Why Ramanujan’s Math Is Still a Mystery

प्रस्तावना : जब सपनों में आती हैं देवी और गणित की भाषा में करती हैं संवाद

तमिलनाडु के कुंभकणम इलाके में एक छोटे से कमरे में एक लड़का सो नहीं पा रहा है। जब फाइनली उसको आंख लगती है तो उसके सपने में नमगिरी माता आती है। वो माता जिनकी पूजा हर दिन लड़के की मां करती है। देवी मां लड़के से बात करती है एक अजीब भाषा में — मैथमेटिक्स की भाषा। देर रात लड़का सडनली उठता है, अपनी स्लेट निकालता है और लिखने लग जाता है। यह छोटा सा लड़का ऐसी इक्वेशंस लिख रहा है जिनको कई लोग समझ भी नहीं सकते। लड़का ये किसी को एक्सप्लेन नहीं कर सकता कि ये फार्मूलाज़ आ कहां से हैं। वो मानता है कि देवी मां खुद उसको ये फार्मूलाज़ बता रही है। और इसी विश्वास के साथ ये छोटा सा लड़का तमिलनाडु में अपने कमरे से दुनिया की सबसे जानी मानी यूनिवर्सिटी में कदम रखता है। लड़के का नाम है श्रीनिवास रामानुजन। इस लड़के की कोई फॉर्मल एजुकेशन नहीं है। पर फिर भी वह वन ऑफ द वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट मैथमेटिशियंस बनता है। आइसक न्यूटन और चार्ल्स डार्विन के साथ उसका नाम लंदन की रॉयल सोसाइटी में शामिल किया जाता है। पर ये होता कैसे है? दिस इज द स्टोरी ऑफ़ रामानुजन — द मैन हु न्यू इंफिनिटी।

अध्याय एक : कावेरी के तट पर एक जीनियस का जन्म

एक गरीब परिवार और मंदिर की छांव

रामानुजन इज अ जीनियस। और इस जीनियस की कहानी स्टार्ट होती है कावेरी नदी के पास एक बहुत छोटे से शहर में। साल है 1887। 19 साल की कोमल तमल मंदिरों में गाना गाती है। उनके पति साड़ी की दुकान में क्लर्क का काम करते हैं और उनको महीने के ₹20 मिलते हैं। 22 दिसंबर 1887 को उनका बेटा पैदा होता है।

जब रामानुजन 2 साल के होते हैं उनको स्मॉल पॉक्स हो जाता है। मां कई प्रार्थना करती है और अपने बच्चे को नीम और हल्दी के पानी से साफ करती है ताकि वो ठीक हो जाए। रामानुजन तो बच जाते हैं पर उनके तीन भाई-बहन की ऐसी किस्मत नहीं है। उनका एक भाई बस 3 महीने की उम्र में मर जाता है। बहन अगले साल और एक दूसरा भाई अपने पहले साल में। बस दो और भाई मेडिकल दिक्कतों से बच जाते हैं और जिंदगी में रामानुजन का साथ देते हैं।

रामानुजन एक छोटे से घर में बड़े होते हैं, उसी मंदिर के पास जहां उनकी मां भजन गाती है। परिवार गरीब है पर मां के काम की वजह से उनको आदर मिलता है।

अध्याय दो : स्कूल के दिन और सवालों की आदत

अपनी स्कूलिंग रामानुजन करते हैं गांव के एक प्राइमरी स्कूल में जहां वो इंग्लिश, तमिल और मैथ्स सीखते हैं। छोटी सी उम्र में ही रामानुजन एक आदत डाल देते हैं — सवाल पूछने की। दुनिया में पहला आदमी कौन था? बादलों के बीच में डिस्टेंस कितना है? जब टीचर्स उनके सवालों के आंसर्स नहीं दे पाती तो रामानुजन स्कूल जाना ही छोड़ देते हैं। उनके परिवार को एक कांस्टेबल को बुलाना पड़ता है जो रामानुजन को खींच के स्कूल लेकर जाते हैं।

