IIT-JEE Toppers: Where Are They Now?

मैंने एनालाइज किया कि लास्ट 20 सालों में जो जेई टॉपर्स हैं, वे अभी कर क्या रहे हैं — यह पता लगाने के लिए कि इंडिया के हार्ड वर्किंग स्टूडेंट जाते कहां हैं। मैंने छह जेई टॉपर से भी बात करी, जिनमें से दो ऑल इंडिया रैंक वन हैं, यह समझने के लिए कि उनकी डिसीजंस के पीछे कारण क्या थे।

हमारे देश में JEE को कौन टॉप नहीं करना चाहता?

एक ऐसा एग्जाम जो वन ऑफ द हार्डेस्ट से भी कम नहीं है। अब भले ही आप IITian ना हों, पर IIT के टॉपर्स अभी कर क्या रहे हैं, इससे हम कुछ ना कुछ तो सीख ही सकते हैं। और जो मुझे पता चला वो बहुत ही सरप्राइजिंग है। इन लोगों की डिसीजंस और उसके पीछे उनके फैक्टर्स क्या थे — बहुत ही यूनिक और इंटरेस्टिंग हैं। इससे मुझे पता चला कि हमारे देश में क्या सही है और क्या गलत।

एक नज़र 1998 बैच पर

एग्जांपल लेते हैं 1998 बैच के टॉप 10 रैंकर्स की:

  • रैंक 1 — अभिनव कुमार: इंटरनेशनल मैथ ओलंपियाड में गोल्ड मेडलिस्ट। IIT नहीं बल्कि MIT गए। बैचलर्स मैथ, फिजिक्स और कंप्यूटर साइंस में। हार्वर्ड से पीएचडी (मैथमेटिक्स)। 6 साल MIT में प्रोफेसर रहे, फिर जॉइन की रेनेसांस टेक्नोलॉजीज — एक प्राइवेट इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी।
  • रैंक 2 — जयंत कुमार कनन: दुर्भाग्यवश, उनका देहांत हो गया। IIT मद्रास के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया बर्कली से पीएचडी।
  • रैंक 3 — सोहम मजूमदार: IIT कानपुर से बीटेक, यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अरबाना से मास्टर्स। Google और फिर खुद की कंपनी स्टार्ट की जिसे Facebook (IIT माफिया) ने एक्वायर किया।
  • रैंक 4 — रजित रायना: IIT कानपुर के बाद स्टैनफोर्ड से पीएचडी। आज Pinterest के लिए काम करते हैं।
  • रैंक 5 — नितिन गुप्ता: IIT कानपुर के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अरबाना से मास्टर्स। अमेरिकन कंपनियों के लिए काम किया।
⚠️ गैस है पर ये तो सब अमेरिका जा रहे हैं। इसलिए IIT का नाम हम अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी भी रख सकते हैं।

2009 और 2010 बैच: ट्रेंड जारी है

अब आप बोलेंगे ये तो 1998 की बात है जब इंडिया में इतनी इकोनॉमिक अपॉर्चुनिटी नहीं थी। तो चलो 2009 बैच: रैंक 1 Google, रैंक 3 प्रोफेसर अमेरिका में, रैंक 4 माइक्रोसॉफ्ट वाशिंगटन।

एक पेपर ने 2010 बैच के पहले 1000 रैंकर्स को एनालाइज किया:

  • ? पहले 1000 में माइग्रेट करने की प्रोबेबिलिटी: 38%
  • ? पहले 100 में: 62%
  • ? पहले 10 में: 90%

जितनी ज्यादा रैंक, उतनी ज्यादा संभावना कि आप इंडिया छोड़कर जाओगे।

अमेरिका क्यों? टॉपर्स से सीधी बात

विश्वा — पीएचडी, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी

उनको IIT में ही रियलाइज हो गया था कि वो पीएचडी करना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने नोटिस किया — IIT में जितने भी प्रोफेसर्स हैं, उन सभी की पीएचडी इंडिया के बाहर से है। "वन ऑफ द मेन फैक्टर्स वाज लाइक, मोस्ट प्रोफेसर्स इन माय इंस्टीट्यूट डिड नॉट डू देयर पीएचडी इन इंडिया।"

IIT बॉम्बे में पीएचडी प्रोग्राम एक्सप्लोर किया। स्टाइपेंड मिली 20-27,000 रुपये महीना — मुंबई जैसे शहर में बमुश्किल गुज़ारा। और ऊपर से ट्यूशन फी भी भरनी थी। वो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मॉलिक्यूलर प्रोग्रामिंग पर काम करना चाहते थे, पर कोई इंडियन यूनिवर्सिटी उस प्रोजेक्ट का हिस्सा ही नहीं थी।

कपिल वैद्य — IIT बॉम्बे से MIT, अब Amazon

कंप्यूटर साइंस में पीएचडी। कहते हैं, "Amazon इज द बेस्ट प्लेस टू बी... कंपनी, स्टार्टअप्स, किसी भी क्राइटेरिया फॉर टेक।"

सिर्फ पीएचडी नहीं, स्टार्टअप का खिंचाव भी

अमन बंसल — स्टैनफोर्ड, फिर सिलिकन वैली स्टार्टअप

एक साल इंडिया में काम किया। स्टैनफोर्ड गए क्योंकि AI के बारे में पढ़ना था और नए लोगों से मिलना था। "जब मैं IIT में था तब AI के कोई कोर्सेज नहीं थे... शायद इतने थे भी नहीं उससे ज्यादा। हर जगह से लोग आते हैं, उनसे मिलेंगे तो काफी कुछ नया सीखने को मिलेगा, नए पर्सपेक्टिव्स मिलेंगे।"

