Energy Crisis in India, Explained
जब मिडिल ईस्ट में बम फटते हैं तो मोरबी, करनाल और आपकी रसोई तक क्यों कांपती है?
मोरबी से करनाल तक: युद्ध की दस्तक
गुजरात का मोरबी शहर, जो सिरेमिक उद्योग के लिए जाना जाता है, तेहरान से 2400 किलोमीटर दूर बसा है। लेकिन तेहरान में अभी जो हो रहा है, उसकी गूंज आपको मोरबी में साफ सुनाई देगी। भारत का लगभग 80% सिरेमिक प्रोडक्शन मोरबी में होता है। फिलहाल यहां करीब 400 फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा से आए 4 लाख कर्मचारी अपने घर वापस लौट चुके हैं। एक सिरेमिक टाइल्स कंपनी में काम करने वाले एक शख्स ने बताया कि उनकी कंपनी 10-12 दिनों से बंद है और इसी वजह से मजबूरन उन्हें वापस जाना पड़ रहा है।
इसी तरह का मंजर हरियाणा के करनाल शहर में देखने को मिल रहा है, जो 1100 किलोमीटर दूर है। यहां बासमती चावल की कई राइस मिलें हैं जहां से खाड़ी देशों को चावल निर्यात होता है। लेकिन ये फैक्ट्रियां अभी महज 10% क्षमता पर चल रही हैं और लगभग आधे कर्मचारी घर लौट चुके हैं। दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों के रेस्टोरेंट्स के खर्चे भी आसमान छू रहे हैं। गुजरात की सिरेमिक फैक्ट्री हो, हरियाणा की राइस मिल या दिल्ली का रेस्टोरेंट, ये तीनों चीजें सीधे तौर पर मिडिल ईस्ट की जंग से जुड़ी हुई हैं।
सरकार का बदला रुख: आश्वासन से तैयारी तक
11 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने देश को आश्वासन दिया कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है और एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई को लेकर अफवाहों पर ध्यान न दें। लेकिन दो हफ्ते बाद जब जंग नहीं रुकी तो सरकार का रुख बदल गया। प्रधानमंत्री ने स्थिति की गहराई को समझाते हुए कहा कि हम कोरोना काल की तरह एकजुटता से ऐसी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं और हमें फिर से तैयार रहने की जरूरत है। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की कई बैठकें बुलाईं। इसमें प्रधानमंत्री के साथ रक्षा, गृह, वित्त और विदेश मंत्री शामिल होते हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि सरकार अब लोगों को इंडक्शन हीटर इस्तेमाल करने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रही है ताकि मिडिल ईस्ट से कुकिंग गैस के आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा जरूर हो गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पेट्रोल पंप और एलपीजी सिलेंडर के दाम और आपूर्ति तुरंत बदल जाएगी। युद्धविराम के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल जाएगा। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान को भी नहीं मालूम कि उनकी बारूदी सुरंगें कहां बिछी हैं, जिससे जलडमरूमध्य को खोलना आसान नहीं है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता का गणित
इस जंग का सबसे बड़ा असर हमारे ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ता है। भारत जितनी ऊर्जा खपत करता है, उसका बहुत कम हिस्सा खुद उत्पादित करता है। क्रूड ऑयल का 88%, एलपीजी का 60% और प्राकृतिक गैस का 45% आयात किया जाता है और इन तीनों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। हम अमेरिका और चीन के बाद दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक हैं और हर साल लगभग 130 से 150 बिलियन डॉलर का तेल आयात करते हैं, जो हमारे रक्षा बजट से भी अधिक है।
क्रूड ऑयल से क्या-क्या बनता है?