10 साल की उम्र में गणित की सुपर पावर

10 साल की उम्र में फिर वो टाउन हाई स्कूल जाने लग जाते हैं, जहां उनकी मैथमेटिक्स की सुपर पावर क्लियर होती है। अब जहां स्कूल में वो मैथ सीख रहे हैं, घर में वो रामायण और महाभारत के बारे में सीखते हैं अपनी मां से। उनकी मां मानती है कि रामानुजन का दिमाग देवी नमगिरी की देन है। देवी मां उनके सपनों में आती है और रामानुजन को गाइड करती है।

13 साल की उम्र तक रामानुजन अपनी पूरी क्लास से आगे हैं। वो ट्रिग्नोमेट्री सीखते हैं, कई कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम्स खुद सॉल्व करते हैं और सारे रिजल्ट्स अपनी नोटबुक में लिखने लग जाते हैं। वो और दूसरे बड़े स्टूडेंट से उनकी बुक्स बोरो करते हैं और एडवांस कांसेप्ट्स को खुद ही सीख लेते हैं।

अध्याय तीन : वो किताब जिसने जिंदगी बदल दी

1903 में वो एक किताब डिस्कवर करते हैं जो उनकी जिंदगी बदल देती है — "अ सिनोप्सिस ऑफ़ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड अप्लाइड मैथमेटिक्स"। ऐसी किताब रामानुजन ने कभी पढ़ी नहीं है। इस किताब में 5000 थ्योरम्स हैं पर कोई प्रूफ नहीं है। जिसका मतलब है कि रामानुजन को एक चैलेंज मिल जाता है — ये सारे थ्योरम्स और फार्मूलाज़ को प्रूफ करने का।

यह किताब उनकी ट्रेनिंग ग्राउंड बन जाती है। वह एक रिजल्ट प्रूफ करते हैं, अपनी किताब में नोट डाउन करते हैं और फिर अगले फार्मूला या थ्योरम पर फोकस करते हैं। उनके एक दोस्त नेवल बताते हैं कि एक फार्मूला को प्रूफ करते-करते उनको दूसरे फार्मूलाज़ दिख जाते हैं जिनको वो सारे एक नोटबुक में कंपाइल करते हैं। एक साल के अंदर ही उनकी नोटबुक भर चुकी है और उनको एक इनाम मिलता है।

16 की उम्र में स्कॉलरशिप और पहली बड़ी पहचान

1904 में, 16 साल की उम्र में, अपने आउटस्टैंडिंग प्रदर्शन के आधार पर रामानुजन ने गवर्नमेंट कॉलेज, कुंभकणम के लिए एक स्कॉलरशिप जीती। उनके एक प्रोफेसर पी.वी. शेषु अय्यर उनको कई प्रॉब्लम्स देते हैं एकेडमिक जर्नल से और उनके काम को वो इंजेनियस और ओरिजिनल बताते हैं।

पर सभी प्रोफेसर्स ऐसे नहीं होते। जैसे जब रामानुजन एक कैलकुलस की किताब बोरो करते हैं तो एक दूसरे प्रोफेसर गुस्से से लाल हो जाते हैं कि भाई तुम ऐसी किताब क्यों पढ़ रहे हो जो तुम्हारे करिकुलम में भी नहीं है।

अध्याय चार : अंग्रेजी की दीवार और छिनती स्कॉलरशिप

रामानुजन को सबसे बड़ी दिक्कत आती है इंग्लिश में। इंग्लिश कॉम्प्रिहेंशन उनके लिए बहुत ही मुश्किल है। उनके दोस्त लिखते हैं कि कॉलेज को लगा कि यह स्टूडेंट मैथ्स के अलावा हर चीज को इग्नोर कर रहा है। इसीलिए उनकी स्कॉलरशिप छीन लेते हैं। हर टर्म के लिए ₹32 देने हैं — एक ऐसा अमाउंट जो उनका परिवार अफोर्ड नहीं कर सकता। उनकी मां प्रिंसिपल के पास जाती है हाथ जोड़ने के लिए। पर रूल्स आर रूल्स।

