सिंगापुर भारत से 30 साल आगे क्यों है?

कैसे सिंगापुर ने खुद को बदल दिया और भारत इससे क्या सीख सकता है?

मैं चाहता हूं कि मेरा शहर न्यूयॉर्क की तरह हो। यही सपना था सिंगापुर के फाउंडिंग प्राइम मिनिस्टर ली कुआन यू का जब 1965 में सिंगापुर को आजादी मिली। उस समय सिंगापुर बेहद खराब स्थिति में था। देश के पास कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, जमीन बहुत कम थी और आबादी लगातार बढ़ रही थी।

लेकिन आज, करीब 60 साल बाद, सिंगापुर दुनिया के सबसे विकसित देशों में शामिल है। दुनिया में सबसे ज्यादा GDP per capita वाले देशों में उसका नाम आता है। Human Development Index में उसकी रैंकिंग बहुत ऊपर है और आज वह दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट देशों में गिना जाता है।

सवाल यह है कि आखिर सिंगापुर ने ऐसा बदलाव कैसे किया? और भारत इससे क्या सीख सकता है?

सिंगापुर में भ्रष्टाचार की समस्या

1950 और 1960 के दशक में सिंगापुर में भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा था। सरकारी अधिकारी कम वेतन पाते थे, महंगाई बहुत ज्यादा थी और कई अधिकारी रिश्वत लेने लगे थे। यहां तक कि कुछ पुलिस अधिकारी भी अपराधियों के साथ मिले हुए थे।

1959 में सिंगापुर सरकार ने Prevention of Corruption Act को मजबूत किया और Corrupt Practices Investigation Bureau यानी CPIB को ज्यादा अधिकार दिए। इस एजेंसी को बिना वारंट गिरफ्तारी करने, बैंक अकाउंट जांचने और भ्रष्टाचार से जुड़े लोगों की संपत्ति की जांच करने की शक्ति दी गई।

सबसे बड़ी बात यह थी कि इस एजेंसी को राजनीतिक दबाव से काफी हद तक स्वतंत्र रखा गया। अगर कोई बड़ा नेता भी भ्रष्टाचार में शामिल होता था, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती थी।

अच्छे वेतन और मजबूत इंसेंटिव सिस्टम

सिंगापुर सरकार ने यह समझ लिया था कि अगर सरकारी अधिकारियों को अच्छा वेतन नहीं मिलेगा, तो भ्रष्टाचार बढ़ेगा। इसलिए उन्होंने मंत्रियों और अधिकारियों की सैलरी प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले प्रतिस्पर्धी रखी।

आज सिंगापुर के मंत्री दुनिया में सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले नेताओं में शामिल हैं। वहां अधिकारियों की सैलरी देश की आर्थिक प्रगति और लोगों के जीवन स्तर से जुड़ी होती है।

इससे अधिकारियों को बेहतर काम करने का सीधा इंसेंटिव मिलता है।

भारत क्या सीख सकता है?

भारत में भी CBI, CVC और कई एंटी करप्शन एजेंसियां मौजूद हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या उनकी स्वतंत्रता को लेकर रहती है। कई बार राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से जांच प्रभावित होती है।

अगर भारत को भ्रष्टाचार कम करना है, तो जांच एजेंसियों को ज्यादा स्वतंत्र बनाना होगा। साथ ही अधिकारियों की सैलरी और प्रमोशन को उनके प्रदर्शन से जोड़ना होगा।

सिंगापुर की हाउसिंग क्रांति

1960 के दशक में सिंगापुर की बड़ी आबादी झुग्गियों में रहती थी। लोगों के पास साफ पानी, बिजली और सही घर नहीं थे। तब सरकार ने Housing and Development Board यानी HDB बनाया।

इस एजेंसी का लक्ष्य था तेजी से सस्ते और बेहतर घर बनाना। सिर्फ पांच सालों में हजारों घर बनाए गए। बाद में पूरे शहर को नए तरीके से प्लान किया गया।

स्कूल, अस्पताल, पार्क, मार्केट और ट्रांसपोर्ट को एक ही कम्युनिटी के अंदर प्लान किया गया ताकि लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें।

आज सिंगापुर में 80% से ज्यादा लोग HDB फ्लैट्स में रहते हैं और दुनिया में सबसे ज्यादा home ownership rate वाले देशों में उसका नाम आता है।

भारत की हाउसिंग चुनौतियां

भारत में कई सरकारी हाउसिंग प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाते। अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी और धीमी मंजूरी प्रक्रिया बड़ी समस्या बन जाती है।

सिंगापुर की तरह भारत में भी single window clearance system लागू किया जा सकता है ताकि लोगों को एक ही जगह पर सभी मंजूरियां मिल सकें।

साथ ही सरकारी एजेंसियों को भी समय पर काम पूरा न करने पर जवाबदेह बनाना जरूरी है।

साफ-सफाई में सिंगापुर का बदलाव

एक समय ऐसा था जब सिंगापुर भी बेहद गंदा हुआ करता था। नदियां प्रदूषित थीं और जगह-जगह कचरा फैला रहता था।

इसके बाद सरकार ने “Keep Singapore Clean” अभियान शुरू किया। सिर्फ कानून नहीं बनाए गए बल्कि उन्हें सख्ती से लागू भी किया गया। सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया गया।

सरकार ने साफ-सफाई को सिर्फ नियम नहीं बल्कि लोगों की पहचान बनाने की कोशिश की। यही वजह है कि आज सिंगापुर दुनिया के सबसे साफ देशों में गिना जाता है।

भारत में क्या किया जा सकता है?

भारत में भी स्वच्छ भारत अभियान जैसे प्रयास हुए हैं, लेकिन अभी बहुत काम बाकी है। इंदौर और चंडीगढ़ जैसे शहरों ने दिखाया है कि सख्त नियम और लोगों की भागीदारी से बदलाव संभव है।

हमें साफ-सफाई को सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामाजिक आदत बनाना होगा। स्कूल, कॉलेज और ऑफिस स्तर पर भी इस संस्कृति को मजबूत करना जरूरी है।

निष्कर्ष

सिंगापुर और भारत दोनों की परिस्थितियां अलग हैं। भारत का आकार, आबादी और चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी हैं। इसलिए सिंगापुर की हर नीति को सीधे लागू करना संभव नहीं है।

लेकिन सिंगापुर की सफलता यह जरूर दिखाती है कि मजबूत संस्थाएं, जवाबदेही, साफ लक्ष्य और ईमानदार प्रशासन किसी भी देश को बदल सकते हैं।

भारत में भी कई शहर और राज्य ऐसे उदाहरण पेश कर रहे हैं जहां बदलाव संभव हुआ है। जरूरत सिर्फ सही नीतियों और उन्हें ईमानदारी से लागू करने की है।