क्रूड ऑयल एक गाढ़ा, काला तरल है जिसे रिफाइनरी में उच्च तापमान पर गर्म करके अलग-अलग ईंधनों में बांटा जाता है। सबसे हल्का भाग एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) है, जो दो गैसों का मिश्रण है और दबाव देकर इसे तरल बनाकर सिलेंडर में भरा जाता है। देश के 33 करोड़ परिवार खाना पकाने के लिए इसी सिलेंडर का उपयोग करते हैं। इसके बाद पेट्रोल आता है जो 30 करोड़ से अधिक पंजीकृत वाहनों को चलाता है। फिर एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) है जो हर विमान का ईंधन है, और इसके महंगे होने पर हवाई किराए बढ़ जाते हैं। अंत में डीजल आता है जो आर्थिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के लगभग सभी ट्रक इसी पर चलते हैं। सब्जियों से लेकर फैक्ट्री के सामान तक की ढुलाई डीजल पर निर्भर है। डीजल के दाम बढ़ने का मतलब है हर उस चीज का महंगा होना जिसमें परिवहन शामिल है।
प्राकृतिक गैस का खेल
प्राकृतिक गैस क्रूड ऑयल से नहीं मिलती, बल्कि इसके अपने भूगर्भीय भंडार हैं। इसका लगभग आधा हिस्सा हम आयात करते हैं। यह तीन रूपों में दिखती है: सीएनजी (ऑटो और बसों के लिए), पाइप्ड गैस (दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में रसोई के लिए), और यूरिया (कृषि के लिए सबसे लोकप्रिय उर्वरक)। अगर प्राकृतिक गैस महंगी होगी तो खाने के दाम भी बढ़ेंगे।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: दुनिया की अर्थव्यवस्था की नब्ज
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बेहद पतला समुद्री मार्ग है जिस पर वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर है। खाड़ी देशों के पास अपना तेल-गैस भेजने के लिए मुख्य रूप से दो रास्ते हैं: होर्मुज जलडमरूमध्य या लाल सागर। सऊदी अरब ने अपने पूर्वी तेल क्षेत्रों से लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह तक एक पाइपलाइन बना रखी है, लेकिन वह रोजाना 70 लाख बैरल के निर्यात में से सिर्फ 25 लाख बैरल ही ले जा सकती है। यूएई के पास भी फुजैराह तक एक छोटी पाइपलाइन है पर उसकी क्षमता सीमित है। इराक और कुवैत के पास तो कोई वैकल्पिक मार्ग ही नहीं है, और कतार जो दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस निर्यातक है, वो भी पूरी तरह इसी रास्ते पर निर्भर है। सामान्य समय में इस जलडमरूमध्य से रोज 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। एक ओवरलैंड विकल्प की कल्पना अक्सर की जाती है, लेकिन एक सिंगल ऑयल टैंकर 20 लाख बैरल तेल ले जाता है जबकि एक ट्रक मात्र 200 बैरल। एक जहाज को रिप्लेस करने के लिए एक लाख ट्रक नॉनस्टॉप चलाने होंगे।
ईरान का "टोल बूथ" और बीमा का जोखिम
सिट्रिनी रिसर्च के एक विश्लेषक ने अपनी जांच में पाया कि ईरान ने अपने क्षेत्रीय जल में एक तरह का टोल बूथ बना लिया है, जहां से गुजरने के लिए जहाजों को मोटी रकम चुकानी पड़ती है। उन्होंने एक मामले में 20 मिलियन डॉलर देने की बात कही। ईरान की भौगोलिक स्थिति (40 किमी चौड़ा जलडमरूमध्य, 1700 किमी लंबी पहाड़ी तटरेखा) उसे सस्ते ड्रोन और छोटी हमलावर नौकाओं से नियंत्रण करने में मदद करती है। युद्ध के दौरान जहाजों को गुजरने के लिए युद्ध जोखिम बीमा लेना पड़ता है। जैसे-जैसे खतरा बढ़ता है, बीमा प्रीमियम आसमान छूने लगते हैं, और इसका सीधा असर पेट्रोल पंप पर आपके द्वारा चुकाए जाने वाले दाम पर पड़ता है।
कूटनीति बनाम सैन्य गठबंधन
जहां अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने इस टोल बूथ को नष्ट करने के लिए एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाने की कोशिश की (जिसमें फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों ने उत्साह नहीं दिखाया), वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने कूटनीति का रास्ता चुना। उन्होंने 12 और 21 मार्च को ईरानी राष्ट्रपति से बात कर यह स्पष्ट किया कि भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू रखना है। भारतीय नौसेना ने 'ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा' शुरू किया, जिसमें युद्धपोत शिवालिक और नंदा देवी जैसे टैंकरों को ओमान की खाड़ी में एस्कॉर्ट कर रहे थे। अप्रैल तक आठ भारतीय जहाज होर्मुज पार कर चुके थे और 22 प्रतीक्षा में थे। 4 अप्रैल को सात साल में पहली बार भारत ने सीधे ईरानी तेल की खरीद की, वो भी बढ़ती कीमतों को देखते हुए खुद ट्रंप की मंजूरी के बाद।