रामानुजन कुछ महीने तो रुक जाते हैं पर वो खुश नहीं है। अगस्त 1905, 17 साल की उम्र में वो वाइजाग पट्टनम भाग जाते हैं। इंग्लिश में फेल करने के बाद परिवार में पैसे की कमी और एक ऐसा लड़का जो बस मैथ्स पर ही ध्यान दे सकता है। इवेंचुअली रामानुजन वापस आ जाते हैं और इस बार वो पढ़ाई करते हैं मद्रास के पचईयप्पा कॉलेज में।

फिजियोलॉजी से लगातार फेल, गणित में अद्वितीय

अब इधर रामानुजन की प्रॉब्लम इंग्लिश नहीं है बल्कि फिजियोलॉजी है। उनको बोला जाता है एक जानवर को डिसेक्ट करने को। पर वो वेजिटेरियन है इसलिए वो ये चीज करना ही नहीं चाहते। डाइजेशन पर जब एक टेस्ट होता है तो एक सवाल के लिए वो जवाब लिखते हैं: "सर, यह मेरा अनडाइजेस्टेड प्रोडक्ट है आपके डाइजेशन चैप्टर के लिए।" वो फिजियोलॉजी के एग्जाम में फेल हो जाते हैं, जबकि मैथ्स का एग्जाम वो आधे घंटे में ही कंप्लीट कर देते हैं। अगले साल वो फिजियोलॉजी का एग्जाम वापस देते हैं और वापस फेल हो जाते हैं। अगले साल फिर वापस देते हैं और फिर वापस फेल हो जाते हैं।

अध्याय पाँच : बिना डिग्री का गणितज्ञ और अरेंज मैरिज

डिस्पाइट दी फेलियर्स, जो दूसरे मैथमेटिशियंस हैं वो रामानुजन के टैलेंट को रेग्नाइज करते हैं। एक सीनियर प्रोफेसर कई बार उनके साथ प्रॉब्लम सॉल्व करते हैं। पैसे कमाने के लिए वो ट्यूशन देने लग जाते हैं, पर उससे भी काम नहीं होता। उनके एक स्टूडेंट बोलते हैं कि रामानुजन बस इंफिनिटी के बारे में ही बात करते हैं — "मैंने सोचा कि इस ट्यूशन से भला मेरे एग्जाम में मुझे क्या फायदा मिलेगा?"

यह साल है जब वो एग्जाम्स में फेल हो गए, स्कॉलरशिप्स खो बैठे और उनके पास कोई डिग्री नहीं है। बस उनके पास नोटबुक्स हैं जिनमें कई ओरिजिनल आइडियाज हैं — फार्मूलाज़ और थ्योरीज जो किसी ने नहीं पढ़ी।

अगले साल 21 साल के रामानुजन को उनकी मां बोलती है कि उनको शादी कर लेनी चाहिए। उनकी शादी अरेंज होती है एक 9 साल की लड़की जानकी से। परिवार गरीब है पर कुंडली और कास्ट दोनों ही मैच कर रही है। जुलाई के महीने में शादी तय होती है। शादी के बाद जानकी अपने परिवार के साथ रहने लग जाती है और रामानुजन मद्रास जाते हैं काम ढूंढने के लिए। बिना किसी पगार के वो अपने दोस्त और मंदिर के पुजारियों की चैरिटी पर ही जी पाते हैं।

अध्याय छह : पहचान की सुबह — जब गणित के दिग्गजों ने जीनियस को पहचाना

रामस्वामी अय्यर और रामचंद्र राव से मुलाकात

अगले साल उनके टैलेंट की खबर वी. रामस्वामी अय्यर तक पहुंचती है — एक डेपुटी कलेक्टर जो खुद मैथमेटिक्स से प्रेम करते हैं। रामानुजन उनसे मिलने जाते हैं। जब रामस्वामी अय्यर उनकी नोटबुक पढ़ते हैं तो उनको इमीडिएटली रियलाइज होता है कि इस बंदे में कुछ तो है। वो रामानुजन से कहते हैं कि मैं तुम्हें कोई छोटी-मोटी नौकरी नहीं दूंगा बल्कि मद्रास की मैथमेटिक्स सोसाइटी में कई लोगों से मिलवाऊंगा। जैसे आर. रामचंद्र राव, जो इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी के सेक्रेटरी हैं।

रामानुजन एक सफेद धोती में अपनी नोटबुक्स के साथ उनसे मिलने जाते हैं। रामचंद्र राव भी जब उनकी किताबें पढ़ते हैं तो उनको कुछ समझ नहीं आता पर उनको यह एहसास जरूर होता है कि यह लड़का एक जीनियस है। वो पूछते हैं, "भाई तुम अपना गुजारा कैसे करते हो?" रामानुजन ब्लंटली जवाब देते हैं, "मैं गुजारा नहीं करता।" इसके बाद रामचंद्र राव उनको एक मंथली अलाउंस देते हैं।

पहला रिसर्च पेपर और नौकरी

1911 में वो अपना पहला पेपर पब्लिश करते हैं — "सम प्रॉपर्टीज ऑफ़ बर्नोलीस नंबर" — इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी के जर्नल में। इस पेपर में बर्नोली नंबर्स के रिलेशनशिप्स के बारे में बात की जाती है और 18 सेक्शंस हैं। फाइनली मैथमेटिशियंस के बीच रामानुजन को कुछ रिकॉग्निशन मिलता है।

रामचंद्र राव के इन्फ्लुएंस से वो मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में एक नौकरी के लिए अप्लाई करते हैं। प्रेसिडेंसी कॉलेज के एक प्रोफेसर उनके लिए एक रेकमेंडेशन लेटर लिखते हैं कि "इस यंग आदमी की एक एक्सेप्शनल कैपेसिटी है।" फाइनली उनको जॉब मिल जाती है महीने के ₹30 में।

अध्याय सात : कैंब्रिज को एक चिट्ठी — 11 पन्नों का चमत्कार

16 जनवरी 1913 को कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में इंग्लिश मैथमेटिशियन जी.एच. हार्डी और उनके कोलैबोरेटर जे.ई. लिटिलवुड को एक लिफाफा मिलता है — इंडिया से। लेटर में लिखा है:

"आई बिग टू इंट्रोड्यूस मसेल्फ एस अ क्लर्क इन द मद्रास पोर्ट ट्रस्ट... आई हैव मेड अ स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ऑफ डायवर्जेंट सीरीज। द रिजल्ट्स आर टर्म बाय द लोकल मैथमेटिशंस एस स्टार्टली।"

फिर आते हैं 11 पेज के फार्मूलाज़ — इलेप्टिक एंड हाइपर ज्योमेट्रिक फंक्शंस, इनफिनिट सीरीज, मॉड्यूलर एक्सप्रेशंस और पाई को हम कैसे एक्सप्रेस कर सकते हैं। वो पार्टीशंस के कांसेप्ट के बारे में बात करते हैं। नंबर 5 को आप कितने वेज़ में एज अ सम एक्सप्रेस कर सकते हो? 5 को हम सात तरीकों से एक्सप्रेस कर सकते हैं, 10 को 42 तरीकों से, और 200 को करीब 4 ट्रिलियन तरीकों से।

हार्डी की प्रतिक्रिया — "मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा"

हार्डी और लिटिलवुड सबसे पहले सोचते हैं कि कोई उनके साथ मजाक कर रहा होगा। पेजेस में कोई ऑर्डर नहीं है, कई नए सिंबल्स यूज़ करे गए हैं। बट जैसे हार्डी इस लेटर को ढंग से पढ़ते हैं, उनका एक्सप्रेशन चेंज हो जाता है। कई रिजल्ट्स फेमिलियर हैं जबकि कई रिजल्ट्स पूरी तरह नए हैं — ऐसे रिजल्ट्स जिनके बारे में यूरोपियन मैथमेटिशियंस ने सोचा भी नहीं है।

हार्डी लिखते हैं: "आई हैव नेवर सीन एनीथिंग इन द लीस्ट लाइक देम बिफोर — दे मस्ट बी ट्रू... दे मस्ट हैव बीन रिटन डाउन बाय अ मैथमेटिशियन ऑफ द हाईएस्ट क्लास।"

अध्याय आठ : देवी माँ का आशीर्वाद और इंग्लैंड की ओर प्रस्थान

हार्डी रामानुजन को कैंब्रिज बुलाने की पूरी तैयारी करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ़ मद्रास 60 पाउंड की रिसर्च स्कॉलरशिप देती है। पर एक प्रॉब्लम है — उनकी मां। वो मानती हैं कि जैसे ही रामानुजन समुंदर पर उतरेंगे, उनकी कास्ट चली जाएगी। महीने बीत जाते हैं। फिर एक दिन फाइनली डिसीजन आता है। उनकी मां बोलती हैं कि उनके सपने में देवी मां आईं और देवी मां ने कहा कि तुम्हें अपने बेटे को जाने देना चाहिए।

17 मार्च 1914 को रामानुजन मद्रास हार्बर में एक जहाज चढ़ते हैं — अपनी नोटबुक्स, कुछ कपड़े और चावल के साथ जो उनकी मां और पत्नी ने पैक किए। वो मंदिर में प्रार्थना करते हैं और फिर देश छोड़कर एक ऐसी यूनिवर्सिटी में चले जाते हैं जो उनकी जिंदगी बदल देती है।

अध्याय नौ : कैंब्रिज में नया संसार

एक अजनबी दुनिया में पहला कदम

14 अप्रैल 1914 को वो साउथहैंपटन पहुंचते हैं — बस 50 किमी दूर कैंब्रिज से, पर मद्रास से हजारों किलोमीटर दूर। वो डॉक पर जी.एच. हार्डी से मिलते हैं। हार्डी लिखते हैं कि "वो एक शाय आदमी है, मानो एक स्कूल बॉय की तरह। पर उनकी आंखों में एक चमक है, मानो एक ऐसे आदमी की जिसने इंफिनिटी देखी हो।"

रामानुजन अपने दोस्त कृष्ण राव को लिखते हैं: "टिल नाउ आई डिड नॉट फील कम्फर्टेबल एंड आई वुड ऑफन थिंक व्हाई हैड आई कम हियर... हैड नॉट बीन फॉर द गुड मिल्क एंड फ्रूट्स हियर, आई वुड हैव सफर्ड मोर।"

हार्डी और रामानुजन — स्वर्ग में बनी साझेदारी

हर सुबह हार्डी और रामानुजन मिलते। हार्डी बोलते कि रामानुजन के साथ काम करना "द मोस्ट सिंगुलरली हैप्पी कोलैबोरेशन ऑफ़ माय लाइफ" था। रामानुजन कई पेजेस भर देते इक्वेशंस के साथ और फिर हार्डी उनसे प्रूफ्स, आइडेंटिटीज और एक्सप्लेनेशंस के बारे में पूछते।

एक बार हार्डी ने पूछा कि भाई तुम रिजल्ट्स तक पहुंचते कैसे हो बिना किसी एक्सप्लेनेशन लिखकर? तो रामानुजन बोलते हैं कि "फार्मूलास मुझे अपने सपने में आते हैं। देवी मां मुझे बताती है।"

हार्डी-रामानुजन फार्मूला — एक क्रांतिकारी खोज

उनकी वन ऑफ द अर्लियस्ट कोलैबोरेशन थी पार्टीशन फंक्शन पर। उनका जो कंबाइन रिजल्ट है — हार्डी-रामानुजन फार्मूला — वो आज भी मैथमेटिक्स की सबसे खूबसूरत उपलब्धियों में से एक माना जाता है। जैसे नंबर 100 को कितने तरीकों से एज अ सम ऑफ़ पॉजिटिव इंटीजर्स लिखा जा सकता है? इसका आंसर 19 करोड़ से ज्यादा है। इस फार्मूला ने इस चीज को कैलकुलेट करना बहुत आसान बना दिया।

अध्याय दस : युद्ध, अकेलापन और बीमारी

कैंब्रिज इतना आसान नहीं था। उनकी डाइट स्ट्रिक्ट वेजिटेरियन थी जबकि फर्स्ट वर्ल्ड वॉर चल रही है — पूरे देश में खाना ही इतना ज्यादा नहीं है। रामानुजन को खुद खाना बनाना पड़ता है, मेनली दाल और चावल। सर्दियों में वो लेदर के कपड़े या जूते नहीं पहनते क्योंकि वो जानवरों से बनते हैं।

ट्रिनिटी कॉलेज की कोटयार्ड एक हॉस्पिटल में तब्दील कर दी गई है। रामानुजन बस अपने कमरे के अंदर रहते हैं। अपने फ्रेंड को लिखते हैं कि "जिस जगह मैं काम करता हूं, मानो वो देवी मां का मंदिर है।"

दो सालों में 21 पेपर और बैचलर डिग्री

1914 और 1916 के बीच रामानुजन की प्रोडक्टिविटी एक्सप्लोड हो जाती है। वो 2 साल में 21 पेपर्स पब्लिश करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैंब्रिज उनको बैचलर ऑफ आर्ट्स बाय रिसर्च अवार्ड करती है। वो आदमी जिसको इंडिया में कोई भी अंडरग्रेजुएट डिग्री नहीं मिली, उसको कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से यह डिग्री मिलती है।

हार्डी लेटर में लिखते हैं: "रामानुजन मेरी डिस्कवरी थी और मैं अपने आप से बहुत खुश हूं कि मेरा एक छोटा सा कंट्रीब्यूशन है एक जीनियस को इस दुनिया में इंट्रोड्यूस करवाने का।"

1916 और 1917 की सर्दी में रामानुजन की हेल्थ रॉक बॉटम पर पहुंच जाती है। वो रात भर खांसते हैं। अपने दोस्त को लिखते हैं: "द होल ऑफ लास्ट नाइट आई हैड फीवर एंड माय टेंपरेचर दिस मॉर्निंग वास अबाउट 102 डिग्रीज... यस्टरडे आई हैड नो डिनर एट ऑल।"

अध्याय ग्यारह : रॉयल सोसाइटी का सम्मान और टैक्सी कैब नंबर 1729

1917 आते-आते रामानुजन की हेल्थ मानो रॉक बॉटम है। हार्डी मानते हैं कि रामानुजन को कुछ भी हो सकता है और उनके जाने से पहले वो उनको कुछ रेग्निशन देना चाहते हैं। उनकी मदद से रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन रामानुजन को एक फेलो बनाती है। वह पहले इंडियन मैथमेटिशियन हैं जिनको यह ऑनर मिला है — वही अवार्ड जो लेजेंड्स आइसक न्यूटन और चार्ल्स डार्विन को मिला था।

1729 की अमर कहानी

जब हार्डी अस्पताल में रामानुजन से मिलने जाते हैं तो उनका मूड ठीक करने की कोशिश करते हैं। हार्डी बोलते हैं, "आई जस्ट टूक अ टैक्सी कैब नंबर 1729।" रामानुजन की आंखें चमक जाती है। "इट इज द स्मालेस्ट नंबर एक्सप्रेसबल एस अ सम ऑफ टू क्यूब्स इन टू डिफरेंट वेज़" — 1729 = 10³ + 9³ और 12³ + 1³। हार्डी इसको "वन ऑफ़ द मोस्ट ब्यूटीफुल इंसिडेंट्स ऑफ़ माय लाइफ" बुलाते हैं।

अध्याय बारह : स्वदेश वापसी और अंतिम दिन

1919 आते-आते डॉक्टर्स कहते हैं कि अगर रामानुजन इंग्लैंड में रहे तो उनका जल्द देहांत हो जाएगा। हार्डी अथॉरिटीज को बोलते हैं कि रामानुजन को इंडिया भेज देना चाहिए। हार्डी एक लेटर में लिखते हैं: "ही विल रिटर्न टू इंडिया विद अ साइंटिफिक स्टैंडिंग एंड रेपुटेशन सच एस नो इंडियन हैज़ एंजॉयड बिफोर।"

