीफ का बचाव
1999 में परमाणु परीक्षण करवाने वाले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जनरल परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर जेल भेज दिया। कई लोगों को आशंका थी कि भुट्टो की तरह उन्हें भी फांसी मिलेगी। लेकिन दिसंबर 2000 में महीनों की वार्ता के बाद, जिसमें सऊदी अधिकारी शामिल थे, नवाज शरीफ को उनके परिवार के 18 सदस्यों सहित जेल से रिहा करवाकर सऊदी अरब के जेद्दा शहर भेज दिया गया।
ओआईसी और कश्मीर का मुद्दा
दशकों तक पाकिस्तान ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत पर दबाव बनाने के लिए इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) का उपयोग किया। 1969 में मोरक्को में हुए पहले ओआईसी शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल को पाकिस्तान के विरोध के कारण बाहर जाना पड़ा था।
लेकिन 21वीं सदी में परिस्थितियां बदल गईं। मार्च 2019 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ओआईसी सम्मेलन में सम्मानित अतिथि के रूप में बुलाया गया। पाकिस्तान ने बायकाट की धमकी दी लेकिन कार्यक्रम बिना किसी बाधा के संपन्न हुआ। अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर ओआईसी ने एक बयान जरूर दिया लेकिन उससे आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। सऊदी अरब ने कश्मीर पर विशेष ओआईसी बैठक बुलाने की पाकिस्तान की बार-बार की मांग को ठुकरा दिया। इसकी मुख्य वजह भारत के साथ 45 बिलियन डॉलर का वार्षिक व्यापार और सऊदी अरब में कार्यरत 25 लाख भारतीय हैं।
2023 के बाद के घटनाक्रम
2023 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी बनाने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की। यह निवेश सऊदी विजन 2030 का हिस्सा है जिसका उद्देश्य सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करना है। पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधन और दुर्लभ खनिज इस योजना के लिए आकर्षक हैं।
सितंबर 2025 का रक्षा समझौता और ऑपरेशन सिंदूर
सितंबर 2025 में दोनों देशों ने एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ऑपरेशन सिंदूर के कुछ महीने बाद हुआ और स्पष्ट करता है कि किसी एक देश पर आक्रमण को दोनों पर आक्रमण माना जाएगा। इस समझौते का सीधा प्रभाव भारत की सुरक्षा गणनाओं पर पड़ेगा।
पाकिस्तान की दोहरी भूमिका
वर्तमान समय में पाकिस्तान एक साथ दो भूमिकाएं निभा रहा है। एक ओर वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा है और ईरान को यह विश्वास दिला रहा है कि वह उसके साथ है। दूसरी ओर वह सऊदी अरब की सैन्य मदद कर ईरान के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए है। स्वाभाविक रूप से ईरान भी अब पाकिस्तान से क्षुब्ध हो चुका है।
लेकिन पाकिस्तानी सेना को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता जब तक सऊदी अरब उसका समर्थन कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने उपग्रह प्रौद्योगिकी से और तुर्की ने ड्रोन से मदद की थी। अब सऊदी अरब की इस डील से पाकिस्तान को इतना धन मिल सकता है कि वह उन्नत वायु रक्षा प्रणाली, ड्रोन और अन्य जटिल सैन्य उपकरण खरीद सके, जिनका बजट पहले उसके पास नहीं था।
भारत पर प्रभाव और भू-राजनीतिक जटिलताएं
सऊदी अरब अपनी रक्षा प्रणालियां सीधे पाकिस्तान को हस्तांतरित कर सकता है, जैसे F-16 लड़ाकू विमान। इससे फर्क नहीं पड़ता कि विमान पाकिस्तान के अपने पैसे से खरीदा गया या सऊदी अरब के – इनका उपयोग भारत के विरुद्ध किया जा सकता है। यही कारण है कि भारत भी अपनी सैन्य क्षमताओं में भारी निवेश कर रहा है और साथ ही कूटनीति का सहारा ले रहा है।
भू-राजनीति जटिल है। सऊदी अरब के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच चयन करना कठिन है। भारत के साथ सऊदी अरब का वार्षिक व्यापार 45 बिलियन डॉलर का है, जो सऊदी-पाक व्यापार से नौ गुना अधिक है। करीब 25 लाख भारतीय सऊदी अरब में रहते और काम करते हैं। भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
निष्कर्ष
कागजों पर पाकिस्तान और सऊदी अरब की साझेदारी अत्यंत मजबूत दिखती है। सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी मिल रही है और विजन 2030 में आर्थिक विविधीकरण में मदद मिल रही है। पाकिस्तान के लिए तर्क सरल है – उसके पास पैसा नहीं है, रुपया कमजोर है और अरबों डॉलर के आईएमएफ ऋण सिर पर लटक रहे हैं। इस स्थिति से बचने के लिए दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक के साथ औपचारिक सुरक्षा समझौता एक बड़ा सहारा है।
लेकिन उम्मीद है कि पाकिस्तान यह महसूस करेगा कि एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए उसे रक्षा से अधिक शिक्षा पर व्यय करना होगा।
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