तथागत वर्मा — स्टैनफोर्ड MS, सिलिकन वैली स्टार्टअप

पहले से पता था कि खुद की स्टार्टअप लॉन्च करनी है। इंडिया की स्टार्टअप्स में अप्लाई किया, पर उतनी इंटरेस्टिंग नहीं लगीं। "व्हेन द मास्टर्स रिजल्ट केम... स्टैनफोर्ड मिला तो सोचा, अगर कोई और स्कूल होता तो ज्यादा सोचना पड़ता।"

IITians के चार बड़े ऑप्शन

  1. टेक कंपनियाँ: Google, Microsoft, Amazon।
  2. क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्म्स: Graviton, Tower Research — 1 करोड़+ के पैकेज वाली कंपनियाँ। तथागत के अनुसार, "ट्रेडिंग स्टार्टअप्स से डिस्कनेक्टेड है," इसलिए उन्होंने अवॉइड किया।
  3. हायर स्टडीज/रिसर्च: PhD या MS के लिए विदेश।
  4. स्टार्टअप/एंटरप्रेन्योरशिप: इंडिया या सिलिकन वैली।

जो इंडिया में रहे — अलग सोच, मजबूत कारण

पृथ्वी तेज — UPSC (IAS)

"आई वांटेड टू जॉइन सिविल सर्विसेस सिंस माय चाइल्डहुड।" IIT के बाद कोरिया में काम का मौका था, पर "आई वांटेड टू स्पेंड टाइम क्लोज़ टू माय फैमिली, माय पेरेंट्स।" पहले ही अटेम्प्ट में UPSC क्लियर किया।

सजल गुप्ता — गोल्डमैन सैक्स से प्रोफेशनल पोकर और स्टार्टअप तक

यूएस जाने के बारे में सोचा ज़रूर, पर दोस्त-परिवार पास चाहिए थे। "फैमिली एंड फ्रेंड्स, लाइक आई वांटेड टू बी क्लोज़... सोशल लाइफ इज इंपोर्टेंट फॉर मी।" एंटरप्रेन्योर स्पिरिट रही तो कभी नहीं लगा कि करियर में वो ग्रोथ इंडिया में नहीं मिल सकती।

टैक्स, पॉल्यूशन और वो 'रिटर्न' वाली बात

सरप्राइजिंग बात — किसी ने नहीं कहा कि टैक्स या पॉल्यूशन की वजह से जा रहे हैं। सबका फोकस करियर था। लेकिन जो लौटने या रुकने की सोच रहे हैं, वो क्वालिटी ऑफ लाइफ पर जरूर बात करते हैं।

सजल ने कहा, "इंडिया में बहुत से लोग टैक्स नहीं देते... सैलरी पीपल देती है, पर एक बड़ा करप्ट सेगमेंट है जो नहीं देता। वो सिविक एमिनिटी, जो टैक्स देने के बाद चाहिए, लैकिंग है। जो बिल्डर मेरा फ्लैट ओन करता है, वो शायद अपना टैक्स नहीं देता।" यानी दिक्कत टैक्स देने में नहीं, उसके बदले मिलने वाली सुविधाओं में है।

इंडिया को अपना टैलेंट रिटेन करना है तो?

  • ? R&D में बड़ा इन्वेस्टमेंट — सरकार और प्राइवेट, दोनों तरफ से। (US अपनी GDP का ~3% खर्च करता है, इंडिया मुश्किल से 0.7%)
  • ? PhD स्टूडेंट्स की स्टाइपेंड और रिसर्च फंडिंग बढ़ानी होगी। अभी कईयों को एक्सपेरिमेंट के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
  • ?️ वर्ल्ड-क्लास टेक और स्टार्टअप इकोसिस्टम — ताकि "बेस्ट" करने के लिए विदेश जाने की मजबूरी न रहे।

"इंडिया में टेक की अच्छी कंपनियाँ हैं, लेकिन बहुत से लोग वाकई वो 'बेस्ट' करना चाहते हैं जो वो कर सकते हैं।" — जब तक वो बेस्ट यहाँ मौजूद होगा, टैलेंट लौटकर आएगा।

स्केलर स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी के साथ 100% स्कॉलरशिप

SSI बेंगलुरु में 4-वर्षीय कंप्यूटर साइंस & AI डिग्री — पूरी तरह प्रॉब्लम सॉल्विंग और मास्टरी बेस्ड लर्निंग पर फोकस।

  • ✅ टीचर्स: Google, Microsoft, Uber के एक्स-इंजीनियर्स।
  • ✅ प्लेसमेंट: 94% ग्रेजुएट्स को जॉब, एवरेज 18-20 लाख।
  • ✅ IMO/IOI फाइनलिस्ट्स के लिए 100% स्कॉलरशिप — बेस्ट टैलेंट को इंडिया में रिटेन करने का मिशन।

रजिस्टर करें: स्केलर नेशनल स्कॉलरशिप एंड एंट्रेंस टेस्ट

डिस्क्रिप्शन में लिंक है — स्टार्ट योर जर्नी विद SST