फाइनली 1919 में रामानुजन एक जहाज चढ़ते हैं। मद्रास पहुंचते ही उनकी मां उनको देखकर रोने लग जाती है — खुशी से नहीं बल्कि शोक से। एक हेल्दी 30 साल का बेटा जिसको उन्होंने भेजा था, आज इतना कमजोर हो गया है। जानकी को देखकर रामानुजन बोलते हैं, "टू से इफ यू हैड कम विद मी, आई वुडंट हैव फॉलन इल... इट्स बिकॉज़ यू डिडंट कम दैट माय हेल्थ फेल।"

द लॉस्ट नोटबुक — बिस्तर पर लेटे-लेटे रचा गया चमत्कार

बिस्तर में पड़े हुए भी रामानुजन नोटबुक्स भर देते हैं। नोबेल लॉरियट एस. चंद्रशेखर मानते हैं कि रामानुजन को पता था कि उनका अंत आने वाला है। जो स्पीड उन्होंने आखिरी साल में दिखाई, वो "द लॉस्ट नोटबुक" में दर्ज है — जो मैथमेटिक्स की सबसे ओरिजिनल कृतियों में से एक है। इसमें वो मॉक थीटा फंक्शंस के बारे में लिखते हैं। हार्डी इस लेटर को देखकर शॉक्ड हो जाते हैं कि एक कमजोर आदमी जो इंडिया में बिस्तर में लेटा हुआ है, वो ऐसे फार्मूलास कैसे लिख पाता है जो कैंब्रिज के मैथमेटिशियंस भी समझ नहीं पाते।

समापन : एक ऐसी विरासत जो कभी नहीं मिटेगी

26 अप्रैल 1920 को श्रीनिवास रामानुजन 32 साल की उम्र में स्वर्गवासी हो जाते हैं। पर इस छोटी सी उम्र में उन्होंने एक ऐसी लेगसी क्रिएट करी जिसके बारे में इंडियन मैथमेटिशियन सोच भी नहीं सकते थे। रामानुजन को नदी के पास क्रिमेट करा जाता है और उनकी अस्थियां उस मंदिर में लेकर जाई जाती हैं जहां वो देवी मां उनकी मां के सपनों में आती थी।

हार्डी अगले 26 साल तक जीवित रहते हैं। 1940 में "अ मैथमेटिशियन्स अपॉलोजी" में वो लिखते हैं: "आई स्टिल से टू माइसेल्फ व्हेन आई एम डिप्रेस्ड... वेल, आई हैव डन वन थिंग यू कुड नेवर हैव डन — एंड दैट इज टू हैव कोलैबोरेटेड विद रामानुजन ऑन समथिंग लाइक इक्वल टर्म्स।"

आज उनका कंट्रीब्यूशन नंबर थ्योरी से लेकर ब्लैक होल फिजिक्स, स्ट्रिंग थ्योरी से लेकर कैंसर रिसर्च में पाया जाता है। जवाहरलाल नेहरू ने "द डिस्कवरी ऑफ इंडिया" में लिखा था: "रामानुजन की छोटी सी जिंदगी दरअसल भारत की हालत का आईना है। हमारे करोड़ों लोगों में कितनों को पढ़ाई का मौका मिलता है? अगर इन्हें अच्छी जिंदगी, खाना और सीखने का अवसर मिले तो न जाने कितने वैज्ञानिक, शिक्षक, लेखक और कलाकार इस देश से निकलें जो एक नया भारत और एक नई दुनिया बना सकते हैं।"

रामानुजन ने अपने टाइम के साइंटिस्ट को इंस्पायर किया। उम्मीद है कि 100 साल बाद भी वो हमारे देश में साइंटिस्ट को इंस्पायर करेंगे। क्योंकि अगर हमारा देश रामानुजन जैसे हीरो को फूड, एजुकेशन और इनकरेजमेंट देगा तो इस देश में और कई जीनियस पाए जाएंगे।