आपकी रसोई, यात्रा और जेब पर सीधा असर
यह संकट सिर्फ खबरों की सुर्खियों में नहीं, सड़कों पर भी है। दिल्ली में 36 वर्षीय माया रानी अपनी छह महीने की बेटी के साथ चार दिनों तक गैस एजेंसी का चक्कर लगाती रहीं और खाली हाथ लौटीं। अयोध्या के मित्रसेनपुर गांव के स्कूल में एक हफ्ते से मिड-डे मील नहीं बन पाया क्योंकि सिलेंडर ही नहीं है। बच्चों को बस बिस्किट बांटकर घर भेज दिया गया। एक काला बाजार पनप गया जहां 900 रुपये का सिलेंडर 3000 से 5000 रुपये में बिक रहा था। सूरत जैसे कपड़ा हब से 5 लाख दिहाड़ी मजदूर पलायन कर गए, क्योंकि उनकी दिहाड़ी 500 रुपये थी और एक किलो गैस का कालाबाजारी दाम भी 500 रुपये। उनके लिए कमाई गैस में ही खत्म हो जाने से बेहतर था गांव लौट जाना।
यातायात के क्षेत्र में, क्रूड ऑयल 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। सरकारी तेल कंपनियां हर लीटर पर 24 से 30 रुपये का घाटा झेल रही थीं। बल्क डीजल, जिससे कारखाने, जनरेटर और कोल्ड स्टोरेज चलते हैं, 22 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो गया। नतीजा, फलों और सब्जियों के दाम बढ़ गए। एविएशन टर्बाइन फ्यूल के दाम तिगुने होने से हवाई किराए में भी जबरदस्त वृद्धि हुई।
सरकार की रणनीति और विरोधाभास
सरकार ने सबसे पहले घरेलू उपभोक्ताओं को बचाने की कोशिश की। अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया से 8 लाख टन एलपीजी की इमरजेंसी खरीद की गई और घरेलू उत्पादन 40% बढ़ाया गया। नतीजतन, घरेलू सिलेंडर के दाम तो नहीं बढ़े, लेकिन इसके लिए सरकार को हर साल 28,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं कमर्शियल सिलेंडर 11% महंगे हो गए और उद्योगों को 20% गैस कटौती झेलनी पड़ी ताकि शहरों की सीएनजी और घरों की पाइप्ड गैस बची रहे।
भारी उद्योग मंत्रालय ने वाहन निर्माताओं से तेल के बजाय बिजली का विकल्प तलाशने को कहा। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने लोगों को एलपीजी की जगह इलेक्ट्रिक स्टोव अपनाने की सलाह दी। मांग इतनी बढ़ी कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर इंडक्शन स्टोव का स्टॉक खत्म होने लगा। इसके पीछे तर्क दिलचस्प है: भारत का बिजली ग्रिड बांग्लादेश या पाकिस्तान की तरह प्राकृतिक गैस पर नहीं, बल्कि करीब 75% कोयले पर निर्भर है, जो देश में प्रचुर मात्रा में है।
रुपया, बाजार और भविष्य का रोडमैप
वित्त मंत्रालय के अनुसार, क्रूड ऑयल के दाम में 10% की वृद्धि से महंगाई 3% तक बढ़ सकती है। एक दुष्चक्र चल रहा है: तेल के लिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर होता है और कमजोर रुपये से वही तेल खरीदना और महंगा हो जाता है। इस अनिश्चितता के चलते मई में ही एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी निवेश बाजार से बाहर निकल गया, और युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय शेयर बाजार की वैल्यू 40 लाख करोड़ रुपये कम हो चुकी है।
नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत जैसे विशेषज्ञ बताते हैं कि दीर्घकालिक समाधान नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज में निवेश है, ताकि सूरज ढलने या बादल आने पर भी बिजली मिलती रहे। तब तक, जैसा कि साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र वखरिया कहते हैं, अगर यह संघर्ष आज रुक भी गया तो हालात सामान्य होने में 6 से 12 महीने लग सकते हैं।
अब शायद आप समझ गए होंगे कि जब मिडिल ईस्ट में बम फटते हैं, तो उसकी गूंज हरियाणा, गुजरात या दिल्ली में हमारे घर की रसोई तक क्यों सुनाई देती